भारत का वह अग्नि मंदिर जिसमें 1300 साल से जल रही है अग्नि ! ईरान से है कनेक्शन, यहाँ समझिए पूरा रहस्य

ईरान (Iran) की धरती से भारत तक पहुंचे पारसी समुदाय (Parsi Community) की कहानी जितनी दिलचस्प है, उतनी ही रहस्यमयी भी।
 पारसी धर्म (Zoroastrianism) में इस पवित्र अग्नि को भगवान का प्रतीक माना जाता है
पारसी धर्म (Zoroastrianism) में इस पवित्र अग्नि को भगवान का प्रतीक माना जाता हैX
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ईरान (Iran) की धरती से भारत तक पहुंचे पारसी समुदाय (Parsi Community) की कहानी जितनी दिलचस्प है, उतनी ही रहस्यमयी भी। इस समुदाय की सबसे बड़ी पहचान है उनका पवित्र अग्नि मंदिर, ऐसा कहा जाता है कि यहां एक ऐसी आग जल रही है जो करीब 1300 सालों से कभी बुझी नहीं। पारसी धर्म (Zoroastrianism) में इस पवित्र अग्नि को भगवान का प्रतीक माना जाता है और इसकी पूजा बेहद श्रद्धा के साथ की जाती है। कहा जाता है कि इस आग की चिंगारी ईरान से भारत लाई गई थी, ताकि धर्म और परंपरा को सुरक्षित रखा जा सके। आज भी यह अनोखा मंदिर इतिहास, आस्था और रहस्य का अद्भुत संगम माना जाता है, जिसे देखने लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं। तो आइए इसके बारे में विस्तार से समझते हैं।

पारसियों का एक अनोखा मंदिर

पारसी धर्म, जिसे दुनिया के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक माना जाता है, उसकी शुरुआत हजारों साल पहले ईरान में हुई थी। इस धर्म को महान संत जरथुस्त्र (Saint Zarathustra) ने स्थापित किया था। लेकिन 7वीं सदी में जब ईरान पर अरब आक्रमण हुए और वहां इस्लाम (Islam) का प्रभाव बढ़ने लगा, तब पारसी समुदाय को अपने धर्म और परंपराओं के खत्म होने का डर सताने लगा। अपने धर्म को बचाने के लिए कई पारसी परिवार समुद्र के रास्ते भारत आपहुंचे। कहा जाता है कि वे अपने साथ एक पवित्र अग्नि भी लेकर आए थे, जिसे उन्होंने कभी बुझने नहीं दिया। यही अग्नि बाद में भारत के सबसे पवित्र पारसी मंदिरों में स्थापित की गई और तब से लेकर आज तक लगातार जल रही है।

इतिहासकारों के अनुसार यह पवित्र अग्नि (Pure Fire) सबसे पहले गुजरात के संजान इलाके में स्थापित की गई थी।
इतिहासकारों के अनुसार यह पवित्र अग्नि (Pure Fire) सबसे पहले गुजरात के संजान इलाके में स्थापित की गई थी।X

कहां है यह मंदिर?

इतिहासकारों के अनुसार यह पवित्र अग्नि (Pure Fire) सबसे पहले गुजरात के संजान इलाके में स्थापित की गई थी। बाद में युद्ध और हमलों के खतरे की वजह से पारसी समुदाय ने इस आग को कई जगहों पर छिपाकर सुरक्षित रखा। वर्षों तक इसे पहाड़ों और गुफाओं में भी संभालकर रखा गया ताकि यह बुझ न जाए। आखिरकार इस पवित्र अग्नि को गुजरात के उदवाड़ा में स्थापित किया गया, जहां आज प्रसिद्ध इरानशाह आतश बेहराम (Iranshah Atash Behram) मौजूद है। पारसी समुदाय इसे अपनी पहचान और आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक मानता है। मान्यता है कि यह वही आग है जो करीब 1300 साल पहले ईरान से लाई गई थी।

क्यों नहीं बुझती है यह आग?

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह आग आज भी लगातार जल रही है। मंदिर के अंदर विशेष पुजारी, जिन्हें “मोबेद” (Mobed) कहा जाता है, दिन-रात मंत्रों द्वारा इसकी देखभाल करते हैं। इस अग्नि को जलाए रखने के लिए खास तरह की लकड़ियों और सुगंधित चंदन का इस्तेमाल किया जाता है। पारसी धर्म में अग्नि को शुद्धता, सत्य और ईश्वर का प्रतीक माना जाता है। इसलिए यहां पूजा के दौरान लोग सिर ढककर और पूरी पवित्रता के साथ प्रार्थना करते हैं। माना जाता है कि इस पवित्र अग्नि के सामने की गई प्रार्थना सीधे भगवान तक पहुंचती है।

मंदिर के अंदर विशेष पुजारी, जिन्हें “मोबेद” (Mobed) कहा जाता है
मंदिर के अंदर विशेष पुजारी, जिन्हें “मोबेद” (Mobed) कहा जाता हैX

मंदिर में क्या हैं नियम और परंपराएं

इरानशाह आतश बेहराम में प्रवेश के नियम बेहद सख्त हैं। इस मंदिर के सबसे अंदर वाले हिस्से में केवल पारसी धर्म को मानने वाले लोगों को ही जाने की अनुमति होती है। मंदिर में प्रवेश से पहले हाथ-पैर धोना और सिर ढंकना जरूरी माना जाता है। यहां चमड़े की वस्तुएं ले जाना भी अच्छा नहीं माना जाता। पारसी समुदाय का विश्वास है कि पवित्र अग्नि के सामने मन साफ और शरीर शुद्ध होना चाहिए। यही वजह है कि यहां हर नियम को बेहद श्रद्धा और अनुशासन के साथ निभाया जाता है।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह आग आज भी लगातार जल रही है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह आग आज भी लगातार जल रही है।X

यह ऐतिहासिक मंदिर गुजरात (Gujrat) के वलसाड जिले के छोटे से शहर उदवाड़ा में स्थित है, जो मुंबई और सूरत के बीच पड़ता है। समुद्र किनारे बसे इस शांत शहर को पारसी समुदाय का सबसे पवित्र तीर्थ स्थल माना जाता है। हर साल दुनिया भर से हजारों पारसी श्रद्धालु यहां दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर के आसपास की गलियां आज भी पारसी संस्कृति, पुराने घरों और पारंपरिक खानपान की झलक दिखाती हैं। यही वजह है कि उदवाड़ा सिर्फ एक धार्मिक जगह नहीं, बल्कि पारसी इतिहास और संस्कृति का जीवित प्रतीक माना जाता है।

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