

हिंदी सिनेमा में जब भी दिल को छू लेने वाले गानों की बात होती है तो गीतकार संतोष आनंद के नाम का जिक्र जरूर होता है। 'जिन्दगी की ना टूटे लड़ी' और 'मैं ना भूलूंगा' जैसे गीतों से उन्होंने घर-घर में पहचान बनाई, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि फिल्मों में आने से पहले वह एक स्कूल में लाइब्रेरियन की नौकरी करते थे। किताबों के बीच काम करते-करते वह हिंदी सिनेमा के मशहूर गीतकार बन गए। संतोष आनंद का जन्म 5 मार्च 1940 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के सिकंदराबाद में हुआ था।
उनका असली नाम संतोष कुमार मिश्र था। वह एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं। बचपन से ही उन्हें पढ़ने-लिखने का शौक है। स्कूल के दिनों में ही वह कविताएं लिखने लगे थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लाइब्रेरी साइंस की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के मिंटो ब्रिज स्थित एक स्कूल में लाइब्रेरियन के तौर पर नौकरी की। किताबों ने उनकी सोच को और गहरा किया। वह अक्सर कहते थे कि पढ़ाई और साहित्य ने ही उन्हें बेहतर इंसान और लेखक बनाया।
लाइब्रेरियन की नौकरी करते हुए भी उनका मन कविता में ही लगा रहता था। वह कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेने लगे। धीरे-धीरे उनकी पहचान एक मंचीय कवि के रूप में बनने लगी। उनकी जिंदगी ने मोड़ तब लिया जब अभिनेता और निर्देशक मनोज कुमार ने उन्हें सुना। मनोज कुमार उनकी कविता से प्रभावित हुए और उन्हें फिल्म 'पूरब और पश्चिम' के लिए गीत लिखने का मौका दिया। यहीं से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उन्होंने साल 1972 में आई फिल्म 'शोर' का गाना 'एक प्यार का नगमा है' और 1974 में आई फिल्म 'रोटी, कपड़ा और मकान' का गाना 'मैं ना भूलूंगा' जैसे यादगार गीत लिखे। इस गीत के लिए उन्हें अपना पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। साल 1981 में आई फिल्म 'क्रांति' के गीत भी उन्होंने ही लिखे। यह फिल्म उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी। इसके बाद 1982 में फिल्म 'प्रेम रोग' के गीत 'मोहब्बत है क्या चीज' के लिए उन्हें दूसरा फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। साल 2016 में उन्हें यश भारती सम्मान से भी नवाजा गया। संतोष आनंद ने अपने करियर में 26 फिल्मों के लिए 100 से ज्यादा गाने लिखे। उनकी खासियत यह थी कि वह अपने गीतों में प्रेम, दर्द और जिंदगी की सच्चाई को शामिल करते थे। [SP]