अंग्रेज़ों ने भेजा मजदूर बनाकर, उन्होंने बना दिया होली का उत्सव! विदेशों में फगवा की देसी दास्तान

भारत से हजारों किलोमीटर दूर, समुद्र के पार बसे देशों की सड़कों पर जब लोग सफेद कपड़े पहनकर रंगों में सराबोर हो जाते हैं, ढोलक की थाप गूंजती है और “फगुआ” के गीत सुनाई देती है - तो ऐसा लगता है कि मानों भारत का ही कोई शहर हो|
विदेशों में फगवा की देसी दास्तान
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भारत से हजारों किलोमीटर दूर, समुद्र के पार बसे देशों की सड़कों पर जब लोग सफेद कपड़े पहनकर रंगों में सराबोर हो जाते हैं, ढोलक की थाप गूंजती है और “फगुआ” के गीत सुनाई देती है - तो ऐसा लगता है कि मानों भारत का ही कोई शहर हो। जी हां आपने सही पहचाना हम सूरीनाम, त्रिनिदाद, टोबैगो, फ़िजी और मॉरिशस जैसे वेस्ट इंडीज़ और कैरेबियन देशों की बात कर रहें हैं। इन देशों में होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि भावनाओं और पहचान का भी उत्सव है।

इन देशों में होली का रंग सिर्फ गुलाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें छिपी है अपने पूर्वजों की याद, अपनी मिट्टी की खुशबू और अपनी संस्कृति को जीवित रखने की कहानी। यहां बसे भारतीय मूल के लोगों ने पीढ़ी दर पीढ़ी अपने त्योहारों और परंपराओं को कायम रखा। इसलिए जब वहां होली मनाई जाती है, तो वह भारत से दूर होकर भी बिल्कुल भारतीय अंदाज में नजर आती है। लेकिन सवाल यह उठता है कि वेस्ट इंडीज और कैरेबियाई देश में इतने भारतीय अधिक मात्रा में कैसे पहुंचे? और साथ ही यह भी जानतें हैं कि इन देशों की होली में क्या है ख़ास?

क्या है गिरमिटिया मजदूरों का इतिहास?

19वीं सदी में जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था, तब हजारों भारतीयों को “गिरमिटिया मजदूर” बनाकर समुद्र पार भेजा गया। 1834 में ब्रिटिश साम्राज्य में गुलामी प्रथा खत्म होने के बाद अंग्रेजों को अपने गन्ने के खेतों और बागानों के लिए सस्ते मजदूरों की जरूरत पड़ी। तब बिहार, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के गरीब और साधारण लोगों को लालच या यूं कह लिजिए झूठे वादों के सहारे जहाजों में बैठाकर दूर देशों में भेज दिया गया। मॉरिशस में 1834 से 1920 के बीच लगभग 4.5 लाख भारतीय पहुंचे। जबकि त्रिनिदाद और टोबैगो में 1845 से 1917 तक करीब 1.4 लाख भारतीय ले जाए गए। तो वहीं सूरीनाम में 1873 से 1916 के बीच लगभग 34 हजार भारतीयों को ले जाया गया। फ़िजी में 1879 से 1916 के दौरान करीब 60 हजार भारतीयों को बसाया गया।

ये सभी लोग लंबी समुद्री यात्रा के बाद कठिन हालात में वहां पहुंचे। उनका जीवन आसान नहीं था। फिर भी वे अपने साथ रामायण, भजन, लोकगीत और होली जैसे त्योहार लेकर गए। धीरे-धीरे उन्होंने वहीं अपना घर बसा लिया और अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को पीढ़ियों तक संभाल कर रखा। आज उन्हीं की संतानों की वजह से इन देशों में भारतीय संस्कृति और होली जैसे त्योहार पूरे उत्साह से मनाए जाते हैं।

इन देशों में होली को कहतें है फगवा

1.सूरीनाम में होली को “फगवा” कहा जाता है। होली के दिन राजधानी परमारिबो की सड़कों पर सफेद कपड़ों में लोग रंगों से सराबोर नजर आते हैं। ढोलक और मंजीरे की धुन पर भोजपुरी फगुआ गीत गाए जाते हैं। यहां “बैठक गाना” की परंपरा भी बहुत प्रसिद्ध है, जिसमें पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं। खास बात यह है कि सिर्फ हिंदू ही नहीं, बल्कि दूसरे धर्मों के लोग भी रंगों में शामिल होकर इस त्योहार को मिल-जुलकर मनाते हैं।

2. त्रिनिदाद और टोबैगो में भी होली को “फगवा” के नाम से ही जाना जाता है। यहां बड़े-बड़े मैदानों में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं, जहां लोग चटनी संगीत और ढोलक की थाप पर झूमते हैं। रंग खेलने के साथ-साथ यहां पारंपरिक मिठाइयां भी बांटी जाती हैं। होलिका दहन की परंपरा भी निभाई जाती है। कई जगहों पर फगवा गीत प्रतियोगिताएं होती हैं, जो इस त्योहार को और खास बना देती हैं।

3. फ़िजी में होली बहुत ही अपनेपन के साथ मनाई जाती है। यहां मंदिरों में भजन-कीर्तन और रामायण पाठ होता है। लोग सुबह से ही एक-दूसरे के घर जाकर अबीर-गुलाल लगाते हैं। कई जगहों पर स्कूल और सामुदायिक केंद्रों में रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। फिजी की होली में भारतीय और स्थानीय संस्कृति का सुंदर मेल देखने को मिलता है।

4. मॉरिशस में होली पूरे देश में उत्साह के साथ मनाई जाती है। यहां होली से पहले होलिका दहन किया जाता है, जिसमें लोग बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश याद करते हैं। होली के दिन रंग खेलने के साथ-साथ लोग पारंपरिक गाने गाते हैं और एक-दूसरे को मिठाई खिलाते हैं। कई जगहों पर सांस्कृतिक शो और जुलूस भी निकाले जाते हैं।

5. दक्षिण अमेरिका के देश Guyana में होली का इतिहास भारतीय प्रवासियों से जुड़ा है। 19वीं सदी में जब ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से मजदूरों को गन्ने के खेतों में काम करने के लिए यहाँ लाया गया, तब वे अपने साथ होली की परंपरा भी लेकर आए। आज इसे वहाँ फगवा (Phagwah) के नाम से मनाया जाता है। लोग रंग-गुलाल लगाते हैं, भजन गाते हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रम करते हैं। गुयाना की कुल आबादी में लगभग 40% लोग भारतीय मूल के हैं, जिनके पूर्वज उत्तर प्रदेश और बिहार से यहाँ पहुंचे थे।

इन देशों की होली की सबसे खास बात यह है कि हजारों किलोमीटर दूर होने के बावजूद वहां के लोगों ने अपनी भारतीय परंपराओं को आज भी पूरी श्रद्धा और खुशी के साथ जीवित रखा है। [SP/MK]

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