

भारतीय राजनीति (Indian Politics) में सत्ता का खेल जितना चमकदार दिखता है, उतना ही बेरहम भी होता है। कई ऐसे नेता रहे जिन्होंने कभी प्रधानमंत्री बनने के सपने देखे, खुद को राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा चेहरा माना, लेकिन वक्त ऐसा बदला कि वे अपनी ही राज्य की सत्ता नहीं बचा पाए। आज हालात ये हैं कि जिन नेताओं को कभी देश की राजनीति का “किंगमेकर” (Kingmaker) कहा जाता था, वे खुद राजनीतिक जमीन तलाशते नजर आ रहे हैं। इन नेताओं की गिरती लोकप्रियता और सत्ता से बाहर होने पर सिर्फ उनकी विरोधी पार्टियां ही नहीं, बल्कि BJP और कांग्रेस (BJP And Congress) जैसी राष्ट्रीय पार्टियां भी राहत महसूस कर रही हैं। क्योंकि ये वही चेहरे थे जो कभी केंद्र की राजनीति में दोनों दलों के लिए चुनौती बनते जा रहे थे। आइए जानते हैं उन 4 बड़े नेताओं के बारे में, जिनकी राजनीति कभी चरम पर थी, लेकिन आज उनकी कुर्सी और ताकत दोनों छिनती नजर आ रही हैं।
ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) कभी भारतीय राजनीति की सबसे कद्दावर और जुझारू नेताओं में गिनी जाती थीं। उनके राजनीतिक करियर का गोल्डन पीरियड (Peak) साल 2011 से 2021 के बीच रहा। खासकर 2021 के विधानसभा चुनाव (2021 Assembly Election) में जब उन्होंने अकेले दम पर बीजेपी के चक्रव्यूह को ध्वस्त किया, तब वे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद (PM) की सबसे मजबूत दावेदार बनकर उभरीं।
लेकिन राजनीति का ऊँट कब किस करवट बैठ जाए, कहा नहीं जा सकता। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों, शिक्षक भर्ती घोटाले और लगातार हुई हिंसा ने उनकी छवि को पूरी तरह मटियामेट कर दिया। नतीजा यह हुआ कि 2026 के विधानसभा चुनावों (2026 Assembly Elections) में जनता ने उनकी पार्टी को सिरे से नकार दिया। कल तक जो नेता देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रही थीं, आज उनके हाथ से मुख्यमंत्री (CM) की कुर्सी भी छिन चुकी है। सत्ता से बेदखल होने के बाद, अब वे राजनीति की मुख्यधारा से दूर कलकत्ता हाई कोर्ट में एक बार फिर से वकालत (Practice) करने को मजबूर हैं। उनका यह पतन भारतीय राजनीति के सबसे बड़े उलटफेरों में से एक है।
अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) ने जब अन्ना आंदोलन (2011) के बाद साल 2012 में आम आदमी पार्टी (AAP) बनाई, तो देश को लगा कि राजनीति में एक नई 'ईमानदार' सुबह हुई है। 2015 और 2020 के दिल्ली चुनावों (2015 And 2020 Delhi Elections) में प्रचंड बहुमत पाकर वे अपने करियर के शिखर पर थे। मुफ्त बिजली-पानी और 'दिल्ली मॉडल' के दम पर उन्हें भविष्य का पीएम उम्मीदवार तक देखा जाने लगा।
लेकिन, सत्ता के गलियारों में एंट्री के साथ ही विवादों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, जिसने उनकी साख हिला दी। 2022-23 में सामने आया 'दिल्ली शराब नीति घोटाला' ('Delhi liquor policy scam') उनके राजनीतिक करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इस मामले में उनके करीबी मनीष सिसोदिया और संजय सिंह जेल गए, और फिर ईडी (ED) की कार्रवाई के बाद खुद केजरीवाल को भी सलाखों के पीछे जाना पड़ा। घोटालों के आरोपों और जेल-बेल के इस लंबे ड्रामे ने उनके 'कट्टर ईमानदारी' के नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इसके बाद मचे सियासी घमासान और कानूनी पेचों के चलते आखिरकार उनके हाथ से मुख्यमंत्री (CM) की कुर्सी भी चली गई। जो नेता कभी पीएम बनने की रेस में दौड़ रहा था, आज वह अपनी खोई राजनीतिक जमीन और साख बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। उनकी इसी बर्बादी पर बीजेपी जहां भ्रष्टाचार मुक्त भारत के दावे ठोक रही है, वहीं कांग्रेस दिल्ली-पंजाब में अपना पुराना खोया जनाधार वापस पाने की उम्मीद में जश्न मना रही है।
के. चंद्रशेखर राव (KCR) कभी तेलंगाना की राजनीति के एकछत्र सम्राट माने जाते थे। साल 2001 में तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) के गठन और लंबे आंदोलन के बाद, जब 2014 में अलग राज्य बना, तो वे तेलंगाना के पहले मुख्यमंत्री बने। 2018 के विधानसभा चुनाव (2018 Assembly Elections) में दोबारा प्रचंड जीत हासिल कर वे अपने राजनीतिक करियर के चरम (Peak) पर थे। इस सफलता के नशे में उन्होंने राष्ट्रीय नेता और भावी पीएम बनने का सपना देखना शुरू किया और 2022 में अपनी पार्टी का नाम बदलकर 'भारत राष्ट्र समिति' (BRS) कर दिया।
