

दुनिया के अलग-अलग समाजों में महिलाओं से जुड़ी कई परंपराएँ रही हैं, जिनमें कुछ बहुत हानिकारक हैं और महिलाओं के शरीर व अधिकारों का उल्लंघन करती हैं।
उदाहरण के तौर पर ब्रेस्ट आयरनिंग, फीमेल जेनिटल म्युटेशन, गर्दन लंबी करने की प्रथा, विधवाओं के कठोर रीति-रिवाज और जबरदस्ती वजन बढ़ाने जैसी प्रथाएँ कई देशों और समुदायों में प्रचलित रही हैं।
इन प्रथाओं को आज मानवाधिकारों के खिलाफ माना जाता है और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ तथा सरकारें इन्हें खत्म करने के लिए प्रयास कर रही हैं।
हर भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले लोगों की अपनी पहचान होती है। हर समाज में कुछ नियम बने होते हैं, कुछ प्रथाएं होती हैं, जिनका उस समाज के लोगों द्वारा पालन करता होता है। महिलाओं को लेकर अलग-अलग तरीके के प्रथाओं का प्रचलन बढ़ा। कुछ प्रथाओं का आज उन्मूलन हो गया है, जैसे-भारत में सती प्रथा को अवैध घोषित कर दिया गया। लेकिन कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां महिलाओं के लिए ऐसे नियम बने हैं जिन्हे जानकार कलेजा दहल जाता है
ब्रेस्ट आयरनिंग में एक लड़की जो अभी बड़ी हो रही है, जिसके शरीर का विकास हो रहा है, उसके स्तन को किसी गर्म औजार जैसे कि गर्म पत्थर, हंसिया इत्यादि से दबाया जाता है ताकि उसके स्तन का आकार ज्यादा बड़ा न हो सके।
बच्चों के माता-पिता का मानना रहता है कि इससे उनकी बच्ची पुरुषों के आकर्षण का केंद्र बनने से बच जाएंगी। इससे बच्चियाँ बलात्कार का शिकार होने से बच सकती हैं और जल्दी गर्भवती नहीं होंगी। इस तरीके की प्रथाएं कैमरून, नाइजीरिया, टोगो, गिनी और चाड जैसे देशों में प्रचलित हैं। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस तरीके के मामलों को महिलाओं के खिलाफ माना है और इसको महिलाओं के खिलाफ हिंसात्मक गतिविधि माना है।
कायन समुदाय, दक्षिण एशिया में म्यांमार, थाईलैंड (Myanmar, Thailand) जैसे देशों में पाई जाती हैं। इन समुदायों में यह प्रचलन है कि जब उनकी बच्ची 5 वर्ष की आयु पूर्ण कर लेती है तो उनके गर्दन में पीतल के छल्ले पहना दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे कन्या की गर्दन भविष्य में लंबी होगी। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता है कन्या के गर्दन में पीतल के छल्लों की संख्या बढ़ती जाती है। महिलाओं की लंबी गर्दन आज भी यहाँ की परम्परा और संस्कृति में जीवित है।
फीमेल जेनिटल म्युटेशन (Female Genital Mutation) प्रथा, बड़ा ही खतरनाक प्रथा है। इस प्रथा में महिलाओं के जननांगों के बाहरी हिस्से को काटकर निकाला जाता है। इस कार्य के पीछे कोई विशेष कारण नहीं बताया जाता है बल्कि यह धारणा है कि इससे महिला की शुद्धता बनी रहती है। यह पूरे समाज में एक नैतिकता माना जाता है। जिस तरीके से खतना किया जाता है यह प्रक्रिया भी उसी तरीके की होती है। यह प्रथा अफ्रीका (Africa), मध्य पूर्व, भारत, मलेशिया और यूरोप जैसे इलाकों में कुछ आदिवासी या प्रवासी समुदायों में प्रचलित है।
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अफ्रीका में बहुत सारे ऐसे समुदाय हैं जहां महिलाएं जब विधवा हो जाती हैं, तो उनके साथ बड़ा ही खतरनाक व्यवहार किया जाता है। वे महिलाएं जिनके पति का देहावसान हो चुका है उनको तब तक खाना और पीना नहीं है जब तक वे जोर-जोर से रो नहीं लेती हैं। साथ ही जल्दी उनको दूसरे विवाह के लिए दबाव बनाया जाता है। कुछ समुदायों में यौन शुद्धिकरण जैसी प्रथाएं हैं जो काफी हिंसक होती हैं। इसमें एक विधवा को अपने पति के किसी रिश्तेदार के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जाता है ताकि उसका यौन शुद्धिकरण किया जा सके। इस तरीके की प्रथाएं लुआ (Luo) समुदाय, टोंगा और बेम्बा (Tonga and Bemba), औशी (Aushi) समुदाय में प्रमुखता से फैली हुई हैं।
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लेब्लौह नाम के इस प्रथा में यह प्रावधान है कि लड़की को ज्यादा ऐसे सामग्री खिलाई जाती है जिससे उनका वजन बढ़े। यह इसलिए किया जाता है कि अफ्रीका के मॉरिटानिया एवं आसपास के इलाकों में वजन वाली लड़की को ज्यादा पसंद किया जाता है। लड़की को मोटी करने के लिए घर के लोग उसे बाजरा, मक्खन और ऊंटनी का दूध इत्यादि बहुत ज्यादा मात्रा में देते हैं। हालांकि कभी-कभी इस तरीके के सेवन से लड़की का स्वास्थ्य बिगड़ भी जाता है।
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