

अमेरिका-इजराइल हमले में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद उत्तर प्रदेश में शिया समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए, प्रदेश में हाई अलर्ट घोषित।
ईरान के पहले सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह रूहोल्लाह खमैनी के दादा अहमद हिंदी का संबंध यूपी के बाराबंकी से बताया जाता है, जिससे ईरान के धार्मिक नेतृत्व का ऐतिहासिक जुड़ाव उत्तर प्रदेश से जुड़ता है।
खमैनी के बाद दूसरे सुप्रीम लीडर बने अली खामेनेई को उनकी विरासत का वारिस माना गया, इसलिए यूपी के शिया इलाकों में उनकी मौत पर गहरा शोक और विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहा है।
28 फ़रवरी 2026...यह तारीख ईरान के लिए क़यामत की तारीख थी। अमेरिका-इजराइल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। खामेनेई की मौत के बाद पूरी दुनिया में इस समय अमेरिका-इजराइल के लिए आक्रोश का माहौल है। भारत में भी इसको लेकर जगह-जगह पर काफी प्रदर्शन हो रहे हैं, खासकर उत्तर प्रदेश में। वहां शिया समुदाय के लोग सड़कों पर आकर प्रदर्शन कर रहे हैं।
चाहे महिला हो या पुरुष, हर कोई खामेनेई जिंदाबाद और अमेरिका-इजराइल मुर्दाबाद के नारे लगा रहा है। पूरे प्रदेश में हाई अलर्ट है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर क्यों भारत के उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मातम मनाया जा रहा है? तो आपको यह जानकर हैरानी होगी कि ईरान के सुप्रीम लीडर का कनेक्शन यूपी से है। आइये जानते हैं कैसे?
दरअसल, “पहलवी डायनेस्टी (Pahlavi dynasty)” ने ईरान में 1925 से 1979 तक लगातार शासन किया लेकिन फिर 1979 में एंट्री होती है, आयतुल्लाह रूहोल्लाह खमैनी (Ayatollah Ruhollah Khomeini) की जो ईरान की सत्ता संभालते हैं। ईरान के इतिहास में अब तक दो ही सुप्रीम लीडर हुए हैं, पहले खमैनी और दूसरे अयातुल्ला अली खामेनेई (Ali Hosseini Khamenei )। ईरान के पहले सुप्रीम लीडर खमैनी का भारत के उत्तरप्रदेश से गहरा नाता रहा है।
उनके दादा अहमद हिंदी का जन्म 1800 के करीब हुआ था और ऐसा कहा जाता है कि उनका पालन-पोषण यूपी के बाराबंकी में हुआ था। ये वो दौर था जब भारत पर मुगलों का शासन था लेकिन ये साम्राज्य अपनी चमक खो रहा था और ब्रिटिश साम्राज्य धीरे-धीरे यहाँ अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है। अहमद हिंदी का मानना था कि इस्लाम को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहिए।
कहा जाता है कि 1700 के दशक में अहमद हिंदी के पिता दीन अली शाह मध्य ईरान से भारत आए थे लेकिन अहमद एक अलग जीवन जीना चाहते थे, जहाँ सिर्फ आस्था का हो। यही कारण रहा कि उन्होंने ईरान जाने का फैसला किया। वो ईराक के रास्ते ईरान पहुंचे। अहमद ईरान तो चले गए लेकिन वो चाहते थे कि दुनिया को वो बता सके कि उनका रिश्ता अभी भी भारत से है। यही कारण रहा कि अहमद ने अपने नाम में हिंदी को जोड़ा। कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि अहमद ने अपनी भारतीय जड़ों को दिखाने के लिए नाम में हिंदी लगाया था।
1800 के दशक में अहमद ने बाराबंकी छोड़ दिया और ईरान पहुंचे। वो 1834 तक ईरान के खोमेन शहर में बस गए। यही पर उन्होंने शादी की और परिवार बढ़ाया। उनके 5 बच्चे थे, जिसमें से एक का नाम मुस्तफा का था। यही रुहोल्लाह खोमेनी के पिता थे। खमैनी का जन्म 1902 में जरूर हुआ था लेकिन उनके जन्म से पहले ही अहमद हिंदी की मृत्यु हो चुकी थी।
बाद में जब ईरान में शाह वंश का कब्जा हुआ, तो खमैनी को लगभग 14-15 तक वो देश से बाहर निकाले गए थे और फ़्रांस-इराक में रह रहे थे। वो 1 फरवरी 1979 को तेहरान लौटे। हवाई अड्डे पर लाखों लोगों ने उनका ऐतिहासिक स्वागत किया। मार्च 1979 के अंत में एक जनमत संग्रह हुआ, जहाँ 98% से अधिक लोगों ने ईरान को एक 'इस्लामी गणराज्य' बनाने के पक्ष में वोट दिया। 1 अप्रैल 1979 को आधिकारिक तौर पर इसकी घोषणा की गई। फिर दिसंबर 1979 में एक नया संविधान बना जिसमे 'वेलायत-ए-फकीह' (Velayat-e Faqih) का सिद्धांत लागू किया गया। इसके तहत खमैनी ईरान (Iran) के पहले सुप्रीम लीडर (सर्वोच्च नेता) बने।
1989 में आयतुल्लाह खमैनी की मृत्यु के बाद अली ख़ामेनेई (Ali Khamenei) को ईरान (Iran) का दूसरा सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) चुना गया था। बताया जाता है कि वो खमैनी के शिष्य के साथ उनके बेहद करीबी थे। खामेनेई ने खमैनी की विरासत संभाली थी, यही कारण है कि उत्तर प्रदेश के शिया समुदाय के लोग उन्हें काफी सम्मान देते हैं। उनकी मौत से शिया इलाकों में मातम पसरा हुआ है। अमेरिका-इजरायल के खिलाफ खूब नारे लग रहे हैं। फिलहाल यूपी सरकार ने सेना को तैनात करने की घोषणा की है।