मर्डर केस की वो कहानी, जिसमें सामने आया था नीतीश कुमार का नाम! 35 साल पहले फंसे थे सुशासन बाबू

नेतानगरी में कई ऐसे सफ़ेद कुर्ताधारी हैं, जो सामने से कुछ और दिखते हैं और पीछे कुछ और ही होते हैं। आज हम बात बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की करेंगे, जो अब सीएम पद छोड़कर कर राज्यसभा का सफर तय करेंगे।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सफेद कुर्ता पहनकर एक बैठक के दौरान बोलते हुए दिखाई दे रहे हैं।
35 साल पहले मर्डर केस में फंसे थे नीतीश कुमारX
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Summary
  • कांग्रेस कार्यकर्ता सीताराम सिंह की हत्या के मामले में नीतीश कुमार समेत 5 लोगों पर FIR दर्ज हुई।

  • पुलिस जांच में नीतीश कुमार के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला और 2008 में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया।

  • पटना हाईकोर्ट ने कहा कि नीतीश कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोप फर्जी थे।

सोचिये की अगर सच में कोई टाइम मशीन बन गई, जिसमें आप अगर इतिहास में चले जाएं और वो सारी चीजें आप देख पाएं, जो आपके नज़रों से छिपी हुई थी, तो वो नज़ारा हैरान करने वाला भी होगा और मजेदार भी। कुछ ऐसा ही नेतानगरी में आप अनुभव कर सकते हैं कि जिस राजनेता को आप स्वच्छ छवि वाला मानते हैं लेकिन उसके इतिहास में अगर आप देखें कि उसपर तो मर्डर का आरोप लगा था, तो आपकी प्रतिक्रिया हैरान करने देने वाली ही होगी।

नेतानगरी में कई ऐसे सफ़ेद कुर्ताधारी हैं, जो सामने से कुछ और दिखते हैं और पीछे कुछ और ही होते हैं। आज हम बात बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की करेंगे, जो अब सीएम पद छोड़कर कर राज्यसभा का सफर तय करेंगे। बिहार के सीएम की छवि बेहद साफ़ सुथरी है और यही कारण है कि बिहार की जनता उन्हें सुशासन बाबू कहती है। हालांकि, इन्हीं सुशासन बाबू पर मर्डर का आरोप भी लग चुका है। आइये जानते हैं पूरा मामला क्या है?

नीतीश कुमार पर लगा मर्डर का आरोप

जिस घटना का जिक्र हम आपसे करने जा रहे हैं, वो आज की नहीं है बल्कि आज से 35 साल पुरानी है। तारीख थी 16 नवंबर 1991, बिहार के बाढ़ संसदीय क्षेत्र में लोकसभा मध्यावधि चुनाव का माहौल चल रहा था और उसी रात पंडारक थाना क्षेत्र के एक गांव के अँधेरे में गोलियों की आवाज सुनाई देती है।

जैसे ही गोलियों की आवाज शांत हुई, उसके तुरंत बाद एक कांग्रेस कार्यकर्ता सीताराम सिंह की लाश मिलती है। कांग्रेस कार्यकर्ता की लाश मिलते ही नेतानगरी में हड़कंप मच गया और इस हत्या का इल्जाम लगा एक युवा नेता नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के ऊपर, जो 21 साल से बिहार के मुख्यमंत्री हैं।

नीतीश कुमार पर दर्ज हुआ FIR

कांग्रेस कार्यकर्ता सीताराम सिंह के भाई थे राजा राम सिंह। उन्होंने 17 नवंबर 1991 को पंडारक थाना में FIR दर्ज करवाई। उन्होंने जनता दल के उम्मीदवार नीतीश कुमार (Nitish Kumar) समेत पांच लोगों पर हत्या का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज करवाई। मामला धारा 147, 148, 149, 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास) भारतीय दंड संहिता और आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत दर्ज हुआ। राजा राम सिंह ने आरोप लगाया कि षड्यंत्र रचकर राइफल से गोली मारकर उनके भाई की हत्या की गई।

हालांकि, FIR की खबर नीतीश कुमार तक पहुंची, तो उन्होंने तुंरत जाँच अधिकारी को यह सूचित किया कि घटना के समय वो नालंदा के जिलाधिकारी राजीव गौबा और पुलिस अधीक्षक के साथ कंट्रोल रूम में थे। खास बात यह रही कि तत्कालीन डीएम राजीव गौबा (जो बाद में केंद्रीय गृह सचिव बने) उन्होंने कोर्ट में इसकी पुष्टि भी की।

