

वीआईपी मामलों में तेज़ न्याय, आम जनता में देरी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी, अरविंद केजरीवाल, आजम खान और जेपी नड्डा से जुड़े मामलों में पुलिस ने 1से 30 दिनों के भीतर कार्रवाई कर नतीजे दे दिए, जबकि आम नागरिकों के मामलों में सालों लग जाते हैं।
प्रशासनिक दोहरा रवैया उजागर: नामचीन लोगों के लिए कई-कई पुलिस टीमें, त्वरित जांच और बरामदगी होती है, वहीं आम आदमी को एफआईआर दर्ज कराने से लेकर न्याय पाने तक अपमान और लंबा इंतज़ार झेलना पड़ता है।
संवैधानिक समानता बनाम ज़मीनी हकीकत : संविधान में राजनीतिक और सामाजिक समानता की बात है, लेकिन मैनपुरी के आज़ाद खान जैसे मामलों में 24 साल बाद न्याय मिलना दिखाता है कि समानता कागज़ों तक सीमित है और ज़मीनी स्तर पर असमानता गहरी है।
समसामयिक घटनाओं पर कानूनी कार्रवाई में देरी को लेकर जनता के मन में बहुत सारे सवाल खड़े होते रहे हैं। कभी-कभी जनता के द्वारा शिकायत करने के बाद भी पुलिस की कार्रवाई में लेट लतीफी को लेकर जनता का आक्रोश भी देखने को मिलता है। आम जनता के साथ न्याय होने में इतनी देरी होती है, लेकिन उच्च दर्जा हासिल कर चुके नेताओं के ऊपर अगर कोई ऐसी मुसीबत आती है तो उनके मामले में न्याय कितने समय में होता है, इस बात का अंदाजा कुछ घटनाओं के माध्यम से लगाया जा सकता है, जो इस प्रकार हैं-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की भतीजी दमयंती मोदी साल 2019 में अमृतसर से दिल्ली के लिए रवाना हो रही थी। रास्ते में कुछ स्कूटी सवार मनचलों ने उनका पर्स छीन लिया था। उस समय की पुलिस के मुताबिक उनके पर्स में लगभग 56 हजार रुपए थे,पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेज़ भी थे। मामला पुलिस के पास पहुंचा तो तीव्र कार्रवाई का आश्वासन दिया गया। घटना के कुछ समय बाद मात्र 24-48 घंटे के भीतर ही दिल्ली पुलिस ने बदमाशों को गिरफ्तार कर लिया और प्रधानमंत्री की भतीजी के सामान को उनके पास पहुँच दिया गया।
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवल (Arvind Kejriwal) का मामला भी कुछ ऐसा ही था जिसे मात्र कुछ ही समय में सुलझा दिया गया था। यह बात साल 2017 की है, जब अरविन्द केजरीवल दिल्ली के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। 13 अक्टूबर, 2017 को दिल्ली से अरविन्द केजरीवल की कार चोरी होने की खबर आती है। दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करते हुए मात्र 48 घंटे के अंदर कार का पता लगा लिया। कार गाजियाबाद के मोहन नगर इलाके से बरामद की गई थी।
यह बात साल 2014 की है, जब आजम खान उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार में मंत्री हुआ करते थे। आजम खान के घर से 31 जनवरी 2014 की रात को सात भैंस चोरी हो गई थी। मामला पुलिस के पास पहुँचने में देरी नहीं हुई । सबह तक पुलिस ने मामले को संज्ञान में ले लिया। मात्र एक से दो दिन के अंदर पुलिस ने सात भैंसों को खोजने में सफलता हासिल की। 3 फरवरी का दिन पूरा नहीं बीता था और यूपी पुलिस ने आजम खान की सभी भैंस को 3 फरवरी 2014 को खोज निकाला।
भाजपा के पूर्व अध्यक्ष जे पी नड्डा की कार 19 मार्च 2024 को दिल्ली के गोविंदपुरी से चोरी हुई थी। मामले को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली पुलिस ने छानबीन शुरू कर दी। महीना भर भी नहीं हुआ और कार को 7 अप्रैल 2024 को वाराणसी (उत्तर प्रदेश) से दिल्ली पुलिस ने बरामद कर लिया। बता दें कि जे पी नड्डा की कार को खोजने के लिए पुलिस की सात टीमें लगाई गई थी।
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सुरक्षा व्यवस्था काफी सख्त हो जाता है, जब मामला किसी नामचीन आदमी का होता है। आम आदमी की जिंदगी पर प्रशासन का रवैया ऐसा रहता है जैसे आम आदमी की कोई कीमत नहीं होती है। आम जनता की हालत ऐसी है कि जब वह एफआईआर (FIR) दर्ज कराने जाता है, तो पहले उसी से ऐसे सवाल किए जाते हैं जैसे वह खुद कोई अपराध करके आया हो।
हाल ही में उन्नाव रेप का मामला प्रकाश में आया था। घटना होने के बाद पीड़ित परिवार के साथ इस तरीके का बर्ताव किया जाता रहा जैसे पीड़ित पक्ष ही दोषी है। यह सिर्फ इसलिए हो पाता है क्योंकि वह गरीब है और उसका संबंध किसी ऊंचे संवैधानिक पद से नहीं है।
भारतीय संविधान में आर्थिक (Economic), सामाजिक (Social) के साथ में राजनीतिक (Political) न्याय की भी बात गई है। राजनीतिक न्याय की बात की जाए तो ऐसा लगता है जैसे यह केवल वोट देने तक सीमित कर दिया गया है। आम आदमी अपनी समस्या के निदान हेतु जब प्रशासन के पास जाता है, तो प्रशासन की तरफ से दोहरा बर्ताव किया जाता है। आम जनता के मामले को सुलझाने में सालों लग जाते हैं।
मैनपुरी (यूपी) का आज़ाद खान नाम का आदमी साल 2000 में डकैती के आरोप में गिरफ्तार होता है और 24 साल बाद कोर्ट उसे निर्दोष साबित करती है। 21 जनवरी 2026 की रात को आजाद खान को जेल से बाहर निकाल दिया जाता है, क्योंकि उसके ऊपर लगे आरोप सही साबित नहीं हुए और वह निर्दोष साबित हुआ था।
24 साल एक निर्दोष मजदूर की जिंदगी जेल (Jail) में बीत जाती है, इसका हिसाब कौन देगा? किसी बड़े आदमी की भैंस चोरी हो जाए, कार चोरी हो जाए या प्रधानमंत्री की भतीजी का पर्स चोरी हो जाए, तो पुलिस की एक दो नहीं, सात टीमें लगा दी जाती हैं। जरूरत पड़ने पर पूरे जिले की पुलिस लगा दी जाती है।
वहीं आम आदमी की समस्या जब प्रशासन के पास पहुँचती है, तो प्रशासन से सिर्फ आश्वासन पर आश्वासन ही मिलता है। एक ऐसा देश जहां कागजों पर हर कोई समान है, परंतु धरातल पर आम जनता खाईं में है, दूसरी तरफ बड़े रसूखदार लोग शिखर पर हैं। यह असमानता, कब समानता में बदलेगी, जनता अभी भी असमानता की खाईं से, ऊपर (समानता) की तरफ देख रही है।