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भारत के कई राज्यों में रात 12 बजे के बाद सन्नटा पसर जाता है। सड़कों पर सूखी पत्तियों के सरसराने की आवाज तक आती है। कप्लना करके देखिये कि रात के करीब 2 बजे एक टैंकर, जिसमे दूध है, वो सन्नाटों को चीरती हुई, आगे बढ़ रही है। उसे पता है की आगे नाका है और सिपाही मुस्तैद है। ड्राइवर को जरा भी खौफ नहीं क्योंकि उसने टैंकर में दूध रखा है लेकिन ये कोई नहीं जानता है कि उस दूध के नीचे लाल पानी का जखीरा भी है, जिसे शराब कहते हैं।
ये बातें को हवा हवाई वाली नहीं हैं बल्कि ये उन राज्यों की कहानी की तरह है जहाँ ये तो कह दिया जाता है कि हमारे राज्य में शराबबंदी (Liquor Ban Reality India) है लेकिन इसके पीछे का काला सच कुछ और ही होता है। ऐसे में आइये इसके पीछे का सच जानते हैं, जो कभी भी अखबार के पहले पन्ने पर नज़र नहीं आता है।
वर्तमान समय में भारत में 5 राज्य ऐसे हैं जहाँ कागजों पर शराब बेचना, खरीदना और पीना कानूनन रूप से अपराध की श्रेणी में आता है। 1 मई 1960 को गुजरात देश का पहला ऐसा राज्य बना जहाँ शराबबंदी (Liquor Ban Reality India) लागू की गई।
फिर 1979 में लक्षद्वीप में और इसके बाद 1989 में नागालैंड में, फिर 2016 में बिहार में और फिर मिजोरम में 2019 में शराबबंदी लागू की गई। हालांकि, लक्षद्वीप में चेतलात, बंगाराम और बित्रा जैसे क्षेत्रों में पर्यटन के नज़रिये से शराब के वितरण की अनुमति है।
लक्षद्वीप को छोड़ दें, तो अन्य राज्यों में शराबबंदी (Liquor Ban Reality India) धरातल पर लागू होती नहीं दिखती है। बिहार, गुजरात, नागालैंड और मिजोरम जैसे राज्यों में शराबबंदी मात्र एक मजाक बनकर रह गया है।
गुजरात: 1960 से इस राज्य में शराबबंदी लागू है लेकिन यहाँ शराब की ब्लैकिंग आम है। सबसे ज्यादा खौफनाक मामला 2009 में आया था, जो लठ्ठा कांड के नाम से मशहूर है। महेमदाबाद के पास अवैध शराब की भट्टियां थीं जहाँ पानी में मिथाइल अल्कोहल मिलाकर देसी शराब तैयार की जाती थी। इसके सेवन से करीब 148 लोगों की मौत हुई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लगभग 276 लोगों को अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कराया गया था, जिनमें से कई की आंखों की रोशनी चली गई थी। वहीं, ताजा मामला 11 अप्रैल 2026 का है, जहाँ उमेटा गांव के एक फार्महाउस में छापेमारी हुई थी। यहाँ 18 लोग शराबपार्टी करते पकड़े गए थे।
बिहार: यह घटना दिसंबर 2022 की है। बिहार में सारण एक जिला है जहाँ से ज़हरीली शराब पीने के चलते आधिकारिक तौर पर लगभग 42 लोगों की मौत बताई गई थी। बताया जाता है कि 'होम्योपैथिक दवा' और 'स्पिरिट' मिलाकर नकली देसी शराब बनाई गई थी। इस विवाद के बाद सीएम नीतीश कुमार ने कहा था कि "जो पिएगा, वो मरेगा", जिसके बाद उनके बयान की खूब आलोचना हुई थी।
नागालैंड: इस राज्य में 1989 से ही शराबबंदी लागू है लेकिन नियम की जमकर धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। हाल फिलहाल में यहाँ से कोई ऐसी खबर नहीं आई है लेकिन पुराने आंकड़ों के अनुसार, 2013-2018 के बीच शराब के कारण 479 मौतें हुई थीं। कहा जाता है कि दीमापुर में अवैध शराब का नेटवर्क सबसे मजबूत है और यहाँ मिलावटी शराब मिलती है। यही कारण है कि नागालैंड में 40 से 70 वर्ष की आयु के लोगों में लीवर और किडनी फेलियर जैसी बीमारी देखने को मिल रही है। सितंबर 2024 में पुलिस ने एक दिन में करीब 9,500 बोतलें जब्त की थीं।
मिजोरम: इस राज्य में जनवरी से जून 2025 के बीच केवल छह महीनों में शराब पीने से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं के कारण 49 लोगों की मौत की खबर सामने आई थी। हैरानी की बात यह है कि इसमें 5 महिलाऐं भी शामिल थी। 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी से अप्रैल के बीच अब तक 9 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं।
लक्षद्वीप: यहाँ पर अमिनी और अन्दरोत जैसे इलाके हैं जहाँ शराब पूरी तरह से प्रतिबंधित है क्योंकि कहा जाता है कि ये मुस्लिम बहुल इलाके हैं लेकिन लक्षद्वीप में चेतलात, बंगाराम और बित्रा जैसे क्षेत्रों में सरकार ने शराब के सेवन की अनुमति दी है लेकिन सिर्फ पर्यटन के नजरिये से। इसके साथ ही इन जगहों पर आप सीधे तौर पर शराब लेकर नहीं जा सकते हैं। आपको वही रहकर इसका सेवन करना होगा।
गौरतलब है कि शराब की कालाबाज़ारी (Liquor Ban Reality India) का एक संगठित नेटवर्क होता है। कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कालाबाज़ारी के लिए महंगी गाड़ियां, दूध के टैंकर, एल्बुलेंस और फल-सब्जियों के ट्रकों का इस्तेमाल होता है।
इसके साथ ही आधुनिकयुग में सोशल मीडिया के जरिये 'होम डिलीवरी' का खेल भी चलता है। वहीं, औद्योगिक मिथाइल अल्कोहल या होम्योपैथिक दवाओं में रसायनों की मिलावट कर कच्ची शराब बनाई जाती है, जो सस्ती होने के कारण गरीब बस्तियों में ब्लैक करके पहुंचाई जाती है।
आपको बता दें कि 1996 में हरियाणा में चौधरी बंसीलाल की सरकार थी जिन्होंने 1 जुलाई 1996 से पूरे राज्य में पूर्ण शराबबंदी (Liquor Ban Reality India) लागू कर दी। इस नीति का मुख्य उद्देश्य सामाजिक बुराइयों को कम करना और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा रोकना था लेकिन हुआ ठीक उल्टा। राज्य में शराब की कालाबाजारी शुरू हो गई।
इस प्रतिबंध के कारण राज्य सरकार को सालाना करीब 600 करोड़ से 1,200 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होने लगा था। इसके बाद बंसीलाल सरकार ने 1 अप्रैल 1998 को शराबबंदी वापस ले ली और शराब की बिक्री फिर से शुरू कर दी, क्योंकि राज्य में इससे भ्रष्टाचार बढ़ रहा था और आर्थिक संकट गहराने लगा था।
NOTE: इस आर्टिकल का मकसद यह नहीं है कि शराबबंदी को गलत ठहराया जा रहा है। बस यह बताने की कोशिश है कि शराबबंदी सही से लागू नहीं हो रहा है जिसके कारण कालाबाजारी हो रही है।