पुलिस को कोई सबूत नहीं मिला

इस घटना की जाँच पुलिस ने की लेकिन इसमें उन्हें नीतीश कुमार (Nitish Kumar) और दूलर चंद यादव के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। पुलिस ने अपनी जाँच 31 जनवरी 1993 को पूरी की लेकिन दिलीप सिंह, योगेंद्र यादव और बौधू यादव के खिलाफ आरोप सही मिले लेकिन सबूत पर्याप्त नहीं थे। आखिरकार 5 अगस्त 2008 को बाढ़ के अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (ACJM) ने पुलिस की रिपोर्ट को स्वीकार किया और नीतीश कुमार बरी हो गए।

तब तक वो बिहार के मुख्यमंत्री बन चुके थे। यहाँ रोचक बात यह भी थी कि जब यह पूरा घटनाक्रम चला था, तब बिहार में लालू यादव की सरकार थी। जेपी आंदोलन में कभी दोस्त होने वाले लालू-नीतीश, 90 के दशक तक एक राजनीतिक प्रतिद्वंदी हो गए थे। सबको यह लगा था कि लालू की सरकार में नीतीश जेल जरूर जाएंगे लेकिन ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला।

फिर से खुला केस

5 अगस्त 2008 को नीतीश कुमार (Nitish Kumar) बरी हुए लेकिन 20 जनवरी 2009 को यह केस फिर से खुला। मृतक सीताराम सिंह के चचेरे भाई अशोक सिंह ने नीतीश कुमार को बरी करने के फैसले के खिलाफ एसीजेएम (ACJM) की कोर्ट में याचिका दाखिल की, जिसने कोर्ट ने स्वीकार किया और केस चलाने की अनुमति दी।

फिर 22 अप्रैल 2009 को पटना हाईकोर्ट ने निचली अदालत की कार्यवाही पर स्टे लगा दिया लेकिन इसके बावजूद भी 1 सितंबर 2009 को बाढ़ कोर्ट के तत्कालीन एसीजेएम रंजन कुमार ने हाईकोर्ट के स्टे को नजरअंदाज किया और बिहार के सीएम पर मुकदमा चलाने का आदेश दिया। यहाँ मजे की बात यह थी न्यायपालिका आपस में ही भिड़ गईं। फिर 8 सितंबर 2009 को पटना हाईकोर्ट ने फिर से स्टे लगाया और इसके बाद एसीजेएम (ACJM) से यह जवाब माँगा कि हाईकोर्ट के फैसले का उल्लंघन क्यों हुआ?

2019 में हुए चौंकाने वाले खुलासे

साल 2019 में पटना हाईकोर्ट में इस मामले को लेकर सुनवाई हुई जहाँ कई चौंकाने वाले खुलासे हुए। मूल शिकायतकर्ता राजा राम सिंह ने सबसे पहले शिकायत दर्ज करवाई थी। उसने 1 अक्टूबर 2008 को शपथपत्र में पुलिस को कहा कि उसके भाई को मारने वाला दिलीप सिंह मर चुका है, इसलिए वो मुकदमा नहीं लड़ना चाहता है।

इसके बाद रामबाबू, सुरेश सिंह और चंद्रमौली सिंह, कथित रूप से घायल हुए थे, उन्होंने शपथपत्र में सारा इल्जाम दिलीप सिंह पर लगाया, जो मर चुका था। वहीं, 2009 में जब यह केस दोबारा खुला, तो अशोक कुमार सिंह ने धारा 164 के तहत बयान दिया कि उसके दस्तखत जबरन खाली कागज पर लिए गए थे और इसी का इस्तेमाल नीतीश कुमार के खिलाफ हुआ। एक गवाह ने तो यह भी स्वीकार किया कि उसे झूठे बयान देने के लिए मजबूर किया गया था और उसे कहा गया था कि वो नीतीश के खिलाफ झूठा बयान दे कि उन्होंने राइफल से हत्या की थी।

इन सब चीजों पर गौर करने के बाद 15 मार्च 2019 को पटना हाईकोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने अपना फैसला दिया। उन्होंने कहा था कि नीतीश कुमार पर लगे आरोप फर्जी थे। कोर्ट ने माना कि उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए एक “सुनियोजित और निरंतर अभियान” चलाया गया था। इसलिए हाईकोर्ट ने धारा 482 सीआरपीसी (CRPC) के तहत, राज्य बनाम भजन लाल (1992) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए इस आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया।

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) और दूलर चंद यादव बरी हुए जबकि दिलीप सिंह, योगेंद्र यादव और बौधू यादव के खिलाफ आरोप, तो सही पाए गए लेकिन ज्यादा सबूत ना होने के चलते उन्हें भी कोई सजा नहीं मिली। बता दें कि दिलीप सिंह का निधन 1 अक्टूबर 2006 को हो गया था।

तो ये थी वो कहानी जब नीतीश कुमार पर मर्डर का आरोप लगा था।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सफेद कुर्ता पहनकर एक बैठक के दौरान बोलते हुए दिखाई दे रहे हैं।
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