बंगाल में 27, तो असम में 24 फीसदी मुसलमान...फिर भी इन 2 राज्यों में क्यों हार जाते हैं ओवैसी?

देश की राजनीति में असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) एक ऐसा नाम है, जो हर चुनाव में चर्चा (discussion) तो खूब बटोरता है, लेकिन कई राज्यों में उसका असर जमीन पर नजर नहीं आता।
असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi)
असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) Wikimedia Commons
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देश की राजनीति में असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) एक ऐसा नाम है, जो हर चुनाव में चर्चा (discussion) तो खूब बटोरता है, लेकिन कई राज्यों में उसका असर जमीन पर नजर नहीं आता। उनकी पार्टी AIMIM खुद को अल्पसंख्यकों (minorities) की आवाज बताती है और अधिकार (rights) तथा संविधान (constitution) की बात करती है। हैदराबाद से शुरू हुई यह पार्टी अब दूसरे राज्यों में भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

लेकिन जब बात पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों की आती है, तो ओवैसी की सियासत (politics) उतनी सफल नहीं दिखती। यहां मजबूत क्षेत्रीय पार्टियां और पहले से बना वोट बैंक AIMIM के लिए चुनौती बन जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इन राज्यों में ओवैसी की रणनीति क्यों काम नहीं कर पाती।

AIMIM क्या है और ओवैसी की राजनीति का आधार

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen) एक क्षेत्रीय पार्टी (regional party) है, जिसकी शुरुआत हैदराबाद (Hyderabad) से हुई। यह पार्टी मुख्य रूप से तेलंगाना (Telangana) की राजनीति में मजबूत पकड़ रखती है। AIMIM का फोकस अल्पसंख्यकों (Minorities) के प्रतिनिधित्व (Representation), अधिकार (rights) और संविधान (constitution) की रक्षा पर रहता है।

असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi)
असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) Wikimedia Commons

असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) और उनके परिवार ने हैदराबाद की सीट पर लगातार जीत हासिल की है। खासकर 2004, 2009, 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha elections) में ओवैसी ने जीत दर्ज की। वहीं, तेलंगाना विधानसभा में भी AIMIM कई सीटों पर मजबूत स्थिति बनाए हुए है और 2014, 2018 और 2023 के चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया। आज के समय में AIMIM अपने गढ़ हैदराबाद में काफी मजबूत है, लेकिन दूसरे राज्यों में अपनी पहचान और प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

एक क्षेत्रीय पार्टी से राष्ट्रीय विस्तार की कोशिश

एक समय तक सिर्फ हैदराबाद तक सीमित रहने वाली AIMIM अब खुद को राष्ट्रीय स्तर (national level) पर फैलाने की कोशिश कर रही है। पार्टी का मुख्य आधार अभी भी तेलंगाना (Telangana) है, लेकिन इसके अलावा महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम में भी पार्टी चुनाव (elections) लड़ चुकी है। खास बात यह है कि बिहार में AIMIM को कुछ हद तक सफलता मिली, जहां 2020 के विधानसभा चुनाव (assembly elections) में पार्टी ने 5 सीटें जीतीं। लेकिन अन्य राज्यों में पार्टी को संघर्ष (struggle) का सामना करना पड़ा। कई जगह AIMIM को “वोट कटवा” (vote cutter) के रूप में देखा जाता है, जिससे उसका प्रभाव सीमित रह जाता है। यही कारण है कि पार्टी का विस्तार तो हो रहा है, लेकिन मजबूत पकड़ (strong hold) बनाना अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

पश्चिम बंगाल में ओवैसी की सियासत का हाल

AIMIM ने पश्चिम बंगाल (West Bengal) की राजनीति में एंट्री 2021 के विधानसभा चुनाव (assembly elections) के आसपास की। पार्टी ने खासतौर पर उन इलाकों पर फोकस किया, जहां मुस्लिम आबादी (Muslim population) ज्यादा है, जैसे सीमांचल से लगे जिले। AIMIM ने कई उम्मीदवार (candidates) भी उतारे, लेकिन उन्हें ज्यादा समर्थन नहीं मिला।

