

क्या आपने कभी सोचा है कि एक छोटी-सी बिंदी (Bindi) से भी एक पूरी कला जन्म ले सकती है? जी हां! बिहार में प्रसिद्ध है एक ऐसी कला जहां टिकली यानी बिंदी से पूरी पेंटिंग बनाई जाती है। बिहार की टिकुली कला (Tikuli Art) लगभग 800 साल पुरानी कला है, जिसमें बेहद बारीक बिंदियों, रंगों और चमकदार डिज़ाइनों से सुंदर पेंटिंग बनाई जाती हैं। कभी यह कला केवल महिलाओं के माथे की सजावट यानी बिंदी बनाने तक सीमित थी, लेकिन समय के साथ यह दीवार सजावट, प्लेट, ट्रे और कई सजावटी वस्तुओं पर बनने लगी है। आज भी यह कला बिहार की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है और कई कलाकार इसे बचाने और आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। तो चलिए थोड़े विस्तार से बिहार की इस अनोखी कला के बारे में जानते हैं।
इस कला की शुरुआत लगभग 800 साल पहले से मानी जाती है। उस समय के राजघरानों और अमीर परिवारों की महिलाएँ खास तौर पर ऐसी टिकुली पहना करतीं थीं। लगभग 800–1000 साल पहले पटना में इस कला की शुरुआत हुई। उस समय कारीगर काँच (Glass) को पिघलाकर पतली शीट बनाते थे और उस पर रंग-बिरंगे डिज़ाइन बनाकर बिंदी तैयार करते थे। इसके बाद उस पर सोने या चाँदी की पन्नी लगाई जाती थी जिससे बिंदी चमकदार और सुंदर दिखे। यह काम बहुत मेहनत और महीन कारीगरी से किया जाता था। लेकिन बाद में ब्रिटिश शासन आने के बाद और राजाओं का संरक्षण खत्म होने से यह कला धीरे-धीरे कम होती चली गई और लगभग खत्म होने की कगार पर पहुँच गई।
टिकुली कला बिहार की पारंपरिक लोक कला है, जिसका मुख्य केंद्र पटना (Patna) शहर माना जाता है। यह कला खासकर पटना के दिघा, दानापुर और गायघाट क्षेत्रों में रहने वाले कारीगरों द्वारा बनाई जाती है। “टिकुली” शब्द दरअसल “टिकली” या “बिंदी” से बना है, जो भारतीय महिलाएँ अपने माथे के बीच में लगाती हैं। इसी बिंदी को सजाने और बनाने की कला से ही यह पेंटिंग शैली विकसित हुई।
टिकुली पेंटिंग बनाने की प्रक्रिया समय के साथ थोड़ी बदल गई है। पहले के समय में कारीगर काँच को भट्टी में पिघलाकर उसकी पतली शीट बनाते थे। फिर उस काँच पर नुकीले औजार की मदद से बारीक डिज़ाइन बनाए जाते थे और उसे रंगों तथा सोने की पन्नी से सजाया जाता था, जिससे वह चमकदार और सुंदर दिखाई दे। लेकिन आज के समय में टिकुली पेंटिंग बनाने के लिए काँच की जगह अधिकतर MDF बोर्ड या सख्त बोर्ड का उपयोग किया जाता है। सबसे पहले बोर्ड को अच्छी तरह से चिकना किया जाता है, फिर उस पर रंगों से डिज़ाइन बनाए जाते हैं। इसके बाद बहुत पतले ब्रश की मदद से बारीक पेंटिंग की जाती है और अंत में उस पर पॉलिश की जाती है, जिससे पेंटिंग चमकदार, सुंदर और लंबे समय तक टिकने वाली बन जाती है।
जब टिकुली कला धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर पहुँच गई थी, तब प्रसिद्ध कलाकार और डिज़ाइनर उपेन्द्र महारथी ने इसे फिर से जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने 20वीं सदी के मध्य में बिहार के कारीगरों को इस कला को दोबारा सीखने और आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। उस समय पारंपरिक काँच पर टिकुली बनाना कठिन और महँगा हो गया था, इसलिए उपेन्द्र महारथी ने कारीगरों को काँच की जगह हार्डबोर्ड या MDF बोर्ड पर टिकुली पेंटिंग बनाने का तरीका सिखाया, जिससे यह कला फिर से लोकप्रिय होने लगी और अधिक लोग इसे सीखने लगे। उन्होंने कारीगरों को नए डिज़ाइन और विषयों पर काम करने के लिए भी प्रोत्साहित किया।
आज कई कलाकार टिकुली कला को मधुबनी चित्रकला के साथ मिलाकर नए-नए डिज़ाइन बना रहे हैं, जिससे यह पारंपरिक कला आधुनिक रूप में भी लोगों को आकर्षित कर रही है। वास्तव में टिकुली कला केवल एक पेंटिंग शैली नहीं, बल्कि बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। एक छोटी-सी बिंदी से शुरू हुई यह कला आज दीवारों की सजावट, प्लेट, ट्रे, वॉल हैंगिंग और कई सजावटी वस्तुओं में अपनी खूबसूरती बिखेर रही है। भले ही समय के साथ इसकी लोकप्रियता कुछ कम हुई हो, लेकिन आज भी कई कलाकार, संस्थाएँ और कारीगर मिलकर इस अनोखी कला को बचाने और दुनिया भर में पहचान दिलाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं।
टिकुली आर्ट को GI Tag मिल चुका है। साल 2020 में ज्योग्राफिकल इंडिकेशन टैग मिलने के बाद टिकुली कल को आधिकारिक पहचान मिली। आपको बता दे कि GI Tag का मतलब है कि यह कला एक खास क्षेत्र से जुड़ी हुई पारंपरिक कला है और उसकी पहचान इस क्षेत्र से होती है। आज टिकुली कला को बिहार की महत्वपूर्ण लोक एवं हस्तशिल्प कला के रूप में माना जाता है। सरकार और कई हस्तशिल्प संस्थाएं इस कला को बढ़ावा देने के लिए प्रदर्शनिया प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध करा रही है। [SP/MK]