पाकिस्तान से आई एक महिला ने कैसे भारत सरकार को 48 साल तक बेवकूफ बनाया? जानें 'मालचा महल' की अजीब कहानी

दिल्ली के चाणक्यपुरी के घने, खामोश जंगलों में छिपा है 700 साल पुराना एक रहस्यमयी खंडहर मालचा महल (Malcha Mahal)। लोग इसे दिल्ली की सबसे भूतिया जगहों में गिनते हैं, लेकिन इसकी दीवारों में भूतों से कहीं ज्यादा गहरा एक इंसानी राज दफन है।
 मालचा महल (Malcha Mahal)
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दिल्ली के चाणक्यपुरी के घने, खामोश जंगलों में छिपा है 700 साल पुराना एक रहस्यमयी खंडहर मालचा महल (Malcha Mahal)। लोग इसे दिल्ली की सबसे भूतिया जगहों में गिनते हैं, लेकिन इसकी दीवारों में भूतों से कहीं ज्यादा गहरा एक इंसानी राज दफन है।

यह कहानी सिर्फ एक वीरान इमारत की नहीं, बल्कि आजाद भारत की सियासत, एक औरत की अटूट जिद्द और खुद को अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह का वंशज बताने वाले एक 'शाही परिवार' के खौफनाक अंत की है। बेगम विलायत महल, शहजादी सकीना और प्रिंस साइरस... इतिहास के इस सबसे रहस्यमयी ड्रामे के वो किरदार हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। पाकिस्तान से आई इस औरत ने करीब 48 साल तक भारत सरकार को बेवकूफ बनाया था।

मालचा महल का असली इतिहास

दिल्ली के चाणक्यपुरी के घने जंगलों में छिपे मालचा महल का इतिहास (History Of Malcha Mahal) बेहद पुराना और ऐतिहासिक है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के रिकॉर्ड्स और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस महल का बुनियादी ढांचा कुछ जगहों पर 1325 ईस्वी (गयासुद्दीन तुगलक या मोहम्मद बिन तुगलक के दौर) से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसे मुख्य रूप से 14वीं शताब्दी में तुगलक राजवंश के शासक सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने बनवाया था। फिरोज शाह तुगलक का शासनकाल 1351 से 1388 ईस्वी तक था, और उन्होंने दिल्ली के इस जंगली इलाके का इस्तेमाल अपने 'शिकारगाह' (Hunting Lodge) के रूप में किया था, जहां वे शिकार के दौरान आराम करते थे।

मालचा महल का इतिहास (History Of Malcha Mahal)
मालचा महल का इतिहास (History Of Malcha Mahal) X

तुगलक वंश (Tughlaq Dynasty) के पतन के बाद, यह महल सदियों तक पूरी तरह उजाड़ और गुमनाम पड़ा रहा। इसके बाद 1920 के दशक में एक बड़ा बदलाव आया, जब ब्रिटिश सरकार ने नई दिल्ली (रायसीना हिल) का निर्माण शुरू किया। इस निर्माण के चलते आसपास के 'मालचा' गांव के मूल निवासियों को वहां से विस्थापित (shift) कर दिया गया, जिसके बाद यह ऐतिहासिक इमारत मुख्य शहर और लोगों की नजरों से पूरी तरह कट गई।

सदियों की इस खामोशी के बाद, 1970 और 1980 के दशक में इस महल ने तब अचानक राजनीतिक सुर्खियां बटोरीं, जब खुद को अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह की परपोती बताने वाली बेगम विलायत महल ने इस पर अपना हक जताया। एक लंबे विवाद और धरने के बाद, आखिरकार 28 मई 1985 को भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर यह महल इस कथित शाही परिवार को रहने के लिए सौंप दिया, जिसके बाद इस खंडहर का एक नया और रहस्यमयी अध्याय शुरू हुआ।

रेलवे स्टेशन पर 'शाही' धरना और मालचा महल का अलॉटमेंट

यह अजीबोगरीब और ऐतिहासिक किस्सा 1970 के दशक के शुरुआती सालों में शुरू हुआ, जब खुद को अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह की परपोती बताने वाली बेगम विलायत महल अपनी मांग को लेकर दिल्ली आईं। उनका दावा था कि अंग्रेजों ने उनके पूर्वजों की जो शाही संपत्तियां छीनी थीं, भारत सरकार उन्हें वापस करे या उसका मुआवजा दे। अपनी मांग मनवाने के लिए उन्होंने विरोध का एक बेहद अनोखा और चौंकाने वाला रास्ता चुना। बेगम अपने दो बच्चों (शहजादी सकीना और शहजादा अली रजा), कुछ नौकरों और करीब 11 खूंखार डॉबरमैन कुत्तों के साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के वीआईपी लाउंज (First Class Waiting Room) में डेरा डालकर बैठ गईं।

 नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के वीआईपी लाउंज
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के वीआईपी लाउंजX

यह 'शाही' धरना कोई दो-चार दिन नहीं, बल्कि लगभग एक दशक (10 साल) तक चला। स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर रहने वाले इस अजीब परिवार और उनके आक्रामक कुत्तों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा, जिससे भारत सरकार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक दबाव बनने लगा। आखिरकार, इस विवाद को सुलझाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने खुद दखल दिया। बेगम को शांत करने और स्टेशन खाली कराने के लिए सरकार ने उनकी मांग के आगे घुटने टेके। इंदिरा गांधी के आश्वासन और सरकारी आदेश के बाद, 28 मई 1985 को भारत सरकार ने उन्हें रहने के लिए दिल्ली के चाणक्यपुरी के जंगलों में स्थित 700 साल पुराना 'मालचा महल' आधिकारिक तौर पर अलॉट कर दिया, जिसके बाद यह परिवार रेलवे स्टेशन छोड़कर इस वीरान खंडहर में शिफ्ट हो गया।

मालचा महल के भीतर की रहस्यमयी और डरावनी जिंदगी

मालचा महल में शिफ्ट होने के बाद इस परिवार की जिंदगी किसी खौफनाक ख्वाब जैसी हो गई। घने जंगलों के बीच बने इस 700 साल पुराने खंडहर में न बिजली थी, न पानी और न ही दरवाजे। बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट चुके इस परिवार ने महल के चारों तरफ कंटीले तार लगा दिए थे और किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित था। उनके खूंखार डॉबरमैन कुत्ते महल की रखवाली करते थे और सुरक्षा ऐसी थी कि अनजाने में पास आने वाले लोगों पर भी गोलियां चलाने की धमकियां दी जाती थीं।

मालचा महल में शिफ्ट होने के बाद इस परिवार की जिंदगी किसी खौफनाक ख्वाब जैसी हो गई।
मालचा महल में शिफ्ट होने के बाद इस परिवार की जिंदगी किसी खौफनाक ख्वाब जैसी हो गई। Ai

शाही वैभव न मिलने और घोर एकांत के कारण यह परिवार गहरे डिप्रेशन (अवसाद) में चला गया। आखिरकार, 10 सितंबर 1993 को बेगम विलायत महल (Begum Wilayat Mahal) ने कथित तौर पर हीरे पीसकर आत्महत्या कर ली। मां की मौत के बाद दोनों बच्चे शहजादी सकीना और शहजादा अली रजा (प्रिंस साइरस) और अकेले हो गए। मां के शव को उन्होंने कई दिनों तक अपने पास रखा और बाद में वहीं दफना दिया। कुछ वर्षों बाद शहजादी सकीना की भी गुमनामी में मौत हो गई। अंततः 2 सितंबर 2017 को इस कथित खानदान के आखिरी चिराग 'प्रिंस साइरस' भी मालचा महल के फर्श पर मृत पाए गए, जिससे इस परिवार की रहस्यमयी और दर्दनाक दास्तान का हमेशा के लिए अंत हो गया।

कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट: क्या वे वाकई नवाब के वंशज थे?

इस पूरी दास्तान का सबसे चौंकाने वाला मोड़ साल 2019 में आया, जब 'न्यूयॉर्क टाइम्स' की मशहूर विदेशी पत्रकार एलेन बैरी (Ellen Barry) की एक गहरी खोजी रिपोर्ट ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। दशकों तक जिस परिवार को अवध का शाही वंशज मानकर भारत सरकार ने मालचा महल सौंप दिया था, वह असल में एक बहुत बड़ा भ्रम निकला। जांच में खुलासा हुआ कि खुद को बेगम विलायत महल बताने वाली महिला का अवध के नवाब वाजिद अली शाह से दूर-दूर तक कोई खून का रिश्ता नहीं था।

उनका असली नाम विलायत बट्ट था, जो लखनऊ यूनिवर्सिटी के पूर्व रजिस्ट्रार इनायतुल्लाह बट्ट की विधवा (बेवा) थीं। 1947 में भारत के विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान के लाहौर चला गया था, लेकिन वहां उनके पति की असमय मौत और मानसिक आघात के बाद उनकी दुनिया बदल गई। अपनी खोई हुई पहचान, संपत्ति और मानसिक तनाव के कारण वे अपने बच्चों के साथ भारत लौट आईं और खुद को अवध की बेगम घोषित कर दिया। मानसिक रूप से गहरे सदमे में डूबी विलायत बट्ट इस भ्रम (Delusion) को ही अपनी हकीकत मान बैठी थीं, और उनके बच्चों ने भी जिंदगी भर इसी शाही झूठ को जिया। [SP]

 मालचा महल (Malcha Mahal)
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