

आज जिस दुबई (Dubai) को हम दुनिया की सबसे आलीशान और चकाचौंध भरी जगह मानते हैं, वह कभी सीधे तौर पर भारत के प्रशासनिक नियंत्रण (Administrative Control) में था। ब्रिटिश राज (British Raj) के समय मुंबई से ही पूरे खाड़ी क्षेत्र का कामकाज संभाला जाता था। इतना ही नहीं, वर्ष 1959 से लेकर 1966 तक वहाँ आधिकारिक रूप से भारतीय करेंसी चलती थी, जिसे खाड़ी रुपया (Gulf Rupee) कहा जाता था और इसे RBI जारी करता था। यानी आज तेल के कुओं पर राज करने वाला यह इलाका कभी पूरी तरह भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) और सिक्कों पर निर्भर था। तो फिर ऐसी क्या गलतियाँ हुई जिसकी वजह से दुबई भारत से आज़ाद हुआ और हमारे हाथ से निकल गया दुनिया का सबसे बड़ा तेल का भंडार?
आज भले ही दुबई (Dubai) एक अलग और बेहद अमीर देश है, लेकिन इसका इतिहास भारत के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। 19वीं सदी में जब भारत पर अंग्रेजों का राज था, तब वर्ष 1892 में ब्रिटिश सरकार और खाड़ी के शेखों (Trucial States) के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत दुबई (Dubai) सहित पूरा खाड़ी क्षेत्र एक ब्रिटिश प्रोटेक्टोरेट (British Protectorate) बन गया। प्रशासनिक सुविधा के लिए अंग्रेजों ने इस पूरे इलाके का कंट्रोल सीधे तौर पर भारत की बॉम्बे प्रेसीडेंसी (Bombay Presidency) को सौंप दिया था। इसका मतलब यह था कि दुबई और उसके आस-पास के क्षेत्रों की सुरक्षा, विदेशी मामले और व्यापारिक फैसले लंदन से नहीं, बल्कि सीधे मुंबई (बॉम्बे) और दिल्ली से तय होते थे।
यह प्रशासनिक और आर्थिक कनेक्शन भारत की आज़ादी (वर्ष 1947) के बाद भी खत्म नहीं हुआ। खाड़ी देशों में व्यापार के लिए भारतीय करेंसी का ही दबदबा था। वर्ष 1959 में भारत सरकार और RBI ने विशेष रूप से खाड़ी देशों के लिए खाड़ी रुपया जारी किया, जो हूबहू भारतीय नोटों जैसा था। दुबई के भारत से अलग होने की असली शुरुआत वर्ष 1966 में हुई। जून 1966 में भारत सरकार ने अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए भारतीय रुपए का अवमूल्यन (Devaluation) कर दिया, जिससे रुपए की वैल्यू अचानक 36% तक गिर गई। इस फैसले से दुबई और कतर जैसे खाड़ी देशों को भारी आर्थिक झटका लगा। अपनी इकोनॉमी को बचाने के लिए दुबई (Dubai) और कतर ने उसी साल यानी 18 सितंबर 1966 को खाड़ी रुपया का इस्तेमाल हमेशा के लिए बंद कर दिया। उन्होंने भारतीय रुपए को हटाकर अस्थाई रूप से सऊदी रियाल को अपनाया और बाद में अपनी खुद की करेंसी कतर-दुबई रियाल (Qatar-Dubai Riyal) शुरू की। इसके बाद, 02 दिसंबर 1971 को दुबई ने अन्य अमीरातों के साथ मिलकर UAE की स्थापना की और पूरी तरह से एक स्वतंत्र देश के रूप में दुनिया के नक्शे पर उभरा।
आज सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में अक्सर यह नैरेटिव (विमर्श) चलाया जाता है कि यदि सरदार पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) ने आज़ादी के समय भारत की 562 रियासतों के एकीकरण के साथ-साथ इन खाड़ी देशों (Trucial States) के विलय पर भी ध्यान दिया होता, तो आज दुबई और अबू धाबी जैसे समृद्ध क्षेत्र भारत का हिस्सा होते। हालांकि, इतिहासकार और विशेषज्ञ इस दावे को पूरी तरह से सही नहीं मानते क्योंकि इसके पीछे कुछ बड़े ऐतिहासिक कारण थे। पहला यह कि वर्ष 1947 में आज़ादी के तुरंत बाद भारत विभाजन की भीषण त्रासदी, भयंकर गरीबी, भुखमरी और देश के भीतर की बड़ी रियासतों (जैसे हैदराबाद और जूनागढ़) को भारतीय संघ में शामिल करने और कानून व्यवस्था संभालने में पूरी तरह व्यस्त था।
