

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति का दर्जा और उससे मिलने वाली कानूनी सुरक्षा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म तक ही सीमित है।
यदि कोई व्यक्ति ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता है तो वह अपनी अनुसूचित जाति की पहचान और उससे जुड़े कानूनी लाभ स्वतः खो देगा।
कोर्ट ने आदिवासियों के मामले में केवल धर्म परिवर्तन को सदस्यता खत्म करने का आधार नहीं माना।
24 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों द्वारा धर्म परिवर्तन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को लेकर विमर्श तेज हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वालों के अलावा किसी अन्य धर्म के व्यक्ति को अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जा सकता। इसके साथ कोर्ट ने यह भी कहा कि धर्म बदलने वालों को अनुसूचित जाति के तहत मिलने वाले कानूनी सुरक्षा का लाभ नहीं मिलेगा।
24 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा (Justice Prashant Kumar Mishra) और जस्टिस एन.वी. अंजारिया (Justice N.V. Anjaria) मडिगा जाति के एक व्यक्ति की सुनवाई कर रहे थे, जो ईसाई पादरी बन चुका था। इसी दौरान अनुसूचित जाति के धर्म परिवर्तन मामले पर उन्होंने टिप्पणी किया।
कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति से संबंध रखने वाले लोग, अगर धर्म परिवर्तन करते हैं ईसाई या फिर मुस्लिम बनते हैं, तो ऐसे में एससी (SC) के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा उनको नहीं मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट का साफ कहना है कि एससी के तहत कानूनी सुरक्षा केवल हिन्दू, बौद्ध और सिख धर्म में दी जाएगी।
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एसटी (ST) समुदाय में धर्म परिवर्तन पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) के मामले में केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर सदस्यता खत्म नहीं मानी जा सकती। अनुसूचित जनजाति की सदस्यता खत्म करने से पहले यह देखना जरूरी है कि जिसने धर्म परिवर्तन किया है वह अभी भी समुदाय की परंपराओं एवं पहचान से जुड़ा है या फिर नहीं। इसके बाद ही उसकी एसटी सदस्यता खत्म करने पर विचार किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर वह व्यक्ति समुदाय की परंपराओं से नहीं जुड़ा है और रीति रिवाजों को नहीं मानता है तो फिर उसकी सदस्यता खत्म की जा सकती है।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण को लेकर काफी समय से बहस चल रही है। छत्तीसगढ़, झारखंड जैसे राज्यों में आदिवासियों के बीच लगातार यह बहस का मुद्दा बना हुआ है कि जिन लोगों ने अपना धर्म बदल दिया है वे आदिवासी हैं या नहीं है। धर्म बदल चुके लोगों को आदिवासी आरक्षण मिलना चाहिए या फिर नहीं मिलना चाहिए यह मुद्दा डी-लिस्टिंग' (De-listing) के नाम से जाना जाता है।
दरअसल, बहुत सारे आदिवासी अपना धर्म बदल लेते हैं और ईसाई बन जाते हैं लेकिन उनको आदिवासी आरक्षण का लाभ मिलता रहता है। इसका विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि जिन आदिवासियों ने अपना धर्म बदल दिया है वे मूल परंपराओं और संस्कृति से उस तरीके से नहीं जुड़े रहते जैसे सामान्य आदिवासी जुड़ा होता है। इसलिए धर्म बदल देने वाले लोगों को आदिवासी सूची से बाहर करना चाहिए।
वहीं इसके विरोध में तर्क दिया जाता है कि संविधान का अनुच्छेद 25 सबको अपने मन मुताबिक धर्म को मानने और उपासना करने की स्वतंत्रता देता है। धर्म बदलने से आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कुछ खास बदलाव नहीं होते हैं अतः उनको आदिवासी सूची में बने रहने देना चाहिए।
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