

भारत का इतिहास प्राचीन किलों, महलों और ऐसी कई ऐतिहासिक इमारतों से भरा पड़ा है, जो अपने सीने में कई अनसुलझे रहस्य और डरावनी दास्तानें समेटे हुए हैं। ऐसा ही एक अविश्वसनीय और रहस्यमयी ऐतिहासिक स्मारक मौजूद है हरियाणा के रोहतक जिले के ऐतिहासिक कस्बे महम (Meham) में, जिसे दुनिया 'चोरों की बावड़ी' के नाम से जानती है।
दूर से देखने पर यह किसी सामान्य प्राचीन बावड़ी जैसी नजर आती है, लेकिन इसके पीछे छिपी कहानियां रोंगटे खड़े कर देने वाली हैं। वास्तुकला के इस बेजोड़ नमूने को स्थानीय लोग "ज्ञानी चोर की गुफा" (Cave of the Wise Thief) भी कहते हैं, जबकि इतिहास के पन्नों में इसकी खूबसूरती के कारण इसे "स्वर्ग का झरना" (जन्नत का झरना) भी कहा गया है। यह जगह जितनी खूबसूरत है, उतनी ही डरावनी और रहस्यमयी भी है, क्योंकि माना जाता है कि इसके भीतर एक ऐसी सुरंग है जिसका रास्ता सीधे सरहद पार पाकिस्तान में जाकर खुलता है।
इस रहस्यमयी बावड़ी का इतिहास लगभग 370 साल पुराना है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि इसका निर्माण मुगल सम्राट शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान उनके एक रईस फौजदार सैदू कलाल ने साल 1656-57 (ईस्वी) में करवाया था। उस दौर में इस जगह की खूबसूरती और भव्यता इतनी लाजवाब थी कि इसे बाकायदा "स्वर्ग का झरना" नाम दिया गया था। इसके मुख्य द्वार पर फारसी भाषा में लिखा एक शिलालेख आज भी मौजूद है, जो इसके गौरवशाली इतिहास की गवाही देता है।
अगर बात इसकी वास्तुकला (Architecture) की करें, तो यह प्राचीन इंजीनियरिंग का एक बेजोड़ और अद्भुत नमूना है। यह पूरी बावड़ी जमीन के अंदर कई मंजिलों में बंटी हुई है, जिसमें नीचे पानी के कुंड तक पहुँचने के लिए करीब 101 सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। इसे बनाने में मुख्य रूप से लाखौरी ईंटों और लाल बलुआ पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। पुराने समय में, तपती गर्मी के दिनों में यहाँ का तापमान बाहर के मुकाबले काफी कम रहता था। यही वजह थी कि उस दौर में यहाँ से गुजरने वाले राहगीरों, सैनिकों और व्यापारियों के आराम करने और उनकी पानी की जरूरत को पूरा करने का यह सबसे मुख्य जरिया थी। मुसाफिरों के ठहरने के लिए इसमें बाकायदा छोटे-छोटे कमरे (दालान) भी बनाए गए थे।
चोरों की बावड़ी के इतिहास से भी ज्यादा हैरान करने वाला है इसके भीतर छिपा सुरंगों का जाल। स्थानीय मान्यताओं और लोककथाओं के अनुसार, इस बावड़ी के सबसे निचले छोर पर एक गुप्त सुरंग बनी हुई है। इस सुरंग को लेकर सबसे चौंकाने वाला दावा यह किया जाता है कि इसका दूसरा छोर सीधा सरहद पार पाकिस्तान (कुछ कहानियों में दिल्ली और हिसार) में जाकर खुलता था। हालांकि, वैज्ञानिक रूप से इस बात का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है, लेकिन यहाँ की हवाओं में तैरता एक खौफनाक किस्सा आज भी लोगों की रूह कंपा देता है।
कहा जाता है कि बहुत साल पहले (कुछ लोग इसे ब्रिटिश काल का किस्सा बताते हैं) एक बारात इस बावड़ी को देखने आई थी। कौतूहलवश वो पूरी बारात इस रहस्यमयी सुरंग के रास्ते अंदर दाखिल हो गई। लेकिन हैरान करने वाली बात यह रही कि वह बारात कभी वापस बाहर नहीं आई; मानो सुरंग उन्हें निगल गई हो। इस दिलदहला देने वाली घटना के बाद, वहाँ के लोगों में ऐसा खौफ बैठा कि प्रशासन और सरकार ने सुरक्षा के लिहाज से इस रहस्यमयी सुरंग के मुख्य द्वार को हमेशा के लिए लोहे के गेट और पत्थरों से सील (बंद) कर दिया।
इस बावड़ी का नाम 'चोरों की बावड़ी' पड़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह है ज्ञानी चोर। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, ज्ञानी चोर अपने समय का एक बेहद शातिर और दिमाग से तेज चोर था, जो अमीरों और राजा-महाराजाओं के घरों में डाका डालता था। लेकिन वह कोई आम अपराधी नहीं था; वह लूटा हुआ सारा धन गरीबों और जरूरतमंदों में बांट देता था। इसी वजह से उसे इस इलाके का 'रॉबिनहुड' भी माना जाता था।
जब भी राजा की सेना उसे पकड़ने के लिए घेराबंदी करती, तो ज्ञानी चोर बचने के लिए इसी महम की बावड़ी और इसकी पेचीदा गुप्त सुरंगों में आकर छिप जाता था। माना जाता है कि उसने ताउम्र जो भी सोना-चांदी और कीमती खजाना लूटा, उसे इसी बावड़ी के गुप्त तहखानों में छुपा दिया। आज सदियों बाद भी स्थानीय लोगों के बीच यह अंधविश्वास और कौतूहल बना हुआ है कि ज्ञानी चोर का अरबों का खजाना आज भी इसी बावड़ी के किसी अंधेरे कोने में दफन है। [SP]