'जब तक हड्डी ना टूटे पीटो...', भारत के पड़ोसी देश में नया फरमान, महिलाओं पर घरेलू हिंसा की मिली खुली छूट

भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान (तालिबान) की तरफ से 4 जनवरी 2026 को एक नया दंड संहिता लाया गया है। इस दंड संहिता पर सर्वोच्च नेता (अमीर-उल-मोमिनीन) हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने हस्ताक्षर कर दिया है।
तालिबान  शासित अफगानिस्तान की संसद और दूसरी तरफ मुस्लिम महिला
भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान (तालिबान) की तरफ से 4 जनवरी 2026 को एक नया दंड संहिता लाया गया है। इस दंड संहिता पर सर्वोच्च नेता (अमीर-उल-मोमिनीन) हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने हस्ताक्षर कर दिया है।X
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  • महिला अधिकारों और न्यायिक समानता पर सीधा प्रहार: 4 जनवरी 2026 को लागू की गई तालिबान की नई दंड संहिता, जिस पर सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने हस्ताक्षर किए, महिलाओं की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से सीमित करती है।

  • हैसियत और धर्म के आधार पर असमान दंड व्यवस्था: इस संहिता में अफगान समाज को वर्गों (धार्मिक विद्वान, अभिजात, मध्यम और निम्न वर्ग) में बाँटकर सज़ा का प्रावधान किया गया है, जिससे समान न्याय की अवधारणा खत्म होती है।

  • मानवीय मूल्यों पर खतरा और वैश्विक चिंता: दासता जैसे शब्दों का प्रयोग, मानवाधिकारों की अनदेखी और कठोर नियंत्रण व्यवस्था ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है।

भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान की तरफ से 4 जनवरी 2026 को एक नया दंड संहिता लाया गया है। इस दंड संहिता पर सर्वोच्च नेता (अमीर-उल-मोमिनीन) हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने हस्ताक्षर कर दिया है। तालिबान के इस नए दंड संहिता को लेकर पूरे वैश्विक राजनीतिक समाज में माहौल गर्म है। इस मामले पर बहस अब तेज होती जा रही है। अफगानिस्तान में जब से तालिबान शासन आया है, लगातार मानवीय स्वतंत्रता और समानता को लेकर पहले से ही बहस चल रही थी। तालिबान के दंड संहिता ने वैश्विक मंचों पर इस बहस की धार को और तेज कर दिया है। 

दंड संहिता में विवाद का मुख्य कारण

दरअसल, साल 2021 में अफगानिस्तान से अमेरिका (America) ने  अपने सैनिकों को हटा लिया था। इसके बाद से वहाँ तालिबान का शासन आया। तालिबान शासन में मानवीय मूल्यों, स्वतंत्रता, समानता को लेकर चिंता अफगानिस्तान के लोगों में लगातार बनी रहती है। इसी बीच तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने 4 जनवरी 2026 को 90 पन्ने वाले 119 धाराओं, 10 अध्यायों और तीन खंडों में बने नए दंड संहिता पर अपनी मुहर लगा दी। इस दंड संहिता को लेकर अब बवाल मचा हुआ है। इस संहिता को महिला विरोधी संहिता बताया जा रहा है। इसमें पूरे अफगानिस्तान के लोगों को अलग-अलग वर्गों में विभाजित करके सजा के अलग-अलग प्रावधान किए गए हैं। 

न्यायिक समानता और महिला स्वतंत्रता पर प्रहार 

तालिबान के नए संहिता में महिलाओं को पुरुषों से नीचा दिखाने  का प्रयास हुआ है। इस संहिता में यह बताया गया है कि महिलाओं को अगर घर से बाहर जाना है तो अपने पति से पूछकर ही जाना है। अगर महिला अपने पति से बिना पूछे कहीं जाती है तो इसके बदले में उसे सजा हो सकती है। साथ ही नए संहिता में पुरुषों द्वारा महिला को पीटना कानून के खिलाफ नहीं माना जा सकता है।

