

लद्दाख में स्थित तुरतुक भारत का सबसे अंतिम गाँव है, जो 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान से भारत का हिस्सा बना। काराकोरम पर्वतमाला की गगनचुम्बी चोटियों और शायोक नदी के किनारे बसा यह गाँव आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
इस गाँव का सबसे मनोरम दृश्य गर्मियों में दिखता है, जब पूरा इलाका खुबानी के पेड़ों से लद जाता है। सफेद और गुलाबी फूलों की चादर और फलों की खुशबू इस जगह को धरती का स्वर्ग बना देती है।
तुरतुक की यात्रा के लिए लेह प्रशासन से इनर लाइन परमिट (ILP) लेना अनिवार्य है, जो 5 दिनों के लिए मान्य होता है।
भारत प्राचीन काल से ही दुनिया के पर्यटन का केंद्र बना हुआ है। पर्यटकों के लिए भारत में बहुत सारे जगह हैं जहां भारत में जाकर आनंद का लुत्फ उठा सकते हैं। भारत के कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर की वादियों तक हर किसी को भारत में यात्रा करना बेहद मनोरम लगता है। पाकिस्तान भारत के सीमा पर एक ऐसा गाँव है जो आजकल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
तुरतुक गाँव भारत-पाक सीमा (India-Pakistan border) पर सबसे अंतिम गांव है। यह गाँव भारत के लद्दाख राज्य में है जो कि बहुत रमणीय है।
यहाँ की सबसे खास बात यह है कि गांव में फलों, खास तौर पर खुबानी की खेती की जाती है। इस गाँव का दृश्य गर्मियों के मौसम में बेहद आकर्षक होता है। दरअसल गर्मियों के मौसम में यह गाँव खुबानी के पेड़ों से लदा होता है, ये खुबानी इतने खूबसूरत लगते हैं कि पूरा का पूरा गाँव स्वर्ग जैसा लगता है।
इसके इतिहास की बात की जाए तो भारत में यह गांव साल 1971 में शामिल हुआ था लेकिन इसके पहले यह पाकिस्तान में था। आजकल पर्यटकों के बीच यह गांव चर्चा का विषय बना हुआ है।
इस गाँव की विशेषता यह है कि गाँव के चारों तरफ बहुत विशाल पर्वत हैं जो इसे बेहद खूबसूरत आकार देते हैं और ताजगी का भी अहसास कराते हैं। इस गांव के आसपास काराकोरम पर्वतमाला भी है। इन गगन चुम्बी पहाड़ों के बीच बसे इस गाँव से ऐसा लगता है कि धरती और आसमान के बीच फासले को कम हो रहे हैं।
लगभग 2500 के आस-पास जनसंख्या वाले इस गाँव के बिल्कुल पास से ही शायोक नदी नदी निकली है जो इसकी रमणीयता को चार चांद लगा देती है। गर्मियों के महीने में खुबानी के पेड़ों पर सफ़ेद और गुलाबी फूल खिले होते हैं। ऐसा लगता है मानो जन्नत से पुष्प की वर्षा कराई गई हो। इसके अलावा यहां पर बाल्ती संस्कृति की झलक भी मिलती है। यहाँ पर पुराने नक्काशीदार मस्जिद और लकड़ियों के बने बहुत से घर बेहद आकर्षक लगते हैं।
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तुरतुक गाँव (Turtuk Village) की सैर करने से पहले यह जान लेना बेहद जरूरी है कि कहाँ-कहाँ रुकने का जगह है। कई बार ऐसा होता है कि पर्यटकों को जानकारी नहीं होती है और वे परेशान हो जाते हैं। गाँव के आस-पास कम पैसे में बहुत सारे होटल मिल जाते हैं। होटल के खर्च सामान्य तौर पर 800 से 1000 रुपए तक होते हैं। इतने पैसे में रहना और नाश्ता-पानी भी हो जाता है।
लेकिन इसके अलावा यहाँ पर पुराने जमाने के खूबसूरत घर बने हुए हैं। यहाँ पर रुकना दो तरीके से फायदा होता है। एक फायदा यह होता है कि 500 के नीचे ही आराम से रुकने की व्यवस्था हो जाती है, साथ ही बाल्ती संस्कृति को जानने और समझने का मौका भी मिल जाता है।
तुरतुक गाँव घूमने के लिए सबसे पहले लेह जिला प्रशासन से इनर लाइन परमिट (Inner line permit) लेना होता है। परमिट केवल 5 दिनों के लिए ही मिलता है। परमिट के बारे में जानकारी सीधे प्रशासनिक कार्यालय से प्राप्त कर सकते हैं या लेह में किसी भी ट्रैवल कंपनी से पूछ सकते हैं। इसके बाद 5 दिनों तक पर्यटकों को ऐसा लगता है मानो जन्नत की सैर कर रहे हों। परिवार के साथ भी ऐसे जगह पर जाना काफी अच्छा होता है।
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