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12 अप्रैल 2026...संगीत जगत के लिए एक दुखद दिन था। दिग्गज गायिका आशा भोसले (Asha Bhosle Death) का 92 वर्ष की उम्र में निधन हुआ। उनके निधन की पुष्टि उनके बेटे आनंद भोसले, महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मंत्री आशीष शेलार और मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल के डॉक्टर प्रतीत समदानी ने की। 11 अप्रैल की रात उन्हें हार्ट अटैक आया था, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था लेकिन रविवार को यह खबर आई कि उनका निधन हो गया है।
आशा भोसले (Asha Bhosle Death) भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन भारतीय संगीत इतिहास में उनका नाम हमेशा सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। उन्होंने अपने करियर में आठ दशकों से भी ज्यादा समय तक संगीत की दुनिया में सक्रिय रहकर हजारों गाने गाए। उनकी आवाज में एक अलग ही जादू था, जिसने हर दौर के लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने लगभग 12 हजार से ज्यादा गाने गाए, जो अपने आप में एक अनोखा रिकॉर्ड है।
आशा भोसले के निधन (Asha Bhosle Death) पर पीएम मोदी, अमित शाह समेत देश के कई दिग्गज नेता, बॉलीवुड के कई सेलिब्रिटीज जैसे सलमान खान, शाहरुख़ खान, आमिर खान, प्रियंका चोपड़ा जैसे कलाकारों ने शोक प्रकट किया। इसके साथ ही ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया। ऐसे में आइये जानते हैं, उनके जीवन से जुड़ी छोटी बड़ी हर बात।
महाराष्ट्र के सांगली में 8 सितंबर 1933 को को आशा भोसले (Asha Bhosle Death) का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित दीनानाथ मंगेशकर था, जोकि एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक थे। जब वो 9 साल की थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया था। इसके बाद लता मंगेशकर जो उनकी बड़ी बहन के साथ खुद एक गायिका थीं, उन्होंने परिवार की जिम्मेदारी संभाली।
उनके साथ ही आशा भोसले ने भी गायन की दुनिया में कदम रखा। उनका पहला गाना था 'माझा बाल', जो एक मराठी फिल्म का संगीत था, और ये वर्ष 1943 में आया था। उन्होंने काफी मेहनत की और 1948 में बॉलीवुड के लिए फिल्म 'चुनरिया' से संगीत सफर शुरू किया।
आशा भोसले (Asha Bhosle Death) का गायन करियर लगभग 83 वर्षों का रहा। वह संगीत की ऐसी मिसाल थीं, जिन्होंने अपनी आवाज से भाषा की सीमाओं को तोड़ दिया। उन्होंने अपने लंबे करियर में 20 से ज्यादा भारतीय और विदेशी भाषाओं में 12,000 से अधिक गाने गाए, जो अपने आप में एक अनोखा रिकॉर्ड है। इसी असाधारण उपलब्धि के कारण उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है।
आशा भोसले ने सिर्फ हिंदी ही नहीं, बल्कि कई अलग-अलग भाषाओं में अपनी आवाज का जादू बिखेरा। हिंदी भाषा में उनके गाए 'पिया तू अब तो आजा', 'दम मारो दम', 'ये मेरा दिल' और 'चुरा लिया है तुमने' जैसे गाने आज भी हर पीढ़ी के बीच लोकप्रिय हैं। इन गानों में उनकी एनर्जी और अलग अंदाज साफ झलकता है। मराठी भाषा, जो उनकी मातृभाषा भी रही, उसमें भी आशा भोसले ने कई यादगार गीत गाए। 'बुगडी माझी सांडली' और 'माझ्या भावाला' जैसे गानों ने उनको नई पहचान देने का काम किया।
