

• UGC के नए नियमों को लेकर देशभर में प्रतिक्रिया देखने को मिली, जिससे सामाजिक ध्रुवीकरण की आशंका जताई गई।
• विरोध की तीव्रता ने कई लोगों को 1990 के मंडल विरोधी आंदोलन की याद दिला दी।
• सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक के बाद हालात फिलहाल स्थिर बने हुए हैं।
हाल ही में यूजीसी (UGC) के नए नियम आने से समाज में एक विभाजन की आशंका जताई जा रही है। इस नए नियम पर जिस तरीके से समाज में प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है वैसे में मंडल विरोधी आंदोलन की याद सभी के लिए ताज़ा होती जा रही है। समाज में अगड़ा बनाम पिछड़ा संघर्ष बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। समाज का एक तबका इस नए नियम के समर्थन में दिखाई दिया। वहीं समाज का दूसरा तबका इस नए नियम के विरोध में खड़ा होता दिखाई दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने नए नियम पर फिलहाल रोक लगा दी है। परन्तु विरोध कुछ इस तरीके से बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा था कि लोगों को 1990 के मंडल कमीशन के विरोध में हुए अंदोलन की याद आ गई। भारत में समय-समय पर अगड़ा बनाम पिछड़ा की लड़ाई उभरकर सामने आती रही है। बीच-बीच में विरोध स्वरुप कुछ ऐसे नारे लगाए जाते रहें हैं जिससे समाज में विभाजनकारी सन्देश जाता रहा है। इस प्रकार के विरोध और अतीत में घटित कुछ घटनाओं की चर्चा आवश्यक हो जाती है जो इस प्रकार हैं
पिछले कुछ दिन पहले साल 2024 में एक निज़ी संस्थान अशोका यूनिवर्सिटी में कुछ छात्रों द्वारा एक विवादित नारा लगाया गया था। नारे में ब्रह्मण बनिया मुर्दाबाद........कुछ ऐसे शब्दों से पूरा कैंपस गूंज उठा था। हालंकि हालत बेकाबू होने से पहले छात्रों पर नियंत्रण बना लिया गया था।
बता दें की इस तरीके के नारे अक्सर वामपंथी संगठनों द्वारा गढ़े जाते हैं। वामपंथियों का कहना है कि ये नारे समाज में वर्चस्ववाद के खिलाफ लगाए जाते हैं। सदियों से चली आ रही व्यवस्था में कुछ प्रमुख वर्ग हैं जो अपना वर्चस्व समाज में बनाये रखने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ इस तरीके के नारे लगाए जाते हैं। समाज में ऐसे बहुत सारे नारे हैं जो विभिन्न संगठनों द्वारा बनाये और लगाए जाते हैं, जिससे समाज में विभाजन होने का डर बना रहता है।
वहीं दूसरी तरफ विरोधी संगठनों का कहना है कि इस तरीके के नारे, समाज में कुछ चिन्हित जातियों के प्रति ईर्ष्या, द्वेष और नफ़रत फ़ैलाने के लिए कुछ अराजक तत्वों द्वारा बनाये जाते हैं। इससे उनको चुनावी लाभ होता है।
बता दें कि साल 1990 में मंडल कमीशन लागू हुआ। इससे सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई। इससे समाज में अगड़ी जातियों में विरोध की लहर चल पड़ी। इसके पश्चात् पूरे भारत में अगड़ी जाति से आने वाले लोगों ने विरोध किया। हालांकि इस आरक्षण की व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट ने वैध ठहराया। इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (Indra Sawhney Vs Union of India & Others 1992) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत तक निर्धारित कर दिया। वहीं अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर और नॉन -क्रीमी लेयर (Creamy Layer and Non-Creamy Layer) की व्यवस्था का आदेश दिया गया। इसके माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि आर्थिक रूप से संपन्न अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए।
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बता दें कि साल 1990 में मंडल कमीशन लागू करने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को हिंसक आंदोलन का सामना करना पड़ा था। समाज में विभाजन, सामाजिक-राजनीतिक विरोध बहुत गहरा होता चला गया। उसी दौरान भाजपा (BJP) के लालकृष्ण अडवाणी की रथयात्रा के दौरान समस्तीपुर (बिहार) में गिरफ़्तारी होने के पश्चात भाजपा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। इस वजह से विश्वनाथ प्रताप सरकार अल्पमत में आ गई और सरकार गिर गई।
इस (मंडल विरोधी आंदोलन) आंदोलन में बहुत सारे छात्रों ने विरोध करते हुए आत्मदाह का भी प्रयास किया और कुछ की बाद में जान भी चली गई। राजीव गोस्वामी नामक छात्र,जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कालेज का छत्र था, ने 19 सितम्बर 1990 को आत्मदाह करने का प्रयास किया था। लगभग 70 प्रतिशत शरीर का हिस्सा उस समय आग में झुलस गया था। इसके बाद अन्य छात्रों ने भी आत्मदाह का प्रयास किया। इन सारी घटनाओं से समाज में विभाजन की खाई बढ़ती जा रही थी। एक वर्ग दूसरे वर्ग को संदेह भरी नज़रों से देखने लगा था परन्तु धीरे-धीरे ही सही ये आग शांत हुई।
यूजीसी (UGC) के नए नियम आने के बाद जगह-जगह विरोध बढ़ने लगा था। कहीं -कहीं से उग्र आंदोलन की चेतावनी भी आने लगी थी। छात्र संगठनों और अन्य सवर्ण समाज के संगठन, जैसे करणी सेना ने आंदोलन को उग्र करने की चेतावनी देते हुए यूजीसी (UGC) के नए नियम को वापस करने की मांग की थी। हांलाकि सन 1990 के मंडल विरोधी जैसा कोई दूसरा आंदोलन हो इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस नए नियम पर रोक लगा दी है। फिलहाल 2012 के यूजीसी दिशानिर्देश ही प्रभावी रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा कि ये नियम प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि नियमों की भाषा साफ नहीं है, इसलिए विशेषज्ञों की जरूरत है जो इसे स्पष्ट करें. कोर्ट ने आगे कहा कि देश को जातिविहीन समाज की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन साथ ही जिन लोगों पर वास्तविक रूप से भेदभाव का असर पड़ता है, उनके संरक्षण के लिए प्रभावी तंत्र भी होना चाहिए.
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