

भारत रत्न (Bharat Ratna) देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। आमतौर पर हर व्यक्ति के लिए यह सम्मान गर्व और उपलब्धि का प्रतीक माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के इतिहास में कुछ ऐसे भी महान लोग हुए जिन्होंने यह प्रतिष्ठित सम्मान स्वीकार करने से ही साफ इनकार कर दिया? किसी ने अपने सिद्धांतों के कारण, किसी ने निष्पक्षता बनाए रखने के लिए, तो किसी ने सम्मान से ऊपर अपने आदर्शों को रखा। वहीं एक मामले में परिवार ने भी भारत रत्न लेने से इनकार कर दिया। आइए जानते हैं उन 4 लोगों के बारे में जिन्होंने भारत रत्न को ठुकराकर (4 People Who Turned Down the Bharat Ratna) पूरे देश को हैरान कर दिया और आखिर इसके पीछे क्या वजह थी यह भी जानतें हैं।
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (Maulana Abul Kalam Azad) भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी, प्रख्यात शिक्षाविद, लेखक और स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद (Maulana Abul Kalam Azad) का जन्म 11 नवंबर 1888 को मक्का, सऊदी अरब में हुआ था। उन्होंने देश में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1954 में जब भारत रत्न (Bharat Ratna) की शुरुआत हुई, तब उन्हें यह सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। इसकी वजह कोई नाराज़गी नहीं, बल्कि उनके मजबूत सिद्धांत थे। उनका मानना था कि जो लोग राष्ट्रीय सम्मानों के चयन या निर्णय प्रक्रिया से जुड़े हों, उन्हें स्वयं ऐसे सम्मान स्वीकार नहीं करने चाहिए। वे मानते थे कि सम्मान से अधिक महत्वपूर्ण ईमानदारी और निष्पक्षता है। यही कारण था कि उन्होंने देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान को भी विनम्रता से ठुकरा दिया। हालांकि, उनके निधन (1958) के कई वर्षों बाद 1992 में भारत सरकार ने उनके अतुलनीय योगदान को सम्मान देते हुए उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया। आज भी उनका यह निर्णय सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों का एक बेहतरीन उदाहरण माना जाता है।
हृदयनाथ कुंजरू (H. N. Kunzru) भारत के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, शिक्षाविद और राज्यसभा के सम्मानित सदस्य थे। इनका जन्म 1 अक्टूबर 1887 को कश्मीर में हुआ था। उन्होंने अपना पूरा जीवन सार्वजनिक सेवा, शिक्षा और राष्ट्रीय नीतियों के विकास के लिए समर्पित किया। वर्ष 1968 में भारत सरकार ने उनके योगदान को देखते हुए उन्हें भारत रत्न देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उन्होंने यह सम्मान स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसके पीछे कोई व्यक्तिगत कारण नहीं था, बल्कि उनका लोकतांत्रिक दृष्टिकोण था। उनका मानना था कि एक सच्चे लोकतांत्रिक गणराज्य में सरकार को नागरिकों को ऐसे सर्वोच्च सम्मान देकर अलग-अलग श्रेणियों में नहीं बांटना चाहिए। वे संविधान निर्माण के दौर से ही इस विचार के समर्थक थे और जीवनभर अपने सिद्धांतों से कभी पीछे नहीं हटे। उनका मानना था कि देश की सेवा किसी पुरस्कार या सम्मान के लिए नहीं, बल्कि कर्तव्य और राष्ट्रहित के लिए की जानी चाहिए। यही वजह है कि उन्होंने भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान को भी विनम्रता से अस्वीकार कर दिया और अपने आदर्शों को सबसे ऊपर रखा। इन्हीं आदर्शों को वे मरते (1978) दम तक पालन करते रहें।
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भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी और आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bose) का नाम देश के सबसे सम्मानित नेताओं में लिया जाता है। सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक, ओडिशा में हुआ था। उनकी मृत्यु 1945 में एक प्लेन क्रैश में हुई थी। वर्ष 1992 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न (Bharat Ratna) देने की घोषणा की। लेकिन यह सम्मान उनके परिवार ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया। परिवार का कहना था कि नेताजी के असाधारण योगदान को देखते हुए यह सम्मान बहुत पहले मिल जाना चाहिए था और इतने वर्षों बाद इसकी घोषणा करना उचित नहीं था। इसके अलावा उस समय नेताजी की मृत्यु को लेकर भी विवाद जारी था। कई लोगों का मानना था कि उनकी मृत्यु 1945 की विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी, इसलिए मरणोपरांत सम्मान देने पर सवाल उठे। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जिसके बाद सरकार ने भारत रत्न की अधिसूचना वापस ले ली। इसी कारण नेताजी उन चुनिंदा महान हस्तियों में शामिल हैं, जिनके नाम की घोषणा तो हुई, लेकिन उन्हें आधिकारिक रूप से भारत रत्न कभी प्रदान नहीं किया गया।
हनुमान प्रसाद पोद्दार (Bhaiji Hanuman Prasad Poddar) जिन्हें पूरे देश में प्रेम से 'भाईजी' कहा जाता था, प्रसिद्ध आध्यात्मिक चिंतक, समाजसेवी और गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित ‘कल्याण’ पत्रिका (Kalyan magazine) के लंबे समय तक संपादक रहे। इनका जन्म 17 सितंबर 1892 को असम शिलांग में हुआ था। उन्होंने भारतीय संस्कृति, धर्म और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उनके योगदान से प्रभावित होकर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने उन्हें भारत रत्न देने का प्रस्ताव रखा। लेकिन भाईजी ने इसे विनम्रता से ठुकरा दिया। उनका मानना था कि सच्ची सेवा का मूल्य किसी पुरस्कार या सम्मान से नहीं आंका जा सकता। वे हमेशा प्रचार, प्रसिद्धि और सरकारी सम्मान से दूर रहे। उनका कहना था कि यदि सेवा निस्वार्थ भाव से की जाए, तो वही सबसे बड़ा सम्मान है। उन्होंने कभी अपने कार्यों का श्रेय नहीं लिया और सादा जीवन जीते रहे। यही विनम्रता और सिद्धांत आज भी उन्हें करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनाते हैं। उनका देहावसान 22 मार्च 1971 को गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ लेकिन उनकी लेखनी आज भी जिंदा है। [SP]