बंगाली भाषा में उन्होंने 'चोखे चोखे कोथा बोलो' और 'गुंजने डोले जे भ्रमर' जैसे गीतों ने उन्हें बंगाली संगीत प्रेमियों के बीच खास जगह दिलाई। दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी आशा भोसले का जादू खूब चला। तमिल में उन्होंने 'वेन्निला वेन्निला' और 'नी पार्था पारवाई' जैसे गीत गाए। वहीं, तेलुगु और मलयालम में भी उन्होंने कई फिल्मों के लिए गाने रिकॉर्ड किए और अपनी अलग पहचान बनाई।
आशा भोसले के कुछ लोकप्रिय भोजपुरी गाने भी गाए जिनमें 'मोरे होथवा से नथुनिया', 'गोरकी पतरकी रे' और 'राजा तोरी बगिया से' जैसे गाने शामिल है। उर्दू और गजल के क्षेत्र में भी आशा भोसले का योगदान बेहद खास रहा। 'दिल चीज क्या है', 'इन आंखों की मस्ती के' और 'ये क्या जगह है दोस्तों' जैसे गजलों ने उन्हें एक अलग ऊंचाई पर पहुंचाया।
उन्होंने पॉप, भजन, गजल, कव्वाली और शास्त्रीय संगीत जैसे हर रूप में खुद को साबित किया। 'राधा कैसे ना जले' और 'कमबख्त इश्क' जैसे गानों से लेकर पारंपरिक भजनों तक, उन्होंने हर शैली में अपनी अलग छाप छोड़ी।
आशा भोसले (Asha Bhosle Death) ने मात्र 9 साल की उम्र में ही गायन की दुनिया में कदम रख दिया था। उन्होंने सात दशकों से भी ज्यादा लंबे करियर में हजारों गाने गाए और हर तरह की संगीत शैली पर अपनी छाप छोड़ी। संगीत जगत में इन्हीं मेहनत के चलते उन्हें कई उपलब्धियां भी मिलीं। उन्होंने लता मंगेशकर के बाद हिंदी फिल्म संगीत में कई पीढ़ियों को मोहित किया।
उन्हें कई फिल्मफेयर अवॉर्ड्स मिले। इसके ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ महिला प्लेबैक सिंगर का फिल्मफेयर पुरस्कार 7 बार मिला। ये अवॉर्ड उन्होंने कई गानों के लिए प्राप्त किए, जिनकी लिस्ट यहां कुछ इस प्रकार है :-
1968: ‘गरीबों की सुनो’ (फिल्म - दस लाख), 1969: ‘पर्दे में रहने दो’ (शिकार), 1972: ‘पिया तू अब तो आजा’ (कारवां), 1973: ‘दम मारो दम’ (हरे रामा हरे कृष्णा), 1974: ‘होने लगी है रात’ (नैना), 1975: ‘चैन से हमको कभी’ (प्राण जाए पर वचन न जाए), 1979: ‘ये मेरा दिल’ (डॉन)
इसके अलावा आशा भोसले को 1996 में फिल्म ‘रंगीला’ के लिए फिल्मफेयर स्पेशल अवॉर्ड और 2001 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड भी मिला। आशा भोसले को दो बार सर्वश्रेष्ठ महिला प्लेबैक सिंगर का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। पहला साल 1981 की फिल्म 'उमराव जान' के ‘दिल चीज क्या है’ के लिए और दूसरा साल 1986 की फिल्म इजाजत के ‘मेरा कुछ सामान’ के लिए।
अन्य प्रमुख सम्मान पर नजर डालें तो आशा भोसले को भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए सर्वोच्च सम्मान साल 2000 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार मिला। वहीं, देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान साल 2008 में पद्म विभूषण से नवाजा गया। नाइटिंगेल ऑफ एशिया अवॉर्ड साल 1987 में मिला। सिंगर ऑफ द मिलेनियम साल 2000 में मिला। वहीं, आईफा अवॉर्ड साल 2002 में फिल्म ‘लगान’ के गाने ‘राधा कैसे न जले’ के लिए मिला था।
क्या आप सोच सकते हैं कि अपनी आवाज के दम पर लोगों के दिलों पर राज करने वालीं आशा भोसले (Asha Bhosle Death) को कभी रिजेक्शन का सामना करना पड़ सकता है? जी हाँ ऐसा हुआ है।