एक महिला को उसके पति द्वारा पीटे जाने पर, महिला अदालत में किसी पुरुष (सगा-सम्बन्धी) के साथ ही जा सकती है। महिला की हड्डी टूट जाने जैसी घटना को ही संज्ञान में लिया जाएगा, साधारण तौर पर पीटे जाने पर कोई विशेष कार्रवाई का प्रावधान नहीं है। तात्पर्य यह है कि घरेलू  हिंसा को इस कानून के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है। तालिबान के इस नए संहिता से घरेलू हिंसा को बढ़ावा मिल सकता है। महिलाओं की स्वतंत्रता को बाधित किया जा सकता है। 

हैसियत के हिसाब से सजा का प्रावधान 

तालिबान के नए संहिता के अनुसार, अफगानिस्तान (Afganistan) में पूरे समाज को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है, जैसे -धार्मिक विद्वान, अभिजात वर्ग, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग। इसमें बताया गया है कि जिसकी हैसियत जैसी है उसी अनुसार उसे किसी भी मामले में सजा दिया जाएगा। तात्पर्य यह है सबके साथ एक समान न्याय नहीं किया जाएगा। तालिबान का यह नियम न्याय में असमानता और अनैतिकता को जन्म दे सकता है। 

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धार्मिक असमानता को बढ़ावा दे रहा तालिबान 

तालिबान के नए  संहिता के अनुसार, केवल  हनफी मत के अनुयायियों को ही सच्चा मुसलमान माना गया है। हनफी मत को छोड़ने पर अपराध माना जा सकता है और दंड भी दिया जा सकता है। तालिबान शासन में यह कानून अल्पसंख्यकों को दबाने का नया साधन बन सकता है। नए संहिता के प्रकाश में आने के बाद अफगानिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय के बीच स्थिति सामान्य नहीं है। यह धर्म के आधार पर भेदभाव को जन्म दे सकता है। 

दासता को बढ़ावा 

तालिबान (Taliban) के नए संहिता में कई बार दास जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के हिसाब से दासता को अवैध माना गया है। इस संहिता में जिस तरीके से मानवीय मूल्यों को किनारे रखकर व्यवस्था को चलाने की तैयारी है ऐसा लगता है, तालिबान ने नए संहिता बनाने के साथ में, भविष्य के किसी नए क्रांति के जन्म लेने की जमीन भी तैयार कर दी है।

इतिहास अभी तक साक्षी रहा है, जिस भी देश या समाज के किसी कालखंड में किसी भी नए कानून या संधि के माध्यम से किसी को बुरी तरह दबाने का प्रयास किया गया है, तो कानून बनते ही नए आंदोलन या फिर क्रांति के लिए नई जमीन अपने आप तैयार हो गई है। अगर तालिबान शासन में महिलाओं के खिलाफ जाकर व्यवस्था को संचालित करने का प्रयास किया जा रहा है, तो फिर अफगानिस्तान में नए क्रांति का गर्भधारण हो चुका है, ऐसा कहना गलत नहीं होगा। 

वैश्विक स्तर पर बयान

संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) की विशेष दूत Reem Alsalem का कहना है कि यह संहिता महिलाओं के खिलाफ है। उन्होंने वैश्विक समुदाय से इस मामले पर ध्यान आकर्षित करने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि यह सिर्फ अफगानिस्तान तक का मामला नहीं है बल्कि यह मानव अधिकार, वैश्विक न्याय और महिलाओं के अधिकार के खिलाफ है। तालिबान के नए दंड संहिता ने पूरे वैश्विक राजनीति का ध्यान अपनी तरफ फिर से आकर्षित कर लिया है। न्याय, स्वतंत्रता,समानता,मानवीय मूल्यों को लेकर फिर से बहस तेज हो रही है।  

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