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पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार पर कुछ ही समय में विराम लगने वाला है और 29 अप्रैल 2026 को मतदान होना सुनिश्चित हुआ है। ममता बनर्जी बंगाल की सत्ता पर 15 साल से काबिज हैं। ममता के पहले वामदलों ने बंगाल में लगभग 35 साल शासन किया है। बंगाल का राजनीतिक इतिहास बहुत लंबा रहा है। आजादी के पहले और बाद में बंगाल का राजनीतिक इतिहास कुछ इस प्रकार था
साल 1757 में प्लासी की लड़ाई में अंग्रेजों को विजय हासिल हुआ। इस विजय के साथ भारत में अंग्रेजों के लिए द्वरा लगभग खुल गए। इसी के साथ भारत की राजनीति में नए अध्याय का प्रवेश हुआ जो बंगाल से शुरू हुआ। प्लासी के बाद 1764 में बक्सर के युद्ध ने अंग्रेजों के लिए राजनीतिक हस्तक्षेप पर मुहर लगा दी।
इसके बाद अंग्रेजों ने बंगाल की राजनीति में सांप्रदायिकता का जहर डालना शुरू कर दिया। 20 जुलाई 1905 को बंगाल विभाजन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया और 16 अक्टूबर 1905 को बंगाल का विभाजन कर दिया गया। इस दिन बंगाल में लोगों ने शोक दिवस मनाया।
भारतीय एकता को बनाए रखने के लिए, सांप्रदायिकता को चुनौती देने के लिए बंगाल के लोगों ने एक दूसरे की कलाई पर राखी बांधे। रवींद्र नाथ टैगोर के आह्वान पर हिंदुओं और मुसलमानों ने एक दूसरे को राखी बांधकर सामाजिक एकता का संदेश दिया। साल 1906 में शुरू हुआ स्वदेशी आंदोलन का केंद्र बंगाल ही था। आम जनता के साथ मिलकर प्रबुद्ध वर्ग ने ब्रिटिश सरकार का बहिष्कार करना शुरू किया। बाद में साल 1911 में बंगाल को एक कर दिया गया।
आजादी के बाद भारत में सबसे अधिक कांग्रेस की लहर थी। आजादी के बाद पश्चिम बंगाल की सत्ता कांग्रेस के हाथ में थी। बता दें कि साल 1947 से 1977 तक कांग्रेस ने सत्ता संभाली। राज्य के पहले मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र घोष थे। घोष ने स्वतंत्रता के बाद 15 अगस्त 1947 से 14 अगस्त 1948 तक इस पद को संभाला था।
बता दें कि साल 1950 में संविधान लागू होने के बाद डॉ. बिधान चंद्र रॉय को राज्य का पहला औपचारिक मुख्यमंत्री माना जाता है। बिधान चंद्र वही नेता हैं जिन्होंने कोलकाता और बंगाल के आधुनिक विकास की नींव रखी। बिधान चंद्र की जयंती पर देशभर में 1 जुलाई को 'डॉक्टर्स डे' भी मनाया जाता है।
कांग्रेस के बाद बंगाल की राजनीति में कम्युनिस्टों का एक लंबा इतिहास है। दरअसल, साल 1977 से 2011 तक ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने से पहले तक लेफ्ट सरकार ने 34 साल तक पश्चिम बंगाल की सत्ता संभाली। पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड भी वाम मोर्चे के नेता ज्योति बसु के नाम दर्ज है। उन्होंने 1977 से 2000 तक लगभग 23 साल तक सत्ता संभाली। राजनीति में इतने लंबे समय तक टिके रहना कोई आसान काम नहीं है।
साल 1977 में मुख्यमंत्री बनने के समय राज्य की राजनीति नए दौर में प्रवेश कर रही थी। वामपंथी विचारधारा के साथ उन्होंने सरकार चलाई और धीरे-धीरे अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली कि विपक्ष उनके सामने टिक नहीं पाया। उनकी राजनीति में दिखावा कम, काम और फैसलों का असर ज्यादा था। इसी वजह से जनता ने उन्हें बार-बार विश्वास दिया।
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ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से की थी और 1974 तथा उस दौर के प्रखर समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण की कलकत्ता यात्रा के दौरान उनके कार के बोनट पर चढ़कर, काली पट्टी बांधकर विरोध किया। बाद में कांग्रेस के साथ बंगाल रणनीति पर असहमति होने पर ममता ने कांग्रेस से इस्तीफा दिया, फिर अपनी पार्टी बनाकर उस समय की ज्योति बसु की वामपंथी सरकार की दीवार से टकरा गयीं और 2011 में वामपंथी दीवार को ध्वस्त कर दिया |
ममता बनर्जी ने साल 2011 में पश्चिम बंगाल में वामपंथ की दीवार को धराशायी करके विजय स्तम्भ स्थापित किया। इसी विजय स्तम्भ को बीजेपी कई बार धराशायी करने का प्रयास कर चुकी है परन्तु अभी तक यह विजय स्तम्भ अविभंजनीय साबित हुआ है।
ममता (Mamta Banerjee) के इस विजय स्तम्भ पर बहुत सारे प्रश्न विपक्षी दलों ने खड़े कर दिए हैं। कई बार जनता से भी ममता का आमना सामना हुआ है, पर ममता ने संभालने का प्रयास किया है। इस चुनाव में यह देखना दिलचस्प रहेगा कि क्या पश्चिम बंगाल की जनता अभी भी उसी दीदी को सत्ता की कमान सौंपती है या बंगाल इस बार परिवर्तन का रुख़ अख्तियार करता है।
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