बकरीद पर कलकत्ता हाई कोर्ट का कड़ा रुख: गाय के वध पर रोक के नियम बरकरार, जानिए कोर्ट ने क्या कहा

बकरीद से पहले कलकत्ता हाई कोर्ट के एक बड़े फैसले ने पूरे देश में नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने साफ कहा कि “गाय की कुर्बानी न तो ईद का जरूरी हिस्सा है और न ही इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक परंपरा।”
कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court)
कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) Wikimedia Commons
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बकरीद से पहले कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) के एक बड़े फैसले ने पूरे देश में नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने साफ कहा कि “गाय की कुर्बानी (Cow sacrifice) न तो ईद का जरूरी हिस्सा है और न ही इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक परंपरा।” कोर्ट का यह बयान उस समय आया, जब पश्चिम बंगाल सरकार (West Bengal Government) के पशु वध नियमों को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी। इस फैसले के बाद धार्मिक आज़ादी, कानून व्यवस्था और पशु संरक्षण जैसे मुद्दों पर चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इसे कानून का सख्त पालन बता रहे हैं, तो कुछ इसे धार्मिक अधिकारों से जोड़कर देख रहे हैं। ऐसे में यह फैसला सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन गया है।

2018 में ही हुआ था नियम लागू

कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) की डिवीजन बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल (Sujoy Paul) और जस्टिस पार्थ सारथी सेन (Partha Sarathi Sen) शामिल थे, ने पश्चिम बंगाल सरकार की उस अधिसूचना को रद्द करने से इनकार कर दिया जिसमें बकरीद से पहले गाय, बैल, बछड़े और भैंस के वध पर नियम तय किए गए थे। अदालत ने कहा कि यह आदेश नया नहीं है, बल्कि 2018 में दिए गए पुराने हाई कोर्ट आदेश और पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950 (West Bengal Animal Slaughter Control Act, 1950) के अनुसार ही लागू किया गया है।

गाय की कुर्बानी को “अनिवार्य धार्मिक प्रथा” ("Compulsory Religious Practice") नहीं माना जा सकता।
गाय की कुर्बानी को “अनिवार्य धार्मिक प्रथा” ("Compulsory Religious Practice") नहीं माना जा सकता। Pixabay

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस्लाम (Islam) में कुर्बानी की परंपरा जरूर है, लेकिन गाय की कुर्बानी को “अनिवार्य धार्मिक प्रथा” ("Compulsory Religious Practice") नहीं माना जा सकता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी धार्मिक प्रथा को संवैधानिक सुरक्षा तभी मिलती है, जब वह धर्म का आवश्यक हिस्सा साबित हो। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सार्वजनिक जगहों पर पशु वध की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे कानून-व्यवस्था और स्वच्छता पर असर पड़ सकता है।

कब शुरू हुआ यह मामला ?

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब पश्चिम बंगाल सरकार (West Bengal Government) ने 13 मई 2026 को एक नोटिस जारी कर बकरीद से पहले पशु वध के नियमों को सख्ती से लागू करने का आदेश दिया। सरकार ने कहा कि केवल उन्हीं पशुओं का वध किया जा सकता है जिन्हें पशु चिकित्सक “फिट फॉर स्लॉटर” (“Fit for Slaughter”) का प्रमाणपत्र दें। यानी जानवर की उम्र, स्वास्थ्य और उसकी स्थिति की जांच जरूरी होगी। इस आदेश को कई याचिकाओं के जरिए हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। अदालत ने यह भी कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार पूर्ण नहीं होता। संविधान का अनुच्छेद 25 लोगों को धर्म मानने और उसका पालन करने की आजादी देता है, लेकिन यह आजादी सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और कानून के अधीन होती है। इसी आधार पर कोर्ट ने राज्य सरकार को नियम लागू करने का अधिकार दिया।

फैसले को लेकर दो मत आए सामने

इस फैसले को कई लोग एक बड़े कानूनी संदेश के तौर पर देख रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि किसी भी धार्मिक परंपरा के नाम पर कानून से ऊपर नहीं जाया जा सकता। वहीं दूसरी ओर कुछ मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने कहा कि कुर्बानी इस्लामी परंपरा का अहम हिस्सा है और सरकार को धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। फैसले के बाद राज्य में प्रशासन को भी सख्त निर्देश दिए गए हैं कि अवैध पशु वध और खुले स्थानों पर कुर्बानी न होने दी जाए। कई धार्मिक नेताओं ने भी लोगों से अपील की है कि वे सरकार के नियमों का पालन करते हुए बकरीद मनाएं और शांति बनाए रखें। कुछ मौलानाओं ने बकरा या भेड़ की कुर्बानी को बेहतर विकल्प बताया है।

अब यह मामला सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रह गया है। कानूनी जानकारों का कहना है कि भविष्य में दूसरे राज्यों में भी इस फैसले का असर दिखाई दे सकता है, क्योंकि अदालत ने “जरूरी धार्मिक प्रथा” (“Essential religious practice”) और कानून के बीच संतुलन की बात को फिर से सामने रखा है। [SP]

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