दरअसल आशा भोसले ने मुंबई के फेमस महालक्ष्मी स्टूडियो से 15 साल की उम्र में गाना गाना शुरू किया था। इस स्टूडियो में आशा और किशोर कुमार एक गाने की रिकॉर्डिंग करने पहुंचे थे, जहां गुलशन कुमार ने गाने की रिकॉर्डिंग में पहले ही देर कर दी थी और माइक इतने ऊंचे लगे थे कि दोनों को गाने में मुश्किल आ रही थी। ऐसे में स्टूडियो में दोनों सिंगर्स के लिए रिकॉर्ड करना मुश्किल हो रहा था।
वहीं, अमृता राव के साथ एक पोडकास्ट में आशा भोसले ने बताया था कि रॉबिन चटर्जी रिकॉर्डिस्ट ने हमें गाते हुए देखा और चिल्लाने लगे। ये कैसी आवाज है, नहीं चलेगी, गीता को बुलाओ और इन्हें बाहर भेजो। इतना सुनकर हम दोनों चुपचाप निकल गए। हमें बहुत बुरा लगा था, लेकिन उम्मीद नहीं छोड़ी। मन से दुखी भी थे। मैं और किशोर कुमार महालक्ष्मी रेलवे स्टेशन पर आ पहुंचे और वहां बैठकर समय बिताया। भूख भी लगी थी, क्योंकि पूरा दिन कुछ खाया नहीं था। तभी किशोर दा ने पास की दुकान से बासी बटाटा वड़ा और चाय ली और वो दिन का हमारा पहला खाना था।
आशा भोसले ने बताया कि गाने की रिकॉर्डिंग देर से शुरू हुई तो कुछ खाने का समय नहीं मिला और पूरा दिन ऐसे ही गुजर गया, लेकिन 4 साल बाद हम दोनों फेमस हो गए। किशोर कुमार अभिनेता और मैं सिंगर बन चुकी थी। हमें गाना रिकॉर्ड करने उसी स्टूडियो में आना था और रिकॉर्डिस्ट थे वही रॉबिन चटर्जी। किशोर कुमार ने साफ कर दिया कि वो इसके साथ गाना रिकॉर्ड नहीं करेंगे, लेकिन फिर हमने समझाया कि जो उसने किया, वो हम नहीं कर सकते। बता दें कि इस रिजेक्शन से पहले आशा और किशोर कुमार तीन गाने साथ में गा चुके थे और चौथा गाना गाने की तैयारी में थे।
लता मंगेशकर, आशा भोसले (Asha Bhosle Death) की बड़ी बहन थीं और उनसे पहले से संगीत जगत में काम कर रही थीं। उस दौर में जनता के दिलों पर लता मंगेशकर की आवाज का जादू था लेकिन इसमें आशा भोसले भी अपनी जगह बनाने में कामयाब हुईं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उन्होंने लता मंगेशकर के साथ कोई गाना गया था। इसका जवाब खुद आशा भोसले ने दिया था।
साल 1952 में उन्होंने फिल्म 'अनहोनी' में उनके साथ पहला गाना गया था। इस गाने के बोल थे: "ऐ इश्क ये दुनिया वाले।" वहीं, लता मंगेशकर के साथ उनका आखिरी गाना 1984 की फिल्म 'उत्सव' में गाया था। इस बेहद लोकप्रिय गाने के बोल थे, "मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को"
इसी पर उन्होंने एक बार सिंगिंग रियलिटी शो 'इंडियन आइडल' में बताया था कि लता दीदी और उन्होंने मिलकर 92 या 93 गाने गाए हैं। पुराने दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा, ''जब भी हम साथ में गाना गाते थे, तो हम एक-दूसरे की ओर देखते थे। मेरी हमेशा कोशिश रहती थी कि मैं लता दीदी से कभी कम न पड़ूं।''
शो के दौरान आशा भोसले ने मशहूर गीत 'मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को' गाकर भी सुनाया। इस दौरान खास बात यह रही कि उन्होंने उन हिस्सों को लता मंगेशकर के अंदाज में गाने की कोशिश की, जो असल में स्वर कोकिला ने गाए थे।
इस प्रदर्शन ने वहां मौजूद सभी लोगों को भावुक कर दिया। आशा भोसले ने एक दिलचस्प किस्सा साझा करते हुए बताया, ''इस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान जब मैंने 'आधी रात' वाली लाइन को थोड़ी अलग लय में गाया, तो लता दीदी ने चश्मा उठाकर मेरी तरफ देखा और गर्दन हिलाकर मेरी तारीफ की।'' यह पल मेरे लिए बेहद खास था।
