

16 जनवरी 2026 को नोएडा सेक्टर-150 में घने कोहरे के बीच पानी से भरे गड्ढे में कार गिरने से 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत हो गई।
इस हादसे ने सेक्टर-150 की “स्पोर्ट्स सिटी” योजना से जुड़े पुराने विवाद और इलाहाबाद हाईकोर्ट के CBI जांच आदेश को फिर से चर्चा में ला दिया।
मामला अब सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही—सड़क सुरक्षा की कमी और कथित जमीन/अलॉटमेंट घोटाले—पर बड़ा सवाल बन गया है।
भारत को रोड एक्सीडेंट (Road Accidents ) की राजधानी कहा जाने लगा है। सरकार बदलती रहती हैं और सड़कों की हालात वही रहती है। सड़क बनवाने, रोड एक्सीडेंट कम होने का किया गया वादा सिर्फ वादा बन कर रह जाता है। इसी से जुड़ी एक ख़बर 16 जनवरी 2026 को नोएडा (Sector 150) से सामने आयी, जहाँ 27 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता (Yuvraj Mehta) की कार घने कोहरे में एक पानी से भरे गड्ढे में जा गिरी और वो अंदर फँस गए जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की मृत्यु हो गई। युवराज की मौत से पहले ही नोएडा सेक्टर 150 की ‘स्पोर्ट्स सिटी’ की फाइलों में बदबू थी।
नोएडा बड़े-बड़े हाईवे, एक्सप्रेस वे, बड़ी कंपनियों के लिए जानी जाती है, जहाँ रोज़ ही कोई न कोई व्यक्ति काम करने के कारण शिफ्ट करता है। लेकिन इसी चमक-धमक के बीच एक ऐसा सच भी है, जो हर बार किसी हादसे के बाद सामने आता है: सरकार का अन्देखापन।
नोएडा सेक्टर 150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत एक पहली घटना नहीं है जब लोगों को ऐसी ख़बर से सदमा लगा हो। परन्तु इस हादसे ने एक पुराने विवाद को फिर से जन्म दे दिया है जो कि नोएडा की “स्पोर्ट्स सिटी” योजना से जुड़ी है, जिसे अदालत तक में “घोटाले जैसा” बताकर CBI जांच के दायरे में लाया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक जिस दलदली पानी भरे प्लॉट में युवराज की कार फंसी और वो डूब गए, वो जगह अब जांच एजेंसियों के लिए भी अहम हो गई है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि वहां बेसिक सेफ्टी क्यों नहीं थी—असल सवाल ये है कि जिस जमीन पर कभी स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर बनने का दावा किया गया था, वह एक मौत का खाई बन कर कैसे रह गई ?
2004 में NOIDA (New Okhla Industrial Development Authority) ने फैसला किया कि नोएडा में अंतरराष्ट्रीय स्तर की स्पोर्ट्स सुविधाएँ विकसित की जाएँगी। इसके करीब 10 साल बाद, 2014 में NOIDA ने सेक्टर 150 में “स्पोर्ट्स सिटी” (SC-02) विकसित करने के लिए लगभग 12 लाख वर्ग मीटर (120 हेक्टेयर) जमीन के आवंटन हेतु आवेदन मांगे। इस जमीन का रिज़र्व प्राइस ₹18,865 प्रति वर्ग मीटर रखा गया।
योजना के अनुसार, डेवलपर को कुल जमीन के 70% हिस्से पर स्पोर्ट्स सुविधाएँ बनानी थीं और यह हिस्सा नॉन-ट्रांसफरेबल होना था। इन सुविधाओं को विकसित करने की लागत की भरपाई के लिए डेवलपर को 29.5% जमीन पर ग्रुप हाउसिंग (रेजिडेंशियल) बनाने की अनुमति दी गई और शेष 0.5% हिस्से पर कमर्शियल निर्माण की अनुमति थी।
