

2026 के बंगाल चुनाव (West Bengal Assembly Election 2026) से पहले सियासत एक बार फिर “राशन” के इर्द-गिर्द सुलग उठी है। हालांकि राशन को लेकर बंगाल में अक्सर राजनीति देखने को मिलती है। जहां एक तरफ बिहार में चरक घोटाला फेमस है तो वहीं दूसरी तरफ बंगाल में राशन घोटाला काफ़ी फेमस है। सोचने वाली बात तो ये है कि जिस व्यवस्था को गरीबों के घर तक सस्ता अनाज पहुंचाना था, वही कुछ नेताओं और उनके पूरे नेटवर्क के लिए कमाई का गुप्त रास्ता बन गई।
इस पूरे घोटाले के केंद्र में नाम आता है ज्योतिप्रिय मल्लिक (Jyotishpriya Mallick) का। एक ऐसा चेहरा, जिस पर आरोप है कि उनके कार्यकाल में हजारों करोड़ रुपये का खेल खेला गया। कहा जाता है कि गोदाम से निकला अनाज गरीबों की थाली तक पहुंचने से पहले ही बाजार में बेच दिया गया, और फर्जी कंपनियों के जरिए पैसे को इधर-उधर घुमाकर संपत्तियां खड़ी की गईं। जांच एजेंसियों के मुताबिक, यह कोई छोटा-मोटा भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि एक बुना हुआ जाल था। जिसने न सिर्फ सरकारी सिस्टम को कमजोर किया, बल्कि सीधे तौर पर गरीबों के अधिकारों पर वार किया।
ज्योतिप्रिय मल्लिक (Jyotishpriya Mallick), पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक बड़ा नाम, लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस (TMC) के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते रहे हैं। राज्य सरकार में उन्होंने खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री के तौर पर जिम्मेदारी संभाली थी। यह एक ऐसा विभाग है जो सीधे गरीबों के राशन और उनके रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा होता है।
साल 2011 से 2021 तक ज्योतिप्रिय मल्लिक का कार्यकाल रहा, और इसी दौरान वो और उनका मंत्रालय विवादों में घिर गया। जांच एजेंसियों का आरोप है कि इन्हीं वर्षों में राशन वितरण में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई। जब कथित घोटाला हुआ था, तब श्री मल्लिक खाद्य एवं आपूर्ति विभाग (Food and Supplies Department) के मंत्री थे। जब उन्हें गिरफ्तार किया गया, तब वे वन विभाग के राज्य मंत्री थे। कहा जाता है कि गरीबों के लिए भेजा गया अनाज बीच रास्ते में ही गायब हो जाता था। कभी बाजार में बेचा गया, तो कभी रिकॉर्ड में फर्जी एंट्री दिखाकर हिसाब “कागजों पर” पूरा कर दिया गया। मामला तब और गर्म हो गया जब 27 अक्टूबर 2023 को प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जांच में सामने आया कि यह घोटाला सिर्फ छोटी-मोटी हेराफेरी नहीं, बल्कि हजारों करोड़ रुपये का खेल हो सकता है। ED के मुताबिक, इसमें कई कारोबारी, मिल मालिक और अन्य सहयोगी भी शामिल थे। यानी यह एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क का मामला था।
जांच एजेंसी ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल (West Bengal) में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) से जुड़े घोटाले का आकार लगभग ₹9,000-₹10,000 करोड़ था। कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह आंकड़ा 20,000 करोड़ रुपये तक बताया गया है। इसमें से ₹2,000 करोड़ सीधे या बांग्लादेश (Bangladesh) के माध्यम से दुबई में स्थानांतरित किए जाने का संदेह था। जांच में खुलासा हुआ कि गरीबों के लिए भेजा जाने वाला राशन बीच रास्ते में ही गायब कर दिया जाता था। इस घोटाले में आरोपी अन्य लोगों में चावल मिल मालिक बकिबुर रहमान और बोंगाँव नगरपालिका के पूर्व अध्यक्ष शंकर आद्या शामिल थे।
