'इंसान के मांस' से बनती थी दवाई! इतिहास की वो रूह कंपा देने वाली प्रथा, जिसे जानकर उड़ जाएगी आपकी नींद

आज जिस इंसानी मांस को सोचकर ही रूह कांप जाती है, कभी वही “इलाज” माना जाता था। उस दौर के डॉक्टरों और वैद्यों का दावा था कि ताजा खून, हड्डियों का चूर्ण और इंसानी चर्बी मिर्गी जैसी खतरनाक बीमारियों को ठीक कर सकती है।
'इंसान के मांस' से बनती थी दवाई
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आधी रात का सन्नाटा… सामने फांसी पर लटकती एक लाश… और उसके नीचे कटोरों के साथ खड़ी भीड़। जैसे ही शरीर से खून की आखिरी बूंद टपकती, लोग उसे दवा समझकर पी जाते। यह किसी हॉरर फिल्म का सीन नहीं, बल्कि यूरोप के इतिहास का वह काला सच है, जिसने इंसानियत तक को हिला दिया था। आज जिस इंसानी मांस (Human Flesh) को सोचकर ही रूह कांप जाती है, कभी वही “इलाज” माना जाता था। उस दौर के डॉक्टरों और वैद्यों का दावा था कि ताजा खून (Fresh blood), हड्डियों का चूर्ण (Bone Powder) और इंसानी चर्बी (Human Fat) मिर्गी (Epilepsy) जैसी खतरनाक बीमारियों को ठीक कर सकती है। हैरानी की बात यह है कि राजघरानों से लेकर आम लोग तक इस डरावनी प्रथा पर भरोसा करते थे। युद्ध के मैदानों, कब्रिस्तानों और फांसीघरों से इंसानी शरीर के हिस्से जुटाए जाते थे और उन्हें दवा की तरह बेचा जाता था। इतिहास का यह अध्याय इतना भयावह है कि इसे पढ़कर आज भी लोगों की नींद उड़ जाती है।

क्या इंसान का ख़ून बीमारी दूर कर सकता है?

यूरोप के मध्यकाल (Mid Age Of Europe) और शुरुआती आधुनिक दौर में लोगों का मानना था कि इंसानी शरीर में ऐसी रहस्यमयी ताकत होती है, जो गंभीर बीमारियों को ठीक कर सकती है। उस समय डॉक्टर और वैद्य इंसानी खून, हड्डियां, चर्बी और मांस को दवा के रूप में इस्तेमाल करते थे। इसे “मेडिकल कैनिबलिज्म” ("Medical Cannibalism") कहा गया। आज यह सोच डरावनी लगती है, लेकिन उस दौर में इसे विज्ञान और चिकित्सा का हिस्सा माना जाता था। कई अमीर परिवार और राजघराने भी इन इलाजों पर भरोसा करते थे। उस समय सबसे ज्यादा इंसानी खून का इस्तेमाल मिर्गी (Epilepsy) जैसी बीमारियों के इलाज में किया जाता था। लोगों को विश्वास था कि ताजा खून में जीवन शक्ति होती है। इसलिए फांसी के बाद या युद्ध के मैदानों में लोग कटोरे लेकर खड़े रहते थे ताकि मरते हुए इंसान का गर्म खून पी सकें। माना जाता था कि इससे शरीर में नई ऊर्जा आएगी और बीमारी दूर होगी।

कब्रिस्तान तक नहीं थी सुरक्षित

इंसानी शरीर के हिस्सों की मांग उस दौर में इतनी बढ़ चुकी थी कि कब्रिस्तान भी सुरक्षित नहीं रहे थे। रात होते ही “ग्रेव रॉबर्स” (“Grave Robbers”) यानी कब्र लुटेरे चुपके से नई कब्रों को खोदते और ताजा लाशें निकालकर डॉक्टरों, वैद्यों और दवा बेचने वालों को ऊंची कीमत पर बेच देते थे। कई गरीब लोग पैसे कमाने के लिए इस खौफनाक काम में शामिल हो गए थे। सबसे ज्यादा मांग उन शवों की होती थी, जिन्हें हाल ही में दफनाया गया हो, क्योंकि माना जाता था कि “ताजा शरीर” में ज्यादा ताकत होती है।

इतना ही नहीं, मिस्र की हजारों साल पुरानी ममियों तक को नहीं छोड़ा गया। यूरोप में “मम्मिया” नाम से ममी का पाउडर खुलेआम दवा की दुकानों में बिकता था। लोग उसे सिरदर्द, पेट दर्द और अंदरूनी चोटों की रामबाण दवा मानते थे। अमीर लोग तो इसे खास औषधि समझकर महंगे दामों में खरीदते थे। हैरानी की बात यह है कि कई बार असली ममी कम पड़ने लगी तो नकली ममी तैयार की जाने लगीं। अपराधियों या गरीबों की लाशों को सुखाकर उन्हें “मिस्र की ममी” बताकर बेचा जाता था। इतिहास की यह सच्चाई आज भी सुनने वालों की रूह कंपा देती है।

क्या थी चमत्कारी मरहम?

