JNU वीसी के बयान से सियासी भूचाल, “दलित भी खेलते हैं विक्टिम कार्ड?”

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की वीसी (VC) शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित (Santishree Dhulipudi Pandit) ने अमेरिका में रंग के आधार पर शोषित काले लोगों की तुलना भारत के दलितों से की है, और कहा है कि जिस तरीके से काले लोग विक्टिम कार्ड खेलते हैं उसी तरह भारत में दलित भी विक्टिम कार्ड खेलते है।
एक तरफ मुनीश कुमार रायज़ादा और दूसरी तरफ शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित
JNU की VC शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित ने अमेरिका में रंग के आधार पर शोषित काले लोगों की तुलना भारत के दलितों से की है और कहा है कि जिस तरीके से काले लोग विक्टिम कार्ड खेलते हैं, उसी तरह भारत में दलित भी विक्टिम कार्ड खेलते है।X
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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की वीसी (VC) शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित (Santishree Dhulipudi Pandit) ने अमेरिका में रंग के आधार पर शोषित काले लोगों की तुलना भारत के दलितों से की है, और कहा है कि जिस तरीके से काले लोग विक्टिम कार्ड खेलते हैं, उसी तरह भारत में दलित भी विक्टिम कार्ड खेलते हैं। दरअसल, वीसी ने जो बात कही है, उससे पता चलता है कि उनको जमीनी हकीकत नहीं पता है। अमेरिका में रंग के आधार पर शोषण और भारत में जाति के आधार पर शोषण का एक लंबा इतिहास है।

क्यों बनाया गया वर्ग/वर्ण और कैसे हुआ शोषण 

दरअसल, अमेरिका हो या दुनिया का कोई अन्य हिस्सा, समाज के महज थोड़े से तथाकथित विद्वान लोगों ने अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिए और संपत्ति पर अपना अधिकार स्थापित के लिए समाज का विभाजन किया।

अमेरिका जैसे देश में काले लोगों का संसाधनों पर कब्जा न हो जाए, इसके लिए गोरी चमड़ी वालों में से कुछ लोगों ने यह कहना प्रारंभ किया कि काले लोगों की तुलना में गोरे लोग ज्यादा बुद्धिमान और श्रेष्ठ होते हैं। यह कथा सिर्फ और सिर्फ इसलिए रची गई ताकि देश के सम्पूर्ण संसाधनों से काले लोगों को वंचित रखा जाए। काले लोगों को इस तरीके से हीन भावना से देखा कि शौचालयों के अंदर काले लोगों के प्रवेश को वर्जित करने के लिए वहाँ पर यह लिखा जाता था कि यह शौचालय केवल गोरे लोगों के लिए है। 

भारत (India) के मामले में यह स्थिति थोड़ी अलग तो रही, लेकिन सामंती सोच का केन्द्रीय विषय यही था कि देश के संसाधनों पर किस प्रकार नियंत्रण स्थापित किया जाए। इसके लिए प्रारंभ में समाज का विभाजन वर्ण व्यवस्था के आधार पर किया गया। प्रारंभ में जैसे-जैसे समाज में उत्पादन बढ़ने लगे तो समाज के तथाकथित प्रबुद्ध लोगों ने समाज को विभाजित करना शुरू किया। चार वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र को क्रमवार समाज में स्थापित किया गया।

ब्राह्मण को ब्रह्मा के मुख से जन्म लेने वाला बताया गया। क्षत्रिय को भुजाओं से, वैश्य को जंघा से और शूद्र को पैरों से पैदा होने की बात समाज में बताई गई। सबके कामों को विभाजित कर दिया गया, जिसमें से शूद्र का काम तीनों वर्णों की सेवा करना निर्धारित कर दिया गया। वहीं समाज की आधी आबादी अर्थात महिलाओं को घर के अंदर रहने वाली एक सौन्दर्य की वस्तु के समान समझा जाने लगा। 

बीतते समय के साथ जाति व्यवस्था के माध्यम से सामाजिक विभाजन का विस्तार किया गया। बाहर से आए लोगों को इन वर्णों में स्थान दिलाने की कोशिश की गई। समाज के इस विभाजन से एक बड़ी आबादी को संपत्ति और संसाधनों से दूर रखने की साजिश रची गई।

कार्ल मार्क्स ने भी अपने वर्ग संघर्ष के सिद्धांत में यही बात कही कि उत्पादन के संसाधनों पर जिसका कब्जा होता है, राज्य असल में उसी की सुरक्षा भी करता है।  

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क्या भारत में जातिगत भेदभाव का उन्मूलन हो गया?

भारत के दलित हों या अमेरिका (America) के काले लोग (Blacks), इन सभी ने अपने हक और अधिकार के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी है। भारत में आज अगर कुछ लोगों को ऐसा लग रहा कि जाति आधारित भेदभाव का उन्मूलन हो चुका है तो ये असल में मात्र एक भ्रम है।

जाति आधारित भेदभाव की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इतनी जल्दी इसका उन्मूलन नहीं हो सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि वर्ण और जाति के आधार पर समाज का विभाजन संपत्ति और संसाधनों पर कब्जा करने हेतु किया गया था। संपत्ति और संसाधनों पर जिन्होंने कब्जा किया है, वो इतनी आसानी से सबकुछ छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। आज भी समाज में बहुत सारे जगहों पर दलित को अपमानित करने की कोशिश की जाती है। राजस्थान में दलित दूल्हा जब घोड़ी चढ़कर बारात जाता है, तो उसको नीचे उतरकर जाने की बात कही जाती है।राजस्थान के अजमेर जिले में विजय रैगर नाम के दलित दूल्हे को घोड़ी चढ़कर बारात जाने से रोका जाता है। 

दिल्ली के वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज (Vardhman Mahavir Medical College) में अध्ययनरत वे छात्र, जो दलित या फिर पिछड़े तबके से आते हैं, उनको इन्टर्नल परीक्षा में जानबूझकर शिक्षकों द्वारा नंबर कम दिया जाता है। यह सिर्फ इसलिए किया जाता है कि दमित समाज के बच्चे तथाकथित अगड़ी जाति के बच्चों से कमजोर महसूस करें। इसके माध्यम से यह अहसास कराने की कोशिश की जाती है कि दमित समाज के बच्चों की बौद्धिक क्षमता तथाकथित अगड़ी जाति के बच्चों की तुलना में कम होती है। यह कोई 19वीं सदी की घटना नहीं है बल्कि 21वीं सदी के पहले दूसरे दशक की है, जिसमें नरेंद्र मोदी जी कहते हैं कि 21वीं सदी भारत का है।  

जो लोग यह बात कहते हैं कि समाज से जाति आधारित भेदभाव खत्म हो चुका है उनको मेरी तरफ से चुनौती है कि जाति को खत्म करने की घोषणा समाज के सभी वर्ग एक साथ मिलकर करें। देश के अंदर चारों शंकराचार्यों को खुली चुनौती है कि आइए एक साथ बैठकर जाति के सम्पूर्ण विनाश की घोषणा करते हैं।  

एक तरफ मुनीश कुमार रायज़ादा और दूसरी तरफ शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित
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