

नरसिंह मंदिर, जोशीमठ उत्तराखंड के जोशीमठ में स्थित एक बहुत प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर भगवान नरसिंह को समर्पित है, जिन्हें भगवान विष्णु का उग्र अवतार माना जाता है। हिमालय की गोद में बसे इस धार्मिक स्थल का संबंध बद्रीनाथ मंदिर धाम से भी जुड़ा हुआ है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार सर्दियों के समय जब बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद हो जाते हैं, तब भगवान बद्रीनाथ की पूजा जोशीमठ के इसी नरसिंह मंदिर में की जाती है। इसलिए यह मंदिर तीर्थयात्रियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस मंदिर की एक खास बात यह भी है कि यहाँ स्थापित भगवान नरसिंह की मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि उसकी एक भुजा धीरे-धीरे पतली होती जा रही है। इसी मान्यता और प्राचीन पौराणिक कथाओं के कारण यह मंदिर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
नरसिंह मंदिर, जोशीमठ की स्थापना लगभग 8वीं शताब्दी में आदिगुरू शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) द्वारा की गई मानी जाती है। कहा जाता है कि उन्होंने यहाँ भगवान नरसिंह (Narasimha) की शालिग्राम पत्थर से बनी मूर्ति स्थापित की थी। यह मंदिर उत्तराखंड के जोशीमठ (Joshimath) में स्थित है और इसे बहुत प्राचीन तथा पवित्र मंदिर माना जाता है।
इस मंदिर से जुड़ी एक प्रसिद्ध मान्यता है कि भगवान नरसिंह की मूर्ति का एक हाथ धीरे-धीरे पतला होता जा रहा है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि जिस दिन यह हाथ पूरी तरह टूट जाएगा, उस दिन बद्रीनाथ जाने का रास्ता बंद हो जाएगा और भगवान बद्रीनाथ की पूजा भविष्य में भविष्य बदरी नामक स्थान पर होने लगेगी।
इसी कारण यह मंदिर केवल पूजा का स्थान ही नहीं, बल्कि भविष्य से जुड़ी एक पौराणिक भविष्यवाणी के कारण भी बेहद प्रसिद्ध माना जाता है। यहाँ हर साल हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
उत्तराखंड के नरसिंह मंदिर, जोशीमठ (Narsingh Temple Joshimath) से जुड़ी एक प्राचीन मान्यता के कारण यह कहा जाता है कि भगवान नरसिंह (Narasimha) की मूर्ति का एक हाथ धीरे-धीरे पतला हो रहा है। मंदिर में स्थापित यह प्राचीन मूर्ति शालिग्राम पत्थर से बनी मानी जाती है और सदियों से यहाँ श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।
स्थानीय लोगों और पुजारियों का कहना है कि मूर्ति का बायां हाथ समय के साथ धीरे-धीरे पतला होता दिखाई दे रहा है। इस बदलाव को एक पौराणिक भविष्यवाणी से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि जिस दिन भगवान नृसिंह का यह हाथ पूरी तरह टूट जाएगा, उस दिन बद्रीनाथ जाने का रास्ता बंद हो जाएगा और भगवान बद्रीनाथ की पूजा आगे चलकर भविष्य बद्री में होने लगेगी।
उत्तराखंड के जोशीमठ में स्थित नरसिंह मंदिर, जोशीमठ से एक रोचक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार बहुत समय पहले यहाँ वासुदेव नाम का एक राजा शासन करता था। एक दिन राजा शिकार के लिए जंगल चला गया। उसी दौरान भगवान नरसिंह साधु के रूप में राजा के महल पहुँचे और महारानी से भोजन की इच्छा जताई।
महारानी ने अतिथि समझकर बड़े सम्मान के साथ उन्हें भोजन कराया। भोजन के बाद महारानी ने भगवान से कहा कि वे राजा के कक्ष में जाकर विश्राम कर लें। कुछ समय बाद जब राजा शिकार से लौटे और अपने कक्ष में पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि उनके बिस्तर पर कोई अजनबी पुरुष सो रहा है। यह देखकर राजा क्रोधित हो गया और बिना कुछ सोचे तलवार से उस व्यक्ति पर वार कर दिया।
जैसे ही तलवार लगी, उस पुरुष की भुजा से रक्त के स्थान पर दूध बहने लगा और वह तुरंत भगवान नृसिंह के दिव्य रूप में प्रकट हो गए। यह देखकर राजा को अपनी बड़ी गलती का एहसास हुआ और वह भगवान से क्षमा मांगने लगा।
कहा जाता है कि भगवान ने राजा को दंड देते हुए कहा कि वह अपना राज्य छोड़कर कहीं और बस जाए। साथ ही यह भी कहा कि इस घटना के प्रभाव से मंदिर में स्थापित उनकी मूर्ति की एक भुजा धीरे-धीरे पतली होती जाएगी, जो आज भी लोगों की आस्था और चर्चा का विषय बनी हुई है। [SP]