यह प्रोजेक्ट रियल एस्टेट कंपनी Lotus Green Constructions Pvt Ltd के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम को ₹2,300 करोड़ से अधिक में आवंटित किया गया। शर्तों के मुताबिक, स्पोर्ट्स सुविधाएँ दिसंबर 2019 तक और रेजिडेंशियल सुविधाएँ दिसंबर 2021 तक पूरी होनी थीं।
लेकिन जून 2021 में NOIDA ने स्पोर्ट्स सिटी से जुड़ी सभी गतिविधियाँ फ्रीज़ कर दीं और मामले को दिशा-निर्देश के लिए राज्य सरकार के पास भेज दिया। साथ ही यूपी विधानसभा के सदस्यों वाली एक Public Accounts Committee (PAC) भी गठित की गई, ताकि पूरे मामले की जांच की जा सके।
इसी दौरान 2021 में Lotus Green ने NOIDA Authority के साथ डील की शर्तों को लेकर विवाद पर राहत मांगते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया।
इसके बाद 24 फरवरी 2025 को हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि “इतने बड़े स्तर का घोटाला NOIDA Authority के प्रमुख पदों पर बैठे अधिकारियों की संलिप्तता के बिना संभव नहीं है।” कोर्ट ने CBI को निर्देश दिया कि वह NOIDA के “साठगांठ करने वाले अधिकारियों” और मामले में शामिल निजी व्यक्तियों/बिल्डरों/अलॉटियों के खिलाफ FIR दर्ज करे।
हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि अधिकारियों ने “आँखें बंद कर रखीं”, जबकि बिल्डर रेजिडेंशियल अपार्टमेंट्स बेच और विकसित कर रहे थे, लेकिन स्पोर्ट्स सुविधाओं के विकास की तरफ—जो पहले बननी थीं—कोई ठोस काम नहीं किया गया।
स्पोर्ट्स सिटी: नाम खेल का, खेल जमीन का?
नोएडा की स्पोर्ट्स सिटी स्कीम का दावा था कि यहां इंटरनेशनल-स्टैंडर्ड स्पोर्ट्स सुविधाएं विकसित होंगी। लेकिन जांच में शक है कि नियमों को मोड़कर और कंपनियों/सब्सिडियरी के जरिए प्लॉट्स को इस तरह बाँटा गया कि जिम्मेदारी भी बंटती गई और फायदे भी।
यही वजह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद CBI को जांच सौंपी गई और अब फाइलों से लेकर अलॉटमेंट और ट्रांसफर तक—हर कड़ी को जोड़ा जा रहा है।
CAG (Comptroller and Auditor General) की रिपोर्ट
इस पूरे मामले को और गंभीर बनाती है CAG की 2020 की रिपोर्ट, जिसमें स्पोर्ट्स सिटी प्रोजेक्ट में नियमों के उल्लंघन, गलत अलॉटमेंट, सब-डिविजन, पात्रता मानकों में गड़बड़ी और बकाया वसूली जैसी बातों से लगभग नौं हजारों करोड़ के नुकसान की ओर इशारा किया गया था। यही रिपोर्ट बाद में कोर्ट की कार्यवाही की बड़ी वजह बनी।
नोएडा में सरकार की लापरवाही
सेक्टर-150 सिर्फ पौष सेक्टर (Posh Sector) नहीं रहा। ये इलाका एक्सप्रेसवे, ऑफिस-ट्रैफिक, साइट वर्क, कॉरपोरेट/आईटी और आसपास के डेवलपमेंट का हॉटस्पॉट बन चुका है। ऐसे में यहां सड़क, बैरिकेडिंग, लाइटिंग और चेतावनी संकेत जैसी चीजें “ऑप्शन” नहीं, बेसिक जरूरत हैं—क्योंकि यहां हर वक्त मूवमेंट है, नौजवान नोएडा में रहते हैं और काम करते हैं , ऐसे अगर इनकी जिम्मेदारी सरकार नहीं लेगी तो और कौन लेगा? और जब इसी इलाके में एक युवा की मौत होती है, तो लोग इसे सिर्फ “हादसा” नहीं मानते—उसे लापरवाही और सिस्टम फेलियर (System Failure) की तरह देखते हैं।
CBI जांच के बीच कई परतें खुल रही हैं—कौन सी कंपनी किस प्लॉट पर थी, किस नियम के तहत सब-डिविजन हुआ, किसने मंजूरी दी, और किसने आंखें मूंद लीं। युवराज की मौत ने बस इतना किया कि पुरानी फाइलें फिर से खुल गईं।
(PO)