

आज यानी 1 मई को हर साल मजदूर दिवस यानी लेबर डे (Labour Day) मनाया जाता है। यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि कई लोगों के मेहनत की गाथा है। ज़रा सोचिए, अगर 1886 में हेमार्केट मामला (Haymarket Affair) की चिंगारी न भड़की होती, तो शायद आज भी लोग 12–15 घंटे की लंबी और थकाने वाली ड्यूटी में जकड़े होते। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जो 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे अपने लिए का हक आज हमें सहज लगता है, वह कभी एक सपना था जिसे मजदूरों ने अपने संघर्ष, हिम्मत और बलिदान से सच बना दिया। तो आइए जानतें है अंतरराष्ट्रीय मई दिवस (International Labour Day) की वो कहानी जो बहुत कम लोगों को पता है।
मजदूर दिवस की शुरुआत 19वीं सदी में यूनाइटेड स्टेट्स (United States) से हुई, जब औद्योगिक क्रांति के दौर में फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों से दिन में 12 से 15 घंटे तक काम लिया जाता था। न तो काम का तय समय था और न ही सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम। धीरे-धीरे मजदूरों में असंतोष बढ़ने लगा और उन्होंने अपने हक के लिए आवाज उठानी शुरू की।
1 मई 1886 को शिकागो (Chicago) में हजारों मजदूर सड़कों पर उतर आए और “8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, 8 घंटे अपने लिए” की मांग के साथ हड़ताल शुरू कर दी। यह आंदोलन कई दिनों तक चला और 4 मई 1886 को हेमार्केट मामला (Haymarket Affair) के दौरान एक बम धमाका हुआ। इस अफरा-तफरी में कई पुलिसकर्मी और आम लोग मारे गए, जिसके बाद हालात और भी तनावपूर्ण हो गए।इस घटना के बाद कई मजदूर नेताओं को गिरफ्तार किया गया और कुछ को फांसी तक दे दी गई, जिसे आज भी श्रमिक आंदोलन के इतिहास में एक बड़ा बलिदान माना जाता है। हालांकि यह घटना बेहद दुखद थी, लेकिन इसने पूरी दुनिया का ध्यान मजदूरों की खराब हालत की ओर खींचा।
1889 में पेरिस में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस ने इस घटना के सम्मान में और 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग के लिए 1 मई को "अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस" (International Labour Day) के रूप में मनाने का फैसला किया। आज 1 मई सिर्फ एक छुट्टी का दिन नहीं है, बल्कि यह उन संघर्षों, बलिदानों और अधिकारों की याद दिलाता है, जिनकी वजह से आज मजदूरों को बेहतर कामकाजी हालात, तय समय और सम्मान मिला है।
भारत में मजदूर दिवस (Labour Day In India) के गौरवशाली इतिहास की शुरुआत 1 मई 1923 को मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में हुई थी। इस ऐतिहासिक दिन की पहल 'लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान' (Labour Kisan Party Of Hindustan) द्वारा की गई थी, जिसका नेतृत्व प्रमुख वामपंथी और सोशलिस्ट नेताओं ने किया था। इनमें सिंगारवेलु चेट्टियार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी, जिन्होंने मजदूरों के अधिकारों की आवाज बुलंद की। इस आयोजन की सबसे खास बात यह थी कि इसी दिन भारत में पहली बार 'लाल झंडे' (Lal Jhanda) का इस्तेमाल किया गया, जो आज भी मजदूरों की अटूट एकता, क्रांति और उनके संघर्ष का वैश्विक प्रतीक माना जाता है। इस दिवस ने भारतीय श्रमिक आंदोलन को एक संगठित स्वरूप प्रदान किया और कामगारों को उनके हक व सम्मान के प्रति जागरूक किया। 1923 की इस घटना ने राष्ट्र निर्माण में मजदूरों के पसीने और मेहनत को एक नई पहचान दी। आज यही परंपरा पूरे भारत में अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में मनाई जाती है, जो समाज के सबसे मजबूत स्तंभ श्रमिक वर्ग के प्रति सम्मान प्रकट करने का एक माध्यम है।
मजदूर दिवस, जिसे अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस (International Labour Day) भी कहा जाता है, समाज के निर्माण में श्रमिकों के अमूल्य योगदान और उनके अधिकारों के प्रति सम्मान प्रकट करने का एक विशेष अवसर है। इसका सबसे बड़ा महत्व श्रमिकों को उनके बुनियादी अधिकारों जैसे कि दिन में केवल 8 घंटे काम करना, उचित एवं समय पर वेतन प्राप्त करना और कार्यस्थल पर सुरक्षित व मानवीय वातावरण मिलना के प्रति जागरूक करना है। ऐतिहासिक रूप से यह दिन मजदूरों के उस लंबे संघर्ष की याद दिलाता है, जिसके माध्यम से उन्होंने अपने शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई और अमानवीय कामकाजी परिस्थितियों को बदलने के लिए एकजुट हुए। यह दिवस केवल एक छुट्टी का दिन नहीं, बल्कि एक प्रतिज्ञा है कि किसी भी प्रगति की नींव में पसीना बहाने वाले व्यक्ति का शोषण न हो। आज के आधुनिक युग में भी यह श्रमिकों को सामूहिक रूप से अपनी आवाज बुलंद करने की शक्ति देता है और सरकार व नियोक्ताओं को उनकी जिम्मेदारियों की याद दिलाता है। संक्षेप में, श्रमिक दिवस न्याय, समानता और गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार का प्रतीक है। [SP]