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भारत की राजनीति में सांप्रदायिकता एक अनकहा मुद्दा है। भारत में सभी लोगों को अपने मन मुताबिक धर्म को मानने और पूजा करने की आजादी है। धर्म में परंपराओं का समावेश होता है। समय के साथ बहुत सारी परम्पराएं अप्रासंगिक हो जाती हैं इसलिए उनको त्यागने का मुहिम समय-समय पर चलाया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ने मुसलमानों पर एक बयान दिया है। यह बयान अब चर्चा का विषय बनता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने मुसलमानों पर बयान देकर सुर्खियां बटोर ली हैं।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कन्डेय काटजू ने एक निजी चैनल पर साक्षात्कार में मुसलमनों के ऊपर टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कन्डेय काटजू ने कहा है कि मुसलमानों को अगर विकास की मुख्यधारा में आना है तो चार चीजें छोड़नी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि शरिया, बुर्का, मौलाना और मदरसा मुसलमानों के पिछड़े बनने में सबसे बड़ा कारण हैं। उन्होंने कहा कि ये चार चीजें ऐसी हैं जो मुसलमानों के एक बड़े समुदाय को विकास की मुख्यधारा से वंचित रखती हैं।
शरिया के बारे में उन्होंने कहा कि यह कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है। सामाजिक आवश्यकतानुसार नियमों का निर्माण किया जाता है। बदलते समय के साथ यदि नियमों-कानूनों की प्रासंगिकता खत्म हो जाए तो उसे हटा देना चाहिए। काटजू ने हिन्दू धर्म का उदाहरण देते हुए बताया कि बहुत सारी चीजें हिन्दू धर्म में खत्म कर दी गईं, लेकिन हिन्दू धर्म खत्म नहीं हुआ और लोग आज भी मंदिर में जाते हैं। काटजू का कहना है कि धार्मिक आजादी शरिया से बाधित होती है इसलिए मुसलमानों को इसे नहीं मानना चाहिए।
उनका कहना है कि नमाज पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं है, ईश्वर की आराधना में कोई समस्या नहीं है लेकिन शरिया के नियमों का आज के समय में पालन करना प्रासंगिक नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि वो धार्मिक आजादी के कट्टर समर्थक हैं।
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मार्कन्डेय काटजू का जन्म 20 सितंबर 1946 को लखनऊ में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके दादा डॉ. कैलाश नाथ काटजू स्वतंत्रता सेनानी थे। डॉ. कैलाश नाथ काटजू बाद में मध्यप्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री बने। उनका पहला कार्यकाल 31 जनवरी 1957 से 14 मार्च 1957 और दूसरा कार्यकाल 14 मार्च 1957 से 11 मार्च 1962 तक था। कांग्रेस में मार्कंडेय काटजू के दादा डॉ. कैलाश नाथ काटजू का बहुत अच्छा प्रभाव था। नेहरू परिवार और काटजू परिवार दोनों कश्मीरी पंडित थे इसलिए भी दोनों के निजी और राजनीतिक संबंध अच्छे थे।
मार्कन्डेय काटजू के पिता एस एन काटजू इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। मार्कन्डेय काटजू ने अपनी कानून की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय (University of Allahabad) से पूरी की है। अपने व्यावसायिक जीवन की शरुआत इन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय से की। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में मार्कन्डेय काटजू जज (2006-11) भी रह चुके हैं। मार्कन्डेय काटजू ने अपने बहुत सारे बयान दिए हैं जो आज के समय में बहुत विवादित माना जाता है। उन्होंने बहुत बार यह बात कही है कि भारतीय लोकतंत्र में उनका भरोसा नहीं है। जजों के बारे में उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के बहुत सारे जज भ्रष्ट हैं इसलिए न्याय होने में देरी होती है।
धर्म के बारे में मार्कन्डेय काटजू ने जो बात बोला है उसके पीछे का तर्क भी उन्होंने दिया है। उनका कहना है कि इस्लाम में जिस तरीके से परंपराओं ने लोगों को जकड़कर रखा है अगर मुस्लिम लोग अपने खराब परंपराओं को नहीं छोड़ेंगे तो उनकी तरक्की संभव नहीं है। मौलानाओं ने पूरे मुस्लिम समाज को जकड़ लिया है, परंपराओं और रीतियों के नाम पर मुट्ठी भर लोग पूरे समाज पर शासन करते हैं। समय के साथ उन चीजों का त्याग कर देना चाहिए जिनकी प्रासंगिकता समाप्त हो गई हो।
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