पश्चिम बंगाल (West Bengal)
पश्चिम बंगाल (West Bengal) Wikimedia Commons

यहां सबसे बड़ी चुनौती ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) और उनकी पार्टी Trinamool Congress (TMC) की मजबूत पकड़ है। बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक (vote bank) पहले से ही TMC के साथ जुड़ा हुआ है, जिससे AIMIM को जगह बनाना मुश्किल हो गया। नतीजा यह रहा कि AIMIM का प्रभाव बंगाल में बेहद सीमित या लगभग शून्य ही नजर आया।

असम में ओवैसी का पार्टी का प्रदर्शन

AIMIM ने असम (Assam) में अपनी एंट्री करते हुए चुनाव लड़ने की कोशिश की, लेकिन यहां उसकी रणनीति (strategy) ज्यादा सफल नहीं हो पाई। पार्टी ने उन इलाकों पर फोकस किया, जहां मुस्लिम आबादी (Muslim population) ज्यादा है, लेकिन उसे मजबूत समर्थन नहीं मिल सका। असम में पहले से ही अखिल भारतीय संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (All India United Democratic Front, AIUDF) का बड़ा प्रभाव है, जिसे बदरुद्दीन अजमल (Badruddin Ajmal) लीड करते हैं। ऐसे में मुस्लिम वोटों (Muslim votes) का बंटवारा होने का डर बना रहता है, जिससे AIMIM को नुकसान होता है। साथ ही, यहां स्थानीय बनाम बाहरी नेतृत्व का मुद्दा भी सामने आता है, जिससे ओवैसी की पार्टी को पूरी तरह स्वीकार नहीं मिल पाती। यही वजह है कि चुनावी नतीजों में AIMIM का प्रदर्शन कमजोर ही नजर आता है।

बंगाल और असम में ओवैसी की ‘दाल क्यों नहीं गलती’?

पश्चिम बंगाल और असम में असदुद्दीन औवेसी की सियासत (politics) मजबूत क्यों नहीं हो पाती, इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है यहां पहले से मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों (regional parties) का दबदबा । बंगाल में TMC और असम में AIUDF पहले से ही अपनी पकड़ बनाए हुए हैं।

दूसरा बड़ा कारण मुस्लिम वोट बैंक (vote bank) का न बंटना है। यहां के मतदाता पहले से ही तय पार्टियों के साथ जुड़े हैं। इसी वजह से AIMIM को अक्सर “वोट कटवा” (vote cutter) की छवि का सामना करना पड़ता है।

इसके अलावा, पार्टी के पास मजबूत स्थानीय नेतृत्व (local leadership) की कमी है, जिससे लोगों से जुड़ाव (connection) नहीं बन पाता। भाषा (language) और क्षेत्रीय मुद्दों (regional issues) से दूरी भी एक बड़ी चुनौती है।

इन सबके साथ-साथ, AIMIM की रणनीति में लगातार एक जैसी स्थिरता (consistency) की कमी भी साफ नजर आती है, जो उसके विस्तार (expansion) को रोकती है।

क्या ओवैसी की राजनीति सिर्फ सीमित इलाकों तक ही?

असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की राजनीति (politics) फिलहाल कुछ खास इलाकों तक ही सीमित नजर आती है, खासकर हैदराबाद और तेलंगाना में, जहां उनकी पार्टी AIMIM मजबूत पकड़ रखती है। यहां पार्टी को लगातार सफलता मिलती रही है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर (national level) पर उसे संघर्ष का सामना करना पड़ता है। कई बार AIMIM को एक मुद्दा आधारित पार्टी (issue-based party) माना जाता है, जो खासतौर पर अल्पसंख्यकों (minorities) के मुद्दों पर ही ज्यादा फोकस करती है। यही कारण है कि उसका विस्तार सीमित रह जाता है।

आने वाले समय में AIMIM के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह किसी गठबंधन का हिस्सा बनेगी या अकेले ही चुनाव (elections) लड़ती रहेगी। अगर पार्टी सही रणनीति (strategy) अपनाती है, तो बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में संभावनाएं (possibilities) बन सकती हैं। अब देखना यह होगा कि क्या AIMIM अपनी छवि को बदलकर एक व्यापक (broad) और स्वीकार्य पार्टी बन पाती है या नहीं। [SP/MK]

असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi)
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