

भारत के मुख्य न्यायाधीश अर्थात सीजेआई सूर्यकांत (CJI Suryakant) द्वारा शुक्रवार को कोर्ट में सुनवाई के दौरान देश के बेरोजगार युवाओं की तुलना "काॅकरोच" ("Cockroach") से करने तथा (ऐसे लोग मीडिया, सोशल मीडिया व आरटीआई एक्टिविस्ट बनकर सिस्टम पर हमले करते हैं) जैसी बचकाना बातों की कड़े शब्दों में भर्त्सना की जानी चाहिए।
वास्तव मे सीजेआई ने ऐसा बोलकर न केवल देश के संविधान को गाली दी है। अपितु भारतीय संविधान (Indian Constitution) के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत 'वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' (अभिव्यक्ति की आजादी) जो कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। तथा यह अधिकार नागरिकों को अपने विचार, राय और विश्वास को बोलकर, लिखकर, छापकर या अन्य माध्यमों से खुलकर व्यक्त करने की गारंटी देता है, जो लोकतंत्र का मूल आधार है संग आरटीआई को भी अप्रत्यक्ष रूप से कलंकित करने का कार्य किया है।
इसी के साथ सीजेआई सूर्यकांत ने अपने पद की मर्यादा के विपरित बेरोजगारों को "लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया" को अपना रोजगार बनाकर ईमानदारी पूर्वक जीवन निर्वाह करने बाबत मीडिया को भी कलुषित करने का घृणित व ओछा कार्य किया है। "सीजेआई सूर्यकांत को यह याद रखना चाहिए कि यह देश, समाज और देश के बेरोजगार युवा किसी कोर्ट के बंधुआ अथवा जागीर नहीं है" ।
सीजेआई सूर्यकांत को यह स्मरण रहना चाहिए कि आज वे जिस स्वतंत्र देश की आबोहवा में श्वास ले रहे हैं। इस आज़ादी की जंग में हजारों बेरोजगार युवाओं ने अपने प्राणों की आहुति डाली थी।
"आज वे जिन बेरोजगार युवाओं को कॉकरोच बताकर अपने हक व हकूक की लडाई लडने तथा भ्रष्टाचार उजागर करने को" मीडिया का सहारा लेकर सिस्टम पर हमले करने की बेतुकी, घटिया व दकियानूसी बात कह रहे हैं । कदाचित सीजेआई सूर्यकांत को यह इल्म नहीं कि देश की इसी मीडिया का सहारा लेकर इन्हीं "बेरोजगार युवाओं ने 'अकबर इलाहाबादी' के कथन "जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो" के अनुसार, मीडिया ने प्रतिरोध का सशक्त माध्यम बनकर जनता को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया था।
इसी मीडिया के सहारे बेरोजगार और क्रांतिकारी युवाओं ने अंग्रेजी शासन के दमनकारी कानूनों और शोषणकारी नीतियों को उजागर किया कर उसकी चूलें हिला दी थी।
सीजेआई सूर्यकांत के तथाकथित बोल अनुसार इन्हीं "काॅकरोचों" ने विचारों के माध्यम से देशवासियों में राष्ट्रवाद की भावना जगाई और एकता स्थापित की थी। इन्हीं आज़ाद, भगत सिंह, तिलक आदि देश के महान क्रांतिकारी बेरोजगार युवाओं ने मीडिया का सहारा लेकर जलियांवाला बाज हत्याकांड और अंग्रेजों की फूट डालो राज करो जैसी अनगिनत दमनकारी नीतियों को प्रमुखता से प्रकाशित किया था।
सीजेआई सूर्यकांत (CJI Suryakant) को आईन्दा यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के जिस आलीशान सिंहासन पर वे आज विराजमान हैं। यह सिंहासन भी देश के उन हजारों अमर शहीद बेरोजगारों की शहादत की ही देन है।जिन्हें निर्लज्जतापूर्वक अपमानित करते हुए उन्होंने "काॅकरोच" के अलंकरण से सम्मानित किया है।
गौर हो, इससे पूर्व भी सीजेआई सूर्यकांत (CJI Suryakant) ने कार्यपालिका व सरकार के अधिकार क्षेत्र में सीधे नाजायज रूप से हस्तक्षेप करते हुए एनसीईआरटी के 8वीं के शैक्षणिक अध्याय में न्यायालय में भ्रष्टाचार" विषय पर एक चैप्टर जोड़े जाने पर सीजेआई की पद व गरिमा के विपरीत इसे न्यायालय की गरिमा पर सुनियोजित हमला बताकर अनावश्यक अपनी निम्नस्तरीय हेकड़ी व धौंस जमाने का कार्य किया था। पूरे देश को विदित है कि न्यायालय में नीचे से लेकर ऊपर तक कितनी राजशाही, भ्रष्टाचार व भाई-भतीजावाद मौजूद है! फिर क्या किसी विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कोई चैप्टर रखना अथवा उसे उजागर करना कोई जुर्म है? क्या किसी विभाग या संस्था के मातहत भ्रष्टाचार के नाम पर चैप्टर जोडे जाने मात्र से ही वह बदनाम हो जाता है? सीजेआई सूर्यकांत को देश के बेरोजगार युवाओं को "काॅकरोच" की संज्ञा से नवाजे जाने के बिगड़े बोल पर तत्काल सार्वजनिक रूप से माफी मांग कर अपने बडप्पन का परिचय देना चाहिए। सीजेआई सूर्यकांत को देश के बेरोजगारों की अस्मिता, गरिमा व छवि को "काॅकरोच" कहकर उसे ठेस पहुंचाने का कोई अधिकार नहीं है।