इतिहास के कई पुराने दस्तावेज बताते हैं कि एक समय यूरोप में इंसानी चर्बी को किसी “चमत्कारी मरहम” (“Miracle Ointment”) से कम नहीं माना जाता था। फांसी पाए अपराधियों के शवों से चर्बी निकालकर उसे गर्म किया जाता, फिर उसमें जड़ी-बूटियां और तेल मिलाकर खास मरहम तैयार किए जाते थे। माना जाता था कि यह मरहम जलने के निशान, गहरे घाव, गठिया और जोड़ों के दर्द को तेजी से ठीक कर देता है। कई जगह तो जल्लाद खुद इस चर्बी को बेचकर पैसे कमाते थे, क्योंकि फांसी के तुरंत बाद निकाली गई चर्बी सबसे “असरदार” मानी जाती थी। हैरानी की बात यह है कि उस दौर के कुछ मशहूर डॉक्टर और वैद्य भी इस इलाज का समर्थन करते थे। 17वीं सदी में यूरोप की दवा दुकानों पर “ह्यूमन फैट ऑइंटमेंट” (“Human Fat Ointment”) खुलेआम बिकता था। लोग इसे शरीर की “जीवन शक्ति” से जुड़ा मानते थे और विश्वास करते थे कि इंसान की ताकत दूसरे इंसान के शरीर में जाकर बीमारी को खत्म कर सकती है। कई सैनिक युद्ध में घायल होने के बाद ऐसे मरहम का इस्तेमाल करते थे। आज यह सब बेहद डरावना और अमानवीय लगता है, लेकिन उस समय इसे आधुनिक चिकित्सा का हिस्सा समझा जाता था।

आखिर क्यों लोग करते थे भरोसा?

आज यह सब सुनना बेहद डरावना लगता है, लेकिन उस दौर के लोगों के लिए इंसानी शरीर से बनी दवाइयां किसी चमत्कार से कम नहीं थीं। उस समय विज्ञान और मेडिकल रिसर्च इतनी विकसित नहीं थी, इसलिए लोग बीमारी को सिर्फ शरीर की समस्या नहीं, बल्कि रूहानी और रहस्यमयी ताकतों से जोड़कर देखते थे। उनका मानना था कि इंसान के शरीर में एक खास “जीवन ऊर्जा” होती है, जो खून, हड्डियों और चर्बी में बसती है। अगर उस ऊर्जा को किसी बीमार इंसान तक पहुंचाया जाए, तो बीमारी खत्म हो सकती है।

यही वजह थी कि ताजा खून को सबसे ज्यादा ताकतवर माना जाता था। लोग सोचते थे कि मरते हुए इंसान की आखिरी सांस के साथ उसकी जीवन शक्ति खून में उतर जाती है। कई डॉक्टर भी इस सोच का समर्थन करते थे और अपने मरीजों को इंसानी शरीर से बनी दवाइयां देते थे। उस दौर में “सिमिलिया सिमिलिबस” (“Similia Similibus”) जैसी मान्यताएं भी प्रचलित थीं, यानी जिस चीज से शरीर बना है, वही शरीर को ठीक भी कर सकती है। यही कारण था कि इंसानी खोपड़ी का पाउडर सिरदर्द में, खून मिर्गी में और चर्बी घावों में इस्तेमाल की जाती थी। डर, अंधविश्वास और अधूरे विज्ञान ने मिलकर इस खौफनाक प्रथा को सदियों तक जिंदा रखा।

कैसे खत्म हुई यह डरावनी प्रथा?

समय के साथ जब विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा ने तेजी से तरक्की करनी शुरू की, तब इंसानी शरीर से बनी दवाइयों पर सवाल उठने लगे।18वीं और 19वीं शताब्दी में ज्ञानोदय (Enlightenment) के दौर के साथ, वैज्ञानिक समझ बढ़ी और यह प्रथा धीरे-धीरे समाप्त हुई। हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, 20वीं सदी की शुरुआत तक भी यूरोप में कहीं-कहीं इसके अवशेष मिलते थे। धीरे-धीरे डॉक्टरों को समझ आने लगा कि ये इलाज बीमारी ठीक करने के बजाय कई बार संक्रमण और नई बीमारियां फैला रहे थे।

इसी दौरान यूरोप में मेडिकल साइंस, सर्जरी और दवाइयों के नए तरीके सामने आए। अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की स्थापना होने लगी, जहां इलाज को अंधविश्वास नहीं बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर समझा जाने लगा। लोगों की सोच भी बदलने लगी और इंसानी शरीर को “दवा” की बजाय सम्मान की नजर से देखा जाने लगा। कब्रों से शव चोरी होने और लाशों के व्यापार पर सख्त कानून बनाए गए।

19वीं सदी तक आते-आते मेडिकल कैनिबलिज्म को अमानवीय, असभ्य और खतरनाक माना जाने लगा। जिन दवाइयों को कभी चमत्कारी इलाज समझा जाता था, वही धीरे-धीरे इतिहास के सबसे डरावने अध्यायों में शामिल हो गईं। आज यह प्रथा खत्म हो चुकी है, लेकिन इतिहास के पन्नों में इसकी कहानियां अब भी लोगों की रूह कंपा देती हैं। [SP]

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