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व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतंत्र को बढ़ावा देने वाले मुल्क अमेरिका के राष्ट्रपति एक बार फिर सवालों में उलझ गए हैं। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का एक महिला पत्रकार द्वारा पूछे गए सवालों से भागते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। हालाँकि, ऐसी घटनाएं केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अन्य देशों में भी देखी जाती रही हैं।
यह मामला उस समय सामने आया जब NBC News के प्रसिद्ध कार्यक्रम 'मीट द प्रेस' (Meet the Press) के दौरान ट्रम्प से सवाल किए जा रहे थे। जब महिला पत्रकार क्रिस्टन वेल्कर (Kristen Welker) ने ट्रम्प से तीखे सवाल पूछने शुरू किए, तो ट्रम्प उन्हें नजरअंदाज करते नजर आए। मामला जब ज्यादा उलझता गया, तो ट्रम्प ने बीच कार्यक्रम से जाने का फैसला किया और वहाँ से चले गए। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। ट्रम्प का इस तरह सवालों से भागना कुछ ऐसे अन्य नेताओं की याद दिला गया, जो मीडिया के तीखे सवालों का सामना करने से बचते हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मीडिया के सवालों से कई बार किनारा कर चुके हैं।
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नरेंद्र मोदी साल 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने मीडिया का उस तरीके से सामना नहीं किया, जैसा कि पूर्व के प्रधानमंत्री करते आए थे। इस संदर्भ में पत्रकार करण थापर के साथ हुआ उनका साक्षात्कार अक्सर चर्चा में रहता है। यह बात तब की है जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। अक्टूबर 2007 में करण थापर उनका साक्षात्कार लेने के लिए गुजरात गए थे। जब करण थापर ने गोधरा कांड से जुड़े सवाल मोदी के सामने रखे, तो नरेंद्र मोदी असहज हो गए। उन्होंने कहा कि उन्हें पानी पीना है और तुरंत माइक हटाकर इंटरव्यू देने से इनकार कर दिया। मोदी ने कहा था, “आप अपनी राय रखने के लिए स्वतंत्र हैं... मैं यह इंटरव्यू नहीं करना चाहता। आपकी और हमारी दोस्ती बनी रहे।” करण थापर ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन मोदी ने साक्षात्कार से साफ इनकार कर दिया।
प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी पर यह आरोप लगता रहा है कि उन्होंने अब तक कोई खुली प्रेस वार्ता (Open Press Conference) नहीं की है। आरएसएस और बीजेपी के कुछ खास नेताओं का मानना है कि गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी मीडिया के सवालों से परेशान हो गए थे, उस समय उनकी छवि पर नकारात्मक असर पड़ा। इसलिए, उन्होंने एक रणनीति के तहत यह फैसला लिया कि अब पारंपरिक मीडिया का सामना नहीं करना है। हालाँकि, नरेंद्र मोदी ने कई बार कहा है कि अब की मीडिया पहले जैसी नहीं रही, इसलिए वह अब मीडिया से ज्यादा रूबरू होने में विश्वास नहीं रखते।
मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। मीडिया जनता और सरकार के बीच एक पुल की भूमिका निभाता है। लेकिन भारत में मीडिया की भूमिका काफी समय से सवालों के कटघरे में है। राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि आज की मीडिया एक खास किस्म की विचारधारा से प्रेरित होकर एजेंडे पर काम करती है, जिस कारण मीडिया अब निष्पक्ष नहीं रह गया है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया का होना अनिवार्य है। इसके अलावा देश के शीर्ष नेताओं का मीडिया से रूबरू न होना भी लोकतंत्र के लिए एक खतरा माना जाता है।
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