दोनों बहनों ने साथ मिलकर भारतीय संगीत को कई यादगार गीत दिए, जिनमें 'मनभावन के घर जाए गोरी', 'मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को', 'मैं चली मैं चली देखो प्यार की गली', 'सखी रे सुन बोले पपीहा', 'छाप तिलक सब छीनी' जैसे गाने शामिल हैं। इन गानों ने न सिर्फ उस दौर में लोकप्रियता हासिल की, बल्कि आज भी लोगों की पसंदीदा गानों में शुमार हैं।
भारतीय संगीत जगत में आशा भोसले (Asha Bhosle Death) का नाम एक ऐसी गायिका के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने अपनी आवाज से हर दौर को खास बना दिया। उनका हुनर कुछ ऐसा था कि वह हर संगीतकार की जरूरत के हिसाब से आसानी से ढल जाती थीं। लेकिन, जब बात होती है कि आशा भोसले ने सबसे ज्यादा काम किस संगीतकार के साथ किया, तो एक नाम सबसे ऊपर आता है, और वो है आर. डी. बर्मन का, जिन्हें पंचम दा के नाम से भी जाना जाता है।
आर. डी. बर्मन और आशा भोसले की जोड़ी भारतीय संगीत इतिहास की सबसे सफल जोड़ियों में गिनी जाती है। दोनों ने मिलकर ऐसे गाने दिए, जो आज भी हर पीढ़ी के बीच लोकप्रिय हैं। 'दम मारो दम', 'पिया तू अब तो आजा', 'चुरा लिया है तुमने' और 'ये मेरा दिल' जैसे गानों ने उन्हें सुपरहिट बनाया। साथ ही हिंदी फिल्म संगीत में पॉप और डिस्को शैली को भी नई पहचान दी। इस जोड़ी ने पारंपरिक संगीत के साथ आधुनिक धुनों का ऐसा मेल बनाया, जो उस दौर में नया और आकर्षक था।
इसके अलावा ओ. पी. नैय्यर का नाम भी आशा भोसले के करियर में बेहद महत्वपूर्ण रहा। उनके शुरुआती दिनों में ओ. पी. नैय्यर ने ही उन्हें बड़ा मौका दिया और उनकी आवाज को एक अलग पहचान दी। 'आइए मेहरबान', 'ये है रेशमी जुल्फों का अंधेरा' और 'जाइए आप कहां जाएंगे' जैसे गानों ने आशा भोसले को एक अलग मुकाम पर पहुंचाया। नैय्यर के संगीत में जो रिदम थी, उसे आशा भोसले ने अपनी आवाज से और भी खास बना दिया।
वहीं, सचिन देव बर्मन (एस. डी. बर्मन) के साथ भी आशा भोसले ने कई यादगार गाने गाए। 1950 के दशक में जब लता मंगेशकर और दादा बर्मन के बीच कुछ समय के लिए दूरी आई, तब आशा भोसले उनकी प्रमुख गायिका बन गईं। 'छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा', 'हाल कैसा है जनाब का' और 'दीवाना मस्ताना हुआ दिल' जैसे गानों में उनकी आवाज ने गहराई ला दी।
खय्याम के साथ आशा भोसले की साझेदारी भी बेहद खास रही। खासतौर पर फिल्म 'उमराव जान' के गानों ने उनकी गायकी का एक अलग ही रूप पेश किया। 'दिल चीज क्या है' और 'इन आंखों की मस्ती के' जैसे गजलों ने यह साबित किया कि आशा भोसले शास्त्रीय और सूफियाना अंदाज में भी उतनी ही माहिर हैं। इन गानों के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।
इसके अलावा, ए. आर. रहमान के साथ भी आशा भोसले ने नई पीढ़ी के लिए कई हिट गाने दिए। 'रंगीला रे', 'तन्हा तन्हा' और 'राधा कैसे ना जले' जैसे गानों में उनकी आवाज ने साबित किया कि उम्र सिर्फ एक नंबर है। उन्होंने नई धुनों और आधुनिक संगीत के साथ खुद को बखूबी ढाला और युवा दर्शकों के बीच भी अपनी पहचान बनाए रखी।
‘सुरों की आशा’ कहे जाने वाली आशा भोसले (Asha Bhosle Death) ने अपनी अनोखी आवाज से हिंदी सिनेमा को अमर गाने दिए लेकिन क्या आप कभी सोच सकते हैं कि उनके गाने को भी बैन किया जा सकता है। जी हाँ ऐसा हुआ है। साल 1971 में उन्होंने एक गाना गया था, जिसके बोल थे, ''दम मारो दम।" इस गाने को रेडियो पर बैन कर दिया गया था और दूरदर्शन ने इसे हटा दिया था, फिर भी आशा भोसले को इस गाने के लिए बेस्ट प्लेबैक सिंगर (फीमेल) का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला।
फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ में देव आनंद, जीनत अमान और मुमताज अभिनीत इस आइकॉनिक गाने को आरडी बर्मन ने संगीत दिया था और आनंद बख्शी ने बोल लिखे थे। गाने में जीनत अमान को हिप्पी स्टाइल में चिलम अर्थात तंबाकू का सेवन करते हुए दिखाया गया था। गाने की कैची धुन, बोल और बोल्ड दृश्य ने इसे तुरंत लोकप्रिय बना दिया, लेकिन साथ ही विवादों में भी घसीट लिया।
फिल्म की रिलीज के दौरान उस समय देश में हिप्पी कल्चर और ड्रग्स की लत तेजी से फैल रही थी। फिल्म की कहानी का मुख्य मकसद हिप्पी जीवनशैली और नशे की बुरी आदत पर कटाक्ष करना था। फिल्म की कहानी में देव आनंद का किरदार अपनी बहन (जीनत अमान) को ढूंढते हुए काठमांडू जाते हैं और वहां देखते हैं कि उनकी बहन पूरी तरह नशे की दुनिया में खो चुकी होती है। फिल्म इस समस्या को उजागर करती है लेकिन ‘दम मारो दम’ गाने की वजह से लोगों ने इसे नशे को ग्लैमराइज करने वाला बताया।
कई संगठनों और अभिभावकों ने इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ करार दिया। विवाद इतना बढ़ गया कि ऑल इंडिया रेडियो ने गाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। जब फिल्म दूरदर्शन पर प्रसारित हुई तो ‘दम मारो दम’ गाने को पूरी तरह काट दिया गया। टीवी प्रसारण के दौरान इस गाने को हटा दिया गया था।
आशा भोसले (Asha Bhosle Death) का निजी जीवन बहुत विवादों और संघर्षों से भरा रहा। उनकी दो शादियां हुई थी। पहली शादी उनसे 15 साल बड़े व्यक्ति गणपत राव से हुई थी, जबकि दूसरी शादी तलाक के करीब 20 साल बाद उनसे 6 साल छोटे संगीतकार आरडी बर्मन से हुई।
उनकी दोनों शादियां सिनेमा जगत में हमेशा चर्चा का विषय बनी रहीं। आशा भोसले की पहली शादी बहुत कम उम्र में हुई थी। जानकारी के अनुसार, वह मात्र 16 साल की थीं, जब उन्होंने लता मंगेशकर के सेक्रेटरी गणपत राव भोसले से शादी कर ली। गणपत राव उनसे 15 साल बड़े थे। इस लव मैरिज को लता मंगेशकर और उनके परिवार ने स्वीकार नहीं किया।
जैसे-तैसे शादी कुछ साल चली। शादी के 11 साल बाद 1960 में गणपत राव और आशा भोसले दोनों अलग हो गए थे। इस रिश्ते से आशा भोसले को तीन बच्चे हुए बेटी वर्षा भोसले, बेटे हेमंत भोसले और आनंद भोसले। गणपत राव ने आशा भोसले को दो बच्चों के साथ और तीसरे बच्चे की गर्भावस्था के दौरान ही घर से निकाल दिया था। तलाक के बाद आशा भोसले ने अपनी जिंदगी को संवारने पर पूरा ध्यान दिया। उन्होंने गाने गाकर अपनी पहचान बनाई और करियर में आगे बढ़ती गईं।
तलाक के लगभग 20 साल बाद आशा भोसले की जिंदगी में फिर प्यार आया। एक गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान उनकी मुलाकात मशहूर म्यूजिक डायरेक्टर राहुल देव बर्मन यानी आरडी बर्मन से हुई। आरडी बर्मन आशा भोसले से 6 साल छोटे थे। आरडी बर्मन ने ही पहले आशा भोसले से अपने प्यार का इजहार किया था। इसके बाद दोनों ने जिंदगी साथ में गुजारने का फैसला लिया और साल 1980 में शादी कर ली। यह आरडी बर्मन की भी दूसरी शादी थी। उनकी पहली पत्नी रीता पटेल से 1971 में तलाक हो चुका था। हालांकि, आरडी बर्मन की मां इस रिश्ते के खिलाफ थीं।