लेकिन, राष्ट्रीय स्तर पर पंख फैलाने की इस महत्वाकांक्षा के बीच वे अपने ही घर में घिर गए। उनके शासनकाल में परिवारवाद (बेटे केटीआर और बेटी कविता का बढ़ता दखल) चरम पर पहुंच गया। 2023 में उनकी बेटी के. कविता का नाम दिल्ली शराब नीति घोटाले में आया, जिसके बाद उनकी छवि पर गहरा दाग लगा। राज्य में बेरोजगारी, कालेश्वरम लिफ्ट सिंचाई परियोजना में भ्रष्टाचार के आरोप और जनता से बढ़ती दूरी उनके लिए काल बन गई। नतीजतन, दिसंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में जनता ने उन्हें बुरी तरह नकार दिया और उनके हाथ से मुख्यमंत्री की कुर्सी छिन गई। कांग्रेस ने राज्य में सरकार बनाई और बीजेपी ने भी उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया। पीएम बनने की चाह में निकले KCR आज अपने ही गढ़ में वजूद बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, और उनकी इसी बर्बादी पर कांग्रेस और बीजेपी दोनों दक्षिण में अपना फायदा देखकर जश्न मना रही हैं।
उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) को बालासाहेब ठाकरे की विरासत के कारण शिवसेना की कमान विरासत में मिली। उनके राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा मोड़ साल 2019 में आया। मुख्यमंत्री की कुर्सी की महत्वाकांक्षा में उन्होंने दशकों पुराने प्राकृतिक सहयोगी बीजेपी का हाथ झटक दिया और विपरीत विचारधारा वाली कांग्रेस-NCP के साथ मिलकर 'महाविकास अघाड़ी' (MVA) सरकार बना ली। वे सूबे के मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन यहीं से उनके राजनीतिक पतन की पटकथा लिखी जाने लगी।
मुख्यमंत्री बनने के बाद उद्धव ठाकरे पर अपनों को नजरअंदाज करने और मातोश्री (अपने बंगले) से बाहर न निकलने के आरोप लगे। साल 2020 में पालघर में साधुओं की लिंचिंग का मुद्दा हो या सुशांत सिंह राजपूत केस में सचिन वाज़े जैसे दागी पुलिस अफसर का मामला, उनकी सरकार लगातार विवादों और 'काले चिट्ठे' के कारण घिरती चली गई। कट्टर हिंदुत्व की छवि वाली शिवसेना अब तुष्टिकरण के आरोपों से जूझ रही थी।
नतीजतन, पार्टी के भीतर असंतोष चरम पर पहुंच गया। जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने बगावत कर दी और शिवसेना का एक बहुत बड़ा धड़ा (विधायकों और सांसदों की भारी संख्या) लेकर वे अलग हो गए। अपनों के इस तख्तापलट के कारण उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। न सिर्फ सीएम की कुर्सी गई, बल्कि चुनाव आयोग ने असली शिवसेना और 'तीर-कमान' का चुनाव चिन्ह भी शिंदे गुट को सौंप दिया। जो नेता राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का बड़ा चेहरा बनने निकले थे, आज वे अपने पिता द्वारा खड़ी की गई मूल पार्टी और पहचान खोकर हाशिए पर आ चुके हैं।
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इन चारों नेताओं में एक बात समान थी ये सभी क्षेत्रीय राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे थे। किसी ने खुद को PM पद का दावेदार बताया, तो किसी ने तीसरे मोर्चे की राजनीति को मजबूत करने का प्रयास किया।
लेकिन जैसे-जैसे इन नेताओं की राजनीतिक ताकत कमजोर हुई, BJP और कांग्रेस दोनों को फायदा दिखने लगा। BJP को क्षेत्रीय दलों की चुनौती कम होती नजर आई, जबकि कांग्रेस को विपक्ष की राजनीति में अपनी खोई हुई जगह वापस मिलने की उम्मीद जगी। यही कारण है कि इन नेताओं की गिरती राजनीतिक स्थिति पर दोनों राष्ट्रीय दल अपने-अपने तरीके से राहत और खुशी महसूस कर रहे हैं।
राजनीति में समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जो नेता कभी सत्ता के शिखर पर होते हैं, वे अचानक संघर्ष में भी आ सकते हैं। ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, KCR और उद्धव ठाकरे ये सभी नेता कभी राष्ट्रीय राजनीति के बड़े चेहरे माने जाते थे, लेकिन आज उनकी राजनीतिक जमीन कमजोर होती दिखाई दे रही है। आने वाले चुनाव तय करेंगे कि ये नेता फिर से वापसी करेंगे या भारतीय राजनीति में उनकी चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ जाएगी। [SP]