दूसरा सबसे बड़ा कारण यह था कि उस समय तक खाड़ी देशों में तेल के इतने विशाल भंडारों (Crude Oil Reserves) की मौजूदगी का किसी को कोई सटीक अंदाजा नहीं था और उस दौर में यह इलाका सिर्फ एक रेतीला और बेहद पिछड़ा हुआ छोटा व्यापारिक केंद्र मात्र था। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी थी कि वर्ष 1947 में ही ब्रिटेन ने इस खाड़ी क्षेत्र की प्रशासनिक निवास (Residency) को भारत के बॉम्बे (Bombay) से हटाकर सीधे लंदन (London, Foreign Office) के नियंत्रण में स्थानांतरित कर दिया था, क्योंकि अंग्रेज कभी नहीं चाहते थे कि यह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाका आज़ाद भारत के पास रहे। ऐसे बड़े प्रशासनिक और अंतरराष्ट्रीय बदलाव के बाद सरदार पटेल (Sardar Patel) या भारत सरकार के पास वहाँ हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी या व्यावहारिक मौका बचा ही नहीं था, इसलिए बदली हुई वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए इसे भारत की कोई रणनीतिक चूक कहना ऐतिहासिक तथ्यों के लिहाज से बिल्कुल गलत होगा।
अगर इतिहास के उस मोड़ पर खाड़ी देशों के साथ भारत के समीकरण अलग होते, या वे क्षेत्र किसी भी रूप में भारत का हिस्सा बने रहते, तो आज देश की पूरी आर्थिक तस्वीर बदली हुई होती। वर्तमान समय में भारत अपनी जरूरत का लगभग 80% से 85% कच्चा तेल (Crude Oil) विदेशी बाजारों से इम्पोर्ट (आयात) करता है। इस भारी निर्भरता के कारण जब भी वैश्विक स्तर पर कोई हलचल होती है, तो उसका सीधा असर भारतीय आम जनता की जेब पर पड़ता है। वर्तमान वर्ष 2026 में भी रूस-यूक्रेन संकट और मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होती रहती है, जिससे घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छूने लगते हैं। इस तेल संकट के चलते भारत को हर साल अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ तेल खरीदने में खर्च करना पड़ता है, जिससे देश में महंगाई (Inflation) बढ़ती है। इस संकट से निपटने के लिए अब भारत तेजी से वैकल्पिक समाधान (Alternative Solutions) जैसे EV (इलेक्ट्रिक व्हीकल्स), एथेनॉल मिश्रण (Ethanol Blending) और हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) की तरफ कदम बढ़ा रहा है ताकि भविष्य में ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना जा सके।
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इतिहास को बदला नहीं जा सकता, लेकिन आज भारत बीते वक्त से आगे निकलकर अपने रणनीतिक संबंधों (Strategic Relations) के दम पर संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ बेहतरीन व्यापार कर रहा है। भले ही अतीत में दुबई और भारत के प्रशासनिक रास्ते अलग हो गए हों, लेकिन आज दोनों देश मजबूत आर्थिक साझीदार हैं। वर्तमान में भारत तेल पर अपनी निर्भरता कम करने और पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने के लिए सौर ऊर्जा और इथेनॉल ब्लेंडिंग की तरफ तेजी से कदम बढ़ा रहा है, ताकि भविष्य में पेट्रोल-डीजल की वैश्विक कमी या बढ़ती कीमतों का देश की तरक्की पर कोई असर न पड़े। [SP]