पाकिस्तान के कटासराज मंदिर का इतिहास, भगवान शिव के आंसूओं से बना था कुंड, यहाँ मरकर ज़िंदा हुए थे 4 पांडव

महाभारत काल से भी इस मंदिर का संबंध बताया जाता है। मान्यता है कि वनवास के दौरान पांडव यहाँ आए थे और यहीं एक अद्भुत घटना घटी, जिसमें चार पांडवों को नया जीवन मिला।
कटासराज मंदिर (Katasraj Temple)
कटासराज मंदिर (Katasraj Temple)IANS
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पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के चकवाल जिला (Chakwal District) में स्थित कटासराज मंदिर (Katasraj Temple) एक प्राचीन और ऐतिहासिक हिंदू तीर्थ स्थल है। यह मंदिर भगवान शिव (Lord Shiva) को समर्पित है और इसकी कहानी पौराणिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि जब माता सती का देहांत हुआ, तब भगवान शिव शोक में डूब गए और उनके आँसुओं से यहाँ एक पवित्र कुंड का निर्माण हुआ। इसी कारण इस स्थान को बेहद पवित्र माना जाता है।

महाभारत काल (Mahabharat) से भी इस मंदिर का संबंध बताया जाता है। मान्यता है कि वनवास के दौरान पांडव यहाँ आए थे और यहीं एक अद्भुत घटना घटी, जिसमें चार पांडवों को नया जीवन मिला। इन कथाओं के कारण यह स्थान श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व रखता है।

कटासराज मंदिर (Katasraj Temple) न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि अपनी प्राचीन वास्तुकला और इतिहास के कारण भी प्रसिद्ध है। आज भी लोग यहाँ दर्शन और इतिहास जानने के लिए आते हैं।

कटासराज मंदिर का इतिहास

कटास राज मंदिर (Katasraj Temple) परिसर कई छोटे-छोटे मंदिरों का समूह है, जो मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित हैं। इसका इतिहास बहुत प्राचीन माना जाता है और यह हिंदू धर्म के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल रहा है। सदियों से श्रद्धालु यहाँ दर्शन करने और पूजा-अर्चना के लिए आते रहे हैं।

‘कटास’ शब्द संस्कृत के ‘कटाक्ष’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है आँखों से गिरने वाले आँसू। यह नाम उस पौराणिक कथा से जुड़ा है, जिसमें कहा जाता है कि भगवान शिव के आँसुओं से यहाँ पवित्र कुंड का निर्माण हुआ था। यही कथा इस स्थान को विशेष धार्मिक महत्व प्रदान करती है।

कटास राज मंदिर (Katasraj Temple) परिसर कई छोटे-छोटे मंदिरों का समूह है
कटास राज मंदिर (Katasraj Temple) परिसर कई छोटे-छोटे मंदिरों का समूह हैIANS

माना जाता है कि इसका संबंध महाभारत काल (Mahabharat) से जुड़ा हुआ है, हालांकि वर्तमान मंदिरों का निर्माण बाद के समय में हुआ। इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर परिसर का प्रमुख निर्माण 7वीं से 12वीं शताब्दी के बीच हिंदू-शाही शासकों के शासनकाल में हुआ था। पत्थरों से बने ये मंदिर उस समय की उत्कृष्ट वास्तुकला और शिल्पकला को दर्शाते हैं। समय-समय पर विभिन्न राजाओं ने इसका विस्तार और जीर्णोद्धार कराया। इस प्रकार कटास राज मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण स्थल है।

शिव जी और पवित्र कुंड की कहानी

कटासराज मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा (Pauranik Katha) भगवान शिव और माता सती से संबंधित है। मान्यता के अनुसार, जब राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर माता सती ने स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया, तो यह समाचार सुनकर भगवान शिव अत्यंत दुखी हो गए। वे सती के वियोग में शोक से व्याकुल होकर इधर-उधर भटकने लगे। कहा जाता है कि उनके आँसुओं की धारा इतनी गहरी थी कि जहाँ-जहाँ उनके आँसू गिरे, वहाँ पवित्र जलकुंड बन गए।