घोटाले से कमाए गए पैसे को सीधे इस्तेमाल नहीं किया जाता था। इसे फर्जी कंपनियों और अलग-अलग बैंक खातों के जरिए घुमाकर “सफेद” बनाया जाता था। जांच एजेंसियों ने दावा किया है कि इस पैसे से कई महंगी संपत्तियां खरीदी गईं, जिन्हें परिवार और करीबी लोगों के नाम गिफ्ट के रूप में दिखाया गया। छापेमारी के दौरान कई बोगस कंपनियों के दस्तावेज, कैश और डायरी बरामद हुईं, जिनमें हर लेन-देन का विस्तृत रिकॉर्ड था। यही सबूत इस पूरे घोटाले की परतें खोलने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
राशन घोटाले (Ration Scam) की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, वैसे-वैसे इसके तार और भी गहरे निकलते गए। आरोप सिर्फ अनाज की हेराफेरी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि यह मामला “मनी ट्रेल” के जरिए देश से बाहर तक पहुंचता दिखा। जांच एजेंसियों का दावा है कि इस नेटवर्क के जरिए करोड़ों रुपये विदेशों खासकर दुबई जैसे स्थानों में भेजे गए, ताकि अवैध कमाई को सुरक्षित रखा जा सके। इतना ही नहीं, छापेमारी के दौरान कई महंगी संपत्तियों का खुलासा हुआ। बताया जाता है कि आरोपी नेताओं और उनके करीबी लोगों ने 150 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति जुटाई जिसमें आलीशान घर, जमीन और बड़े निवेश शामिल हैं।
ये संपत्तियां अक्सर रिश्तेदारों या भरोसेमंद लोगों के नाम पर ली गईं, ताकि असली मालिक का पता न चल सके। इस केस में कई राइस मिल मालिक, कारोबारी और स्थानीय नेताओं की गिरफ्तारी ने यह साफ कर दिया कि यह कोई अकेले व्यक्ति का खेल नहीं था, बल्कि एक पूरा संगठित नेटवर्क था जो सालों से सक्रिय था। हालांकि, ज्योतिप्रिय मल्लिक ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे राजनीतिक साजिश बताया है। लेकिन सच क्या है, इसका फैसला अब अदालत और जारी जांच ही तय करेगी और यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।
पश्चिम बंगाल के राशन घोटाले (Ration Scam) मामले में ज्योतिप्रिय मल्लिक (Jyotipriya Mallick) को 27 अक्टूबर 2023 को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने लंबी पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी से पहले कोलकाता और आसपास के इलाकों में कई जगहों पर छापेमारी की गई, जहां से अहम दस्तावेज और सबूत मिले। गिरफ्तारी के बाद राज्य की राजनीति में काफी हंगामा हुआ। सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया, जबकि विपक्ष ने इसे बड़े घोटाले का सबूत कहा। कोर्ट में पेशी के दौरान भी इस मामले को लेकर भारी बहस देखने को मिली।
मल्लिक को कई महीनों तक न्यायिक हिरासत में रखा गया। बाद में स्वास्थ्य कारणों और कानूनी प्रक्रिया के तहत उन्हें फरवरी 2024 में जमानत मिल गई और वे रिहा हो गए। यह मामला अब भी जांच के अधीन है और आगे की कार्रवाई जारी है।
राशन घोटाले (Ration Scam) का यह मामला अब सिर्फ एक जांच या आरोप तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह बंगाल की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है। जिस घोटाले में गरीबों के हक का अनाज और हजारों करोड़ रुपये का सवाल जुड़ा हो, वह चुनावी माहौल में और भी संवेदनशील बन जाता है। 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव (West Bengal Assembly Election) के करीब आते ही यह मुद्दा एक बार फिर जोर पकड़ रहा है। विपक्ष इसे जनता के बीच बड़ा चुनावी हथियार बना रहा है, तो वहीं सत्ताधारी पक्ष इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज कर रहा है। ऐसे में असली सवाल वही है क्या जनता इस मुद्दे को वोट के समय याद रखेगी?
यह चुनाव सिर्फ सरकार बनाने का नहीं, बल्कि भरोसे की परीक्षा भी बन गया है। गरीबों के हक, पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे मुद्दे अब सीधे वोटिंग पर असर डाल सकते हैं। आखिरकार, इस पूरे मामले का सच अदालत और जांच एजेंसियों से सामने आएगा, लेकिन 2026 का चुनाव यह जरूर तय करेगा कि जनता इस मुद्दे को कितना गंभीर मानती है और किसे अपनी आवाज देती है। [SP/MK]