

अमरावती को नई राजधानी घोषित कर बड़े पैमाने पर जमीन की खरीद-फरोख्त और पैसे का ट्रांसफर हुआ, लेकिन स्थानीय आम जनता को वास्तविक लाभ नहीं मिला।
शहर विकास के वादे आज तक अधूरे हैं, जिससे मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग को रियल एस्टेट निवेश में भारी घाटा उठाना पड़ा।
यह समस्या केवल अमरावती तक सीमित नहीं, देश के अन्य हिस्सों जैसे नोएडा,फरीदाबाद लवासा में भी है।
साल 2014 में आंध्रप्रदेश से अलग करके तेलंगाना राज्य की स्थापना की गई थी। तेलंगाना राज्य के पहले मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव ने पूरे देश के राजनीतिक मानचित्र को बदल के रख दिया था। उस समय तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बीच राज्य की राजधानी को लेकर काफी खींचतान मचा हुआ था। आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के अनुसार, तेलंगाना के आंध्रप्रदेश राज्य से अलग हो जाने के बाद आंध्र प्रदेश के अमरावती में जमीन की खरीद-बिक्री के तहत बहुत सारे पैसों का स्थानांतरण हुआ लेकिन वहाँ की आम जनता को कुछ न मिल सका।
दरअसल, साल 2014 में के.चंद्रशेखर राव की अगुवाई में चल रहे तेलंगाना राज्य की मांग ने पूरे देश के राजनीतिक मानचित्र को बदल के रख दिया। 2 जून 2014 को अंततः तेलंगाना को भारत का 29वां राज्य घोषित कर दिया गया।
हैदराबाद तेलंगाना में एक ऐसा शहर था जिसे आसानी से आंध्रप्रदेश की राजधानी से हटाना संभव नहीं था।
इसलिए आंध्रप्रदेश और तेलंगाना, दोनों राज्यों की राजधानी के रूप में हैदराबाद 10 साल के लिए सुनिश्चित कर दी गई।
आंध्र प्रदेश से तेलंगाना के अलग हो जाने के बाद चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। वहीं दूसरी तरफ नए राज्य, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (K.Chandrashekhar Rao) बने। दोनों तरफ से विकास के वादों के पुल बांधे गए। आंध्र प्रदेश की राजधानी के लिए चंद्रबाबू नायडू (N.Chandrababu Naidu) सरकार ने साल 2015 में अमरावती का प्रस्ताव रखा और राजधानी के रूप में शहर को विकसित करने का वादा किया गया।
राजधानी में विकास के नाम पर अमरावती में जमीन की खरीद बिक्री का मामला तेजी से बढ़ा और अमरावती (Amaravati) में शुरू में बड़े उद्योगपतियों को मामूली कीमत पर जमीन दे दी गई। इसके बाद वहाँ की आम जनता के हाथ कुछ खास न लगा। अमरावती शहर विकास के लिए आज तक राह देख रही है। राजधानी के रूप में जो विकास का वादा किया गया था वह अभी अधूरा है।
शहर को स्मार्ट सिटी (Smart City) बनाने के नाम पर पहले आम जनता की जमीन को सस्ते दामों में बड़े उद्योगपतियों के हाथ में बेच दिया जाता है। इन्फ्रस्ट्रक्चर के नाम कुछ खास नहीं, केवल आने-जाने के लिए थोड़े बहुत सड़क इत्यादि का काम कर दिया जाता है, फिर वही जमीन दूसरे लोगों को महंगे दामों में बेच दिया जाता है।
रियल स्टेट (Real Estate) में मध्यम वर्ग अपना पैसा भी लगा देते हैं। लेकिन सही समय पर शहर का विकास न हो पाने के कारण माध्यम/उच्च मध्यम वर्ग को रियल एस्टेट (Real Estate) में इन्वेस्ट किए गए पैसों के अपार घाटे का सामना करना पड़ता है।
यह मामला केवल अमरावती का नहीं है। उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) और दिल्ली (Delhi) जैसे राज्यों में इसी तरीके के उदाहरण आसानी से मिल जाएंगे। दिल्ली के बगल में ही हरियाणा के फरीदाबाद (Faridabad) को स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर विकास का ढिंढोरा पीटा गया। लोगों ने रियल एस्टेट(Real Estate) में अपने पैसा इन्वेस्ट कर दिया।
फरीदाबाद में अभी तक विकास ने प्रवेश नहीं किया। कहने का तात्पर्य यह है कि फरीदाबाद को जिस तरीके से विकसित करने का वादा किया गया, वैसा अभी तक 40% भी काम नहीं हुआ है। बहुत सारे लोगों ने इस इलाके में अपनी जमा पूंजी को लगा दिया लेकिन विकास के नाम पर सरकार की तरफ से अभी तक केवल वादों के पुल ही बांधे गए हैं। धरातल अभी तक कुछ खास विकास का चमत्कार नहीं देखने को मिला है।
वहीं, नोएडा (NOIDA) शहर को विकसित करने के नाम पर लापरवाही की निशानी दी जा रही है। कार्य प्रगति पर है, इस नाम पर सरकार की तरफ से विकास के प्रचार में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है। सरकार के विकास की राह में 16 जनवरी 2026 की रात एक दर्दनाक घटना में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता (कार एक 30 फीट गहरे अनियंत्रित और खुले गड्ढे में गिर गई थी।) शहीद कर दिया जाता है।
महाराष्ट्र (Maharashtra) के लवासा शहर में भी इस तरीके से विकास का ढिंढोरा पीट दिया गया। लोगों ने अपनी जमा पूंजी लगाना शुरू किया लेकिन सरकार की तरफ से जिस तरीके के विकास का वादा पूरा किया गया मानो कोई आंधी आई और सबके पैसे को उड़ा ले गई।
यही हाल देश के अन्य शहरों, जैसे-गुजरात के ढोलेरा शहर का है, यहाँ की जमीन उद्योगपतियों को एक रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से दे दिया जाता है। यहाँ विकास का कौन-सा कालखंड आएगा जिसमें जनता को लगेगा कि सरकार ने जो वादा किया, जैसा शहर बनाने का वादा किया, वैसा शहर बना कर दे दिया।