साल 1994 में आरडी बर्मन का निधन हो गया था। बर्मन के निधन के बाद आशा भोसले के जीवन पर और मुसीबतें आईं। साल 2012 में उनकी बेटी वर्षा भोसले ने आत्महत्या कर ली और 2015 में बेटे हेमंत भोसले का कैंसर से निधन हो गया। इन दोनों घटनाओं ने आशा भोसले को अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया था, लेकिन निजी जिंदगी में आई मुसीबतों का उन्होंने हमेशा हंसकर सामना किया।
आपको जानकर हैरानी होगी कि आशा भोसले (Asha Bhosle Death) का जीवन सिर्फ संगीत जगत तक सीमित नहीं था। गानों में सुरीली आवाज देने वाली आशा भोसले की संपत्ति की बात करें तो मीडिया रिपोर्ट्स में जिक्र है कि उनकी अनुमानित नेट वर्थ 200 से 250 करोड़ रुपए तक है।
वो सिर्फएक कलाकार ही नहीं बल्कि एक सफल बिजनेसवुमन भी रहीं। आशा भोसले ने दुनियाभर में अपनी एक रेस्टोरेंट चेन खोली। इनमें खाड़ी क्षेत्र के देश जैसे यूएई, कुवैत और बहरीन में उनके रेस्टोरेंट हैं। इसके अलावा यूके के बर्मिंघम और मैनचेस्टर में भी रेस्टोरेंट खोले। कहा जाता है कि आशा खुद एक अच्छी कुक थीं और उन्होंने शेफ को ट्रेनिंग भी दी।
उन्हें लग्जरी गाड़ियों का भी शौक रहा। वहीं, कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार उनके पास लगभग 80 से 100 करोड़ रुपए तक की प्रॉपर्टी है। उनकी मुंबई और पुणे में आलीशान रिहायशी प्रॉपर्टीज भी हैं। एक लग्जरी अपार्टमेंट भी शामिल था, जिसे उन्होंने अच्छी कीमत में बेच दिया था।
बहुत कम लोग जानते हैं कि आशा भोसले (Asha Bhosle Death) ने एक्टिंग की दुनिया में भी हाथ आजमाया था। उन्होंने पर्दे पर इतना भावुक रोल प्ले किया था कि दर्शक रोने के लिए मजबूर हो गए थे। उन्होंने मराठी फिल्म माई में एक मां का किरदार निभाया था।
इस फिल्म में वो ऐसी मां बनी थी जो अल्जाइमर की बीमारी से पीड़ित हैं और चीजों को याद नहीं रख पाती। फिल्म में उनका बेटा (राम कपूर) उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ने का फैसला लेते हैं, जबकि बेटी (पद्मिनी कोल्हापुरे) उनका ध्यान रखती है। यह फिल्म उनके लिए बहुत खास थी, क्योंकि उनकी यह डेब्यू फिल्म थी और उन्हें फिल्म की कहानी इतनी मार्मिक लगी कि उन्होंने सिंगिंग के साथ-साथ एक्टिंग करने का भी फैसला कर लिया।
2013 में उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि माई के किरदार ने उन्हें भावुक कर दिया था और यह किरदार उनके जीवन की वास्तविकता के भी काफी करीब है। खास बात यह थी आशा भोसले ने फिल्म के किसी भी इमोशनल सीन के लिए रोने के लिए ग्लिसरीन का इस्तेमाल नहीं किया था। उनकी आंखों में खुद-ब-खुद आंसू आ जाते थे। उन्होंने कहा था, मैं किरदार में खुद को इतना झोंक देती थी कि भावनाएं खुद-ब-खुद आ जाती थीं।
आशा भोसले (Asha Bhosle Death) के जीवन में एक ऐसा पल भी आया था जब उन्हें रोकर एक गाना रिकॉर्ड करना पड़ा था। 1963 में बिमल रॉय की 'बंदिनी' रिलीज हुई। नूतन, धर्मेंद्र और अशोक कुमार ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। गुलजार ने भी 'मोरा गोरा अंग लइ ले' इस फिल्म में बतौर गीतकार डेब्यू किया था। संगीत दिया था एसडी बर्मन यानी सचिन देव बर्मन ने। एक गाना था जिसे उन्होंने 'आसा' (आशा भोसले को इसी नाम से पुकारते थे सचिन दा) को गाने के लिए सौंपा।
माइक्रोफोन पर गाने आईं तो टेक्निकली बिल्कुल ठीक थीं। गाना भी रौ में था, लेकिन वो बात नहीं थी जिसकी अपेक्षा सचिन देव बर्मन कर रहे थे। फिर क्या, दादा नाराज हो गए और बोले, "आसा, क्या 'बाल' तुम्हारा भाई नहीं है? क्या तुम उसे राखी नहीं बांधती?"
