

राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने मध्यप्रदेश के धिरौली कोयला खदान क्षेत्र में खनन की अनुमति को लेकर केंद्र सरकार, राज्य सरकार और गौतम अडानी की कंपनी को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस पर्यावरणीय मंजूरी के खिलाफ दायर याचिका पर दिया गया है।
पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे ने आरोप लगाया है कि खनन परियोजना के लिए लगभग 5.70 लाख पेड़ों की कटाई की तैयारी है, जिससे पर्यावरण और वन्य जीवों को गंभीर नुकसान हो सकता है। साथ ही कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि जिन किसानों की जमीन ली गई है उन्हें समय पर मुआवजा नहीं मिला।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने सभी पक्षों से शपथपत्र के रूप में उत्तर मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 22अप्रैल 2026 को तय की गई है।
मध्यप्रदेश में गौतम अडानी को करारा झटका लगा है। एनजीटी ने केंद्र सरकार और राज्य सरकार को नोटिस भेजा है। कांग्रेस ने इस मामले पर भाजपा पर आरोप लगाया है कि जिन गावों में किसानों की जमीन ली गई है, उनको सही समय पर मुआवजा नहीं मिल रहा है। वहीं एन जी टी (NGT) की तरफ से जारी नोटिस ने सूबे की सियासत का पारा हाई कर दिया है।
दरअसल, केंद्र सरकार ने मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में अडानी समूह को धिरौली कोयला ब्लॉक में खनन के लिए पर्यावरण मंजूरी दे दी थी। अब एन जी टी ने इस मामले में केंद्र सरकार और राज्य सरकार के साथ में अडानी को नोटिस जारी क्या है।
इस कोयला ब्लॉक की नीलामी साल 2020 में हुई थी। इस नीलामी में अडानी की सहायक कंपनी स्ट्रैटेटेक मिनरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड (Stratatech Mineral Resources Pvt. Ltd) ने अपने नाम किया।
कोयला मंत्रालय के आदेश संख्या NA-104/07/2020-NA के अनुसार, धिरौली कोयला ब्लॉक, 3 मार्च 2021 को अंतिम रूप से स्ट्रैटेटेक मिनरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड को आवंटित किया गया। इसके बाद साल 2025 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद कोयला मंत्रालय ने इसके खनन की अनुमति अडानी की कंपनी को दे दिया। इसके खिलाफ अजय दुबे नाम के शख्स ने याचिका दायर की।
अडानी (Adani) की सहायक कंपनी को मिली मंजूरी के खिलाफ पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे ने एन जी टी (NGT) में याचिका दायर की थी, जिसकी सुनवाई 17 फरवरी 2026 को होनी थी। इसके बाद एन जी टी (NGT) ने केंद्र सरकार, राज्य सरकार और अडानी की कंपनी को नोटिस 26 फरवरी 2026 को भेज दिया।
अजय दुबे का आरोप है कि इस खनन के तहत लगभग 5.7 लाख पेड़ों को काटने की तैयारी है जिसकी इजाजत कोयला मंत्रालय ने दिया है। उनका कहना है कि इतने बड़े स्तर पर पेड़ों की कटाई से आस-पास के वातावरण पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
इस क्रम में वन में रहने वाले जीवों पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा। एन जी टी ने अपने जारी नोटिस में कहा है कि अगली सुनवाई से एक सप्ताह पहले जवाब हलफनामे के रूप में जमा हो जाना चाहिए। वहीं मामले से संबंधित अगली सुनवाई 22 अप्रैल को होना तय हुआ है।
यह पहला मामला नहीं है जब पर्यावरण को बचाने के लिए कोई शख्स लड़ाई लड़ रहा है। इसके पहले भी ऐसे बहुत सारे अवसर आए हैं, जब विकास के नाम पर विनाश को चुना गया है। हाल ही हसदेव अरण्य (छत्तीसगढ़ का फेफड़ा कहा जाता है) की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई। इसके खिलाफ आदिवासी समुदाय के लोगों ने जमकर सरकार के सामने आंदोलन-धरना प्रदर्शन किया, लेकिन सरकार ने आँख मूंदकर साल 2022 में जंगल को काटकर खनन की अनुमति दे रखी थी।
वन विभाग ने हसदेव जंगल के 1742.6 हेक्टेयर एकड़ भूमि को खनन के इस्तेमाल हेतु अनुमति दे दी। यह फैसला पारिस्थितिकी संतुलन को काफी नुकसान पहुँचने वाला था। इसके खिलाफ हसदेव अरण्य बचाने के लिए स्थानीय लोगों ने 17 अक्टूबर 2024 को प्रदर्शन किया और यह प्रदर्शन काफी हिंसक भी साबित हुआ। जंगल को बचाने के लिए आदिवासियों ने जल-जंगल-जमीन का नारा बहुत लगाया, लेकिन सरकार का फैसला अडिग था। यहाँ भी अडानी की कंपनी को खनन की अनुमति सरकार की तरफ से दी गई थी।
एक तरफ जहां नरेंद्र मोदी और अडानी की दोस्ती को लेकर विपक्ष आरोप लगता है, तो दूसरी तरफ अडानी को लेकर इस तरीके के फैसले जब आते हैं तो उनके आरोपों पर मुहर लग जाती है।
बता दें कि अडानी की कंपनी और उनके ऊपर अमेरिका में भी धोखाधड़ी के आरोप में केस पहले से चल रहा है। विपक्ष का आरोप है कि अडानी को बचाने के लिए नरेंद्र मोदी सत्ता का दुरुपयोग करते हैं।
राष्ट्रीय हरित ट्रिब्यूनल (National Green Tribunal) की स्थापना साल 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत की गई थी। यह अधिकरण उन मामले से संबंधित विवादों की सुनवाई करती है, जो प्रायः पर्यावरण जुड़े होते हैं।
इस ट्रिब्यूनल में उच्च न्यायालय के जज या फिर सर्वोच्च न्यायालय के जज न्यायिक सदस्य के रूप में होते हैं। विशेषज्ञ सदस्य के रूप में इसमें पर्यावरण के विशेषज्ञ शामिल होते हैं। इनसे मिलकर बनी बेंच फैसला सुनाती है।
इस ट्रिब्यूनल को में कोई भी एनजीओ, पर्यावरण एक्टिविस्ट याचिका दायर कर सकता है। प्रायः छह महीने के भीतर सुनवाई और फैसला हो जाता है। हालांकि राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के धारा 22 के तहत इसके फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की जा सकती है।