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दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (दिलशादगार्डन) में मरीजों की लंबी कतार रोज दिखाई पड़ती है। 31 अगस्त 2026 को इंडियन एक्स्प्रेस में अस्पताल की व्यवस्था को लेकर खबर छापी गई जिसमें अस्पताल के प्रशासन, खाली पदों, मरीजों की समस्या का जिक्र किया गया था। इसके बाद अस्पताल का प्रशासन सवालों के घेरे में आ गया। इसी क्रम में 8 सितंबर 2026 को न्यूज़ग्राम की टीम दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट पहुँची। मरीजों से बातचीत करने के बाद कुछ बातें सामने निकलकर आईं, जिनसे अस्पताल के प्रशासन पर कई सवाल खड़े होते हैं।
35 वर्षीय याशमीन नामक महिला मरीज ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि जून 2026 से ही वह इलाज कराने के लिए अस्पताल का चक्कर लगा रही हैं। उन्होंने बताया कि अस्पताल में अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) कराने के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा। 20 जुलाई 2026 को उनका अल्ट्रासाउंड हो पाया। उनको यूटेरिन फाइब्रॉइड (Uterine Fibroid) की समस्या है।
उन्होंने बताया कि इलाज कराने का क्रम जारी रहा, लेकिन अब उनको इधर से उधर घुमाया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा, “डॉक्टर से पुनः मिलने हेतु नई पर्ची बनवाने के लिए हमसे बोला गया। हम नई पर्ची बनवाने गए तो सर्वर डाउन था, जिसकी वजह से पर्ची नहीं बन पा रही है।” याशमीन के 6 बच्चे हैं। उनके पति ऑटो ड्राइवर हैं। उन्होंने कहा कि हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं कि हम बाहर निजी अस्पताल में इलाज करा सकें।
39 वर्षीय सबीना बेगम ने बताया, “मुझे ब्रेस्ट कैंसर है। मुझे लगभग 1.5 साल हो गए यहाँ आते हुए। कीमोथेरेपी के लिए बहुत मशक्कत करना पड़ता है। आज हमारा कीमोथेरेपी (Chemotherapy) होना था, लेकिन यह बोला गया कि अभी ये उपलब्ध नहीं है, 5-6 दिन बाद आइए।” सबीना आगे कहती हैं कि इस तरीके से इलाज हुआ तो हमारा ठीक हो पाना मुश्किल है।
सबीना के पति अफ़रोज़ ने बताया, “प्रत्येक 21 दिन पर इंजेक्शन लगता है। आज (8 सितंबर 2026) इंजेक्शन लगना था, लेकिन हमें बोला गया कि अभी संभव नहीं है। हमसे बोला गया कि समय पर आ गया तो ठीक है, नहीं तो बाहर से लगवाइए।” अफ़रोज़ अपनी पत्नी सबीना बेगम के साथ दिल्ली के सीमापुरी इलाके में सब्जी की दुकान लगाते हैं और किराए के मकान में रहते हैं।
कैंसर अस्पताल (Cancer Hospital) के भीतर एक युवक काफी परेशान नजर आ रहा था। बातचीत करने पर युवक ने (नाम न बताने की शर्त पर) बताया, “उसके चाचा को संजय गांधी अस्पताल से दिल्ली स्टेट कैंसर अस्पताल रेफर किया गया है, लेकिन यहाँ कोई नहीं सुन रहा है। चाचा की हालत बहुत सीरियस है।” आगे बात करने पर उन्होंने बताया कि दिल्ली के नांगलोई में रहने वाले 48 वर्षीय सतीश का इलाज विगत 8 महीने से संजय गांधी अस्पताल में चल रहा था। उनके लिवर में समस्या है।
न्यूज़ग्राम की टीम ने दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (दिलशादगार्डन) की पीआरओ (PRO) रंजना कुमारी से बात की तो उन्होंने कहा कि डायरेक्टर सविता अरोड़ा के पास समय का अभाव है, इसलिए फिलहाल उनसे मुलाकात नहीं हो सकती है।
पीआरओ रंजना कुमारी से जब इन सारी समस्याओं पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि कभी-कभी मरीज को सारी बात पता नहीं होती है और वो घर चले जाते हैं। अस्पताल में कीमोथेरेपी (Chemotherapy) की समस्या पर सवाल करने पर उन्होंने कहा कि कीमोथेरेपी (Chemotherapy) अलग-अलग तरीके का होता है। मरीज के कैंसर पर निर्भर करता है कि कीमोथेरेपी (Chemotherapy) किस प्रकार दिया जाए।
वहीं अस्पताल में मशीनों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने इशारों में ही कहा कि इस पर हम क्या ही बोलें। फिर उन्होंने कहा कि मशीनों से मरीज के बीमारी की जाँच हो रही है, इसका मतलब मशीनें सही हैं। उन्होंने कहा कि कुछ मीडिया वाले आधी खबर ही छापते हैं। न्यूज़ग्राम की तरफ से जब यह कहा गया कि आप सही बात को कैमरे पर बोलिए तो उन्होंने कैमरे पर कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि इतना बड़ा सप्लाई चेन (Supply chain) है, कभी-कभी सुविधाएँ अस्पताल तक पहुँचने में देरी कर जाती हैं, हम किसी को दोषी नहीं बता सकते।
दिल्ली में शीला दीक्षित (काँग्रेस) की सरकार थी। 5 अप्रैल 2006 को शीला दीक्षित सरकार ने इस अस्पताल के स्थापना की घोषणा की। 2024-25 में दिल्ली सरकार (AAP) ने इलाज और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए लगभग 130 करोड़ का बजट अनुमान रखा था। वहीं 2025-26 में दिल्ली सरकार (BJP) ने 125-130 करोड़ रुपये निर्धारित किए थे।
इतना बजट होने के बावजूद सरकारी अस्पताल में मरीजों का इधर-उधर दौड़ना और परेशान होना कई सवाल खड़े करता है, जिसका जवाब अस्पताल के आला अधिकारी कैमरे पर देने से अक्सर कतराते हैं। प्रशासनिक लापरवाही पर सवालों का सामना करना पड़ता है।
इंडियन एक्स्प्रेस की खबर पर पीआरओ (PRO) रंजना कुमारी ने कहा कि उन्होंने खबर अधूरी छापी है, दूसरी तरफ डायरेक्टर और पीआरओ (PRO) ने स्वयं कैमरे पर आकर बोलने से परहेज किया। यह दिखाता है कि अस्पताल का प्रशासन सवालों से बचने की कोशिश कर रहा है। कैमरे से स्वयं को छुपा लेने से लापरवाही को चादर नहीं से नहीं ढका जा सकता है।
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