

माधव सदाशिवराव गोलवलकर पर आरोप है कि उन्होंने 1960 में एक भाषण में कहा कि दक्षिण भारत की नस्ल सुधारने के लिए उत्तर भारत के ब्राह्मणों और दक्षिण भारतीय महिलाओं के बीच क्रॉस-ब्रीडिंग की परंपरा थी। यह कथन बाद में बहुत विवादित हुआ और इसे ऑर्गनाइज़र (Organiser) में भी प्रकाशित बताया गया।
गोलवलकर की किताब बंच ऑफ थॉट (1966) में उन्होंने मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को आंतरिक खतरा बताया। आलोचकों ने इसे भारत की बहुसांस्कृतिक पहचान के खिलाफ माना, जबकि बाद में मोहन भागवत ने विवादित विचारों से किया किनारा।
दक्षिण भारत में पेरियार के द्रविड़ आंदोलन और उनकी पुस्तक The Ramayana: A True Reading (1959) ने उत्तर भारतीय प्रभुत्व और ब्राह्मणवाद को चुनौती दी, जिससे उत्तर-दक्षिण पहचान की राजनीति और तेज हो गई।
राष्ट्रीय स्वयं संघ के संस्थापक हेडगेवार के बाद संघ में दूसरा नाम माधव सदाशिवराव गोलवलकर का आता है। गोलवलकर ने संघ की कमान लगभग 33 साल (साल 1940 से 1973) संभाली थी। गोलवलकर ने उत्तर भारत के ब्राह्मण और दक्षिण भारत के ब्राह्मणों के बारे में बताया था कि उत्तर भारत के नंबूदरी ब्राह्मणों की सहायता से दक्षिण भारत की महिलाओं से संतान उत्पन्न किया जाता था जिससे दक्षिण भारत के नस्ल को सुधारा जा सके।
आरएसएस प्रमुख माधव सदाशिवराव गोलवलकर ने साल 1960 में गुजरात विश्वविद्यालय में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा था कि दक्षिण भारत के लोगों की नस्ल अच्छी नहीं थी, इसलिए उत्तर भारत के ब्राह्मणों से क्रॉस ब्रीडिंग कराने के लिए नंबूदारी ब्राह्मणों को दक्षिण भारत में लाया गया। इसके बाद यह नियम बनाया गया कि किसी भी विवाहित महिला का पहला पुत्र नंबूदरी ब्राह्मण से उत्पन्न होना चाहिए जिससे दक्षिण भारत की नस्ल को सुधारा जा सके। गोलवलकर के इस बयान को आरएसएस की ऑर्गेनाइज़र पत्रिका ने भी छापा था। उनके इस बयान के बाद उस समय राजनीतिक हलचल तेज हो गई थी।
इस मामले को कन्नड़ साहित्य के प्रसिद्ध साहित्यकार देवनूर महादेव ने अपनी रचना आरएसएस आला मट्टू अगाला (RSS: Aala Mattu Agala) में बताया कि आरएसएस के गोलवलकर की नस्लीय भेद वाली मानसिकता का परिचय हुआ। महादेव ने कहा कि गोलवलकर ने इसके बाद अपने बयान को वापस लेने की बात कही। महादेव का कहना है कि अगर गोलवलकर ने माफी मांगी है, तो ऐसा झूठ क्यों बोलते हैं और अगर गोलवलकर की कही हुई बात सत्य है, तो फिर क्या गोलवलकर ने ये सारी घटना स्वयं देखा है?
बता दें कि गोलवलकर के इस बयान को आरएसएस समर्थित पत्रिका आर्गेनाइज़र ने 2 जनवरी 1961 को अपने एक लेख के रूप में छापा था।
गोलवलकर की अपनी किताब बंच ऑफ थॉट (Bunch of Thoughts) साल 1966 में जब आई तो इस पर आलोचकों ने जमकर विवाद खड़ा कर दिया। गोलवलकर ने अपने इस किताब में तीन खतरों का जिक्र करते हुए बताया कि मुस्लिम, ईसाई और कम्युनिस्ट इस देश के लिए एक खतरा हैं। साथ में गोलवलकर ने भारत राष्ट्र की पहचान को केवल एक संस्कृति वाले देश के रूप में बताने का प्रयास किया।
उनके इस सिद्धांत को आलोचकों ने चुनौती देते हुए कहा कि यह भारत के बहुसंस्कृतिवाद के खिलाफ है। उनका कहना था कि भारत एक मिली-जुली संस्कृति का देश है। इस तरीके के बयान से यहाँ की विविधता को चुनौती दी जा रही है। हाल ही में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से जब गोलवलकर के इस विचार के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सभी लोग इसी देश में जन्में हैं। सब आपस में भाई हैं।
भागवत ने गोलवलकर के उस विवादित भाग से अलग होकर उनको समझने का सुझाव दिया। मोहन भागवत का साफ इशारा था कि वे गोलवलकर की किताब से स्वयं पूरी तरीके से सहमत नहीं हैं।
साल 2015 में बिहार की सियासत का एक मुद्दा बन गया था जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने यह बयान दिया था कि आरक्षण पर पुनर्विचार करना चाहिए। इसके बाद बिहार के लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) ने इस मुद्दे के बहाने पूरे संघ परिवार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और पूरे चुनाव में गोलवलकर की किताब बंच ऑफ थॉट को इस तरीके से पेश किया कि साल 2015 में लालू यादव को बिहार विधानसभा चुनाव में सफलता हासिल हुई।
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भारत की आजादी के समय से ही उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय पहचान आधारित राजनीति पूरे देश में हावी रही है। दक्षिण भारत में द्रविड़ पहचान को लेकर इरोड वेंकट रामास्वामी नायकर ने उत्तर भारत के श्रेष्ठता वाले भ्रामक सिद्धांत (Misleading theories of North Indian superiority) को चुनौती दिया। पेरियार ई.वी. रामास्वामी द्वारा रचित सच्ची रामायण (The Ramayana: A True Reading) साल 1959 में प्रकाशित हुई और उन्होंने पूरे वाल्मीकि रामायण से हटकर दशरथ पुत्र राम के चरित्र को अलग तरीके से व्याख्यायित किया।
ये मामला इस कदर आगे बढ़ा कि पूरे तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत की राजनीति से निकली हिन्दी विरोध और ब्रह्मणवाद के विरोध के आग की लपटें, दिल्ली की सियासत तक पहुँच गई। आज भी दक्षिण भारत में सामान्य तौर पर अयोध्या के श्रीराम को उत्तर भारत का भगवान बताया जाता है।
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