आशा का निजी जीवन तब काफी दर्द से गुजर रहा था। उन्होंने खुद बताया, "उस समय, मेरी शादी हो चुकी थी और मैं अपने परिवार से अलग रह रही थी; मुझे अपने भाई बाल (हृदयनाथ मंगेशकर) की इतनी ज्यादा याद आ रही थी कि मैं रो पड़ी। दादा ने तुरंत 'टेक' के लिए तैयार होने को कहा, और फिर मैंने वह गाना एक ही टेक में रिकॉर्ड कर दिया।
आशा भोसले (Asha Bhosle Death) ने केवल सिनेमा तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने भारत के शुरुआती विज्ञापन जगत पर भी अपनी पहचान बनाई। रेडियो और टेलीविजन जिंगल्स के विज्ञापनों में अपनी आवाज के जरिये पहचान कायम की। उस समय आशा भोसले उन चुनिंदा मशहूर प्लेबैक सिंगर्स में शामिल थीं, जिन्होंने ब्रांड वैल्यू को मजबूत करने के लिए जिंगल्स को अपनी आवाज देना शुरू किया।
1960-70 के दशक में आशा भोसले के सबसे चर्चित विज्ञापन में से एक हिंदुस्तान लीवर (अब हिंदुस्तान यूनीलीवर) के हिमालया बुके टॉयलेट सोप का है। फिर कई दशकों बाद आशा भोसले ने 2002 में रसना के लिए “रसीला रोजाना उत्सव” जिंगल के साथ विज्ञापन जगत में वापसी की। उनकी जानी-पहचानी आवाज ने अलग-अलग पीढ़ियों के बीच इस ब्रांड की पहचान को और गहरा बना दिया था।
आपको बता दें कि आशा भोसले (Asha Bhosle Death) के पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर भी गायक और अभिनेता थे जबकि मां शेवंती मंगेशकर गृहिणी थीं। दीनानाथ मंगेशकर के पिता गणेश भट्ट नवथे, जिन्हें भीकोबा या भीकम्भट्ट कहा जाता था। भीकोबा गोवा के प्रसिद्ध मंगेशी मंदिर में पुजारी थे। दीनानाथ की माता येसुबाई राणे एक प्रतिष्ठित संगीतकार थीं।
वहीं, दीनानाथ मंगेशकर की बेटी लता मंगेशकर भी महान गायिका थीं और आशा भोसले की बड़ी बहन थीं। बहन ऊषा मंगेशकर गायिका और मीना खड़िकर गायक-संगीतकार व भाई हृदयनाथ मंगेशकर संगीतकार हैं। लता मंगेशकर का निधन 6 फ़रवरी 2022 को हो चुका है, जबकि मीना खडीकर, ऊषा मंगेशकर और हृदयनाथ मंगेशकर जीवित हैं।
आज आशा भोसले हमारे बीच नहीं हैं। वो लता मगेशकर की बहन थीं जिनका निधन 6 फ़रवरी 2022 रविवार को 92 वर्ष की आयु में मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में हुआ था। दोनों बहनों के निधन में कुछ बात सामान्य है। अस्पताल, दिन रविवार और आयु।