ऐसी ही मान्यता है कि कटासराज में स्थित पवित्र कुंड (Pavitra Kunda) भगवान शिव के आँसुओं से बना। इस कुंड का जल आज भी श्रद्धालुओं के लिए पवित्र माना जाता है। लोग यहाँ स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं और इसे आस्था का प्रतीक मानते हैं। यह कथा केवल एक धार्मिक कहानी ही नहीं, बल्कि शिव भक्तों की गहरी आस्था का प्रतीक भी है। इसी वजह से कटासराज मंदिर हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है।

कटास राज मंदिर की पौराणिक कथा: 4 पांडवों का जीवित होना

कटास राज मंदिर से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा महाभारत के यक्ष प्रश्न नामक प्रसंग से मिलती है। जब पांडव अपने 12-12 वर्ष के वनवास के दौरान इस पवित्र स्थल पर पहुँचे थे, तो उन्होंने यहाँ के तालाब (जलकुंड) के पास प्यास बुझाने का निर्णय लिया। उस तालाब के रक्षक एक यक्ष प्रकट हुआ और कहने लगा कि केवल वही लोग पानी पी सकते हैं जो उसके पूछे गए प्रश्नों का सही उत्तर देंगे।

चार पांडव नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीम यक्ष के प्रश्नों का सही उत्तर नहीं दे पाए और वे बेरहमी से निर्जीव (lifeless) हो गए। तब पाँचवें भाई युधिष्ठिर ने यक्ष के सभी प्रश्नों का बुद्धिमानी से उत्तर दिया। युधिष्ठिर के बुद्धिमत्ता भरे उत्तरों से यक्ष प्रसन्न हुआ और उसने अपने भाइयों को पुनः जीवन प्रदान किया। यही वजह है कि कथा में कहा जाता है कि चार पांडव मर कर फिर से जीवित हुए। इस कथा के कारण कटास राज का तालाब धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और यह स्थल आज भी श्रद्धालुओं के लिए पवित्र माना जाता है।

वास्तुकला और मंदिर परिसर

कटासराज मंदिर परिसर अपनी अनोखी वास्तुकला और प्राचीन बनावट के लिए प्रसिद्ध है। यह परिसर कई छोटे-बड़े मंदिरों का समूह है, जो पहाड़ी क्षेत्र में एक पवित्र कुंड के चारों ओर बने हुए हैं। इन मंदिरों का निर्माण मुख्य रूप से पत्थरों से किया गया है, जो उस समय की मजबूत और टिकाऊ निर्माण शैली को दर्शाता है।

मंदिरों की संरचना में ऊँचे शिखर, मोटी दीवारें और सुंदर नक्काशी देखने को मिलती है। कुछ मंदिरों में मेहराबनुमा द्वार और प्राचीन शैली के स्तंभ भी बने हुए हैं, जो हिंदू-शाही काल की कला को दर्शाते हैं। परिसर का मुख्य आकर्षण बीच में स्थित पवित्र कुंड है, जिसके चारों ओर मंदिर बने हैं। यह पूरा मंदिर परिसर धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक और स्थापत्य कला की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

पौराणिक मान्यताएँ और ऐतिहासिक साक्ष्य

कटास राज मंदिर से जुड़ी कई पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताएँ इसे विशेष महत्व प्रदान करती हैं। माना जाता है कि महाभारत काल में पांडवों ने अपने वनवास के दौरान कुछ समय यहाँ बिताया था। परिसर में एक प्राचीन कुआँ स्थित है, जिसे ‘पांडवों का कुआँ’ कहा जाता है। लोककथाओं के अनुसार, पांडव इसी कुएँ से पानी पीते थे और कुछ समय तक यहीं ठहरे थे। इसके अलावा यह भी मान्यता है कि महान दार्शनिक और संत आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) ने इस स्थान पर कुछ समय व्यतीत किया और यहाँ शिक्षा प्रदान की। उस काल में यह स्थल हिंदू धर्म, शिक्षा और दर्शन का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था।

इतिहास की दृष्टि से भी कटास राज का उल्लेख मिलता है। प्रसिद्ध चीनी यात्री फ़ाहियान (Faxian) और ह्वेन त्सांग (Xuanzang) ने अपनी यात्रा विवरणों में इस स्थान का जिक्र किया है। इन उल्लेखों से स्पष्ट होता है कि यह स्थल प्राचीन समय से ही धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। [SP/MK]

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