

भारत में कई राजनीतिक घराने पीढ़ी दर पीढ़ी राजनीति में सक्रिय हैं, जैसे उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह का परिवार, महाराष्ट्र में पवार और ठाकरे परिवार, दक्षिण भारत में डीएमके (करुणानिधि-एम.के. स्टालिन) और रेड्डी परिवार।
ये परिवार न केवल पार्टी नेतृत्व संभालते हैं बल्कि अपने पुत्र-पोतों और रिश्तेदारों को भी राजनीतिक पदों में उतारते हैं। हाल ही में बिहार में नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के राजनीति में आने की चर्चा और उपेन्द्र कुशवाहा के बेटे का अचानक मंत्री बनना, इसी प्रवृत्ति का उदाहरण हैं।
राजनीतिक विरासत के कारण नई पीढ़ी को अनुभव और नेटवर्क मिलता है, जिससे वे जल्दी सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। परिवारवाद लोकतंत्र के मूल्यों को कमजोर करता है। जनता के पास विकल्प कम हो जाते हैं, चुनाव परिवारों के मुद्दों तक सीमित रह जाते हैं, और राजनीतिक प्रतिनिधि अक्सर समस्याओं के समाधान की बजाय सत्ता प्रदर्शन पर ध्यान देते हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की राजनीति में प्रवेश को लेकर चर्चा तेज हो गई है। जनता दल (यूनाइटेड) में नीतीश कुमार के बेहद करीबी संजय झा ने कहा है कि निशांत कुमार अगर राजनीति में आते हैं तो उनका स्वागत है। इसी बीच परिवारवाद की राजनीति का मुद्दा फिर से गर्म हो गया है।
भारत में कुछ ऐसे राजनीतिक घराने हैं जिनकी धाक भारतीय राजनीति में अभी भी जमी हुई है। भारत की राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा हर चुनाव में आता है। कुछ राजनीतिक घराने ऐसे हैं जो कई पीढ़ियों से राजनीति में बने हुए हैं। लोकतंत्र के लिए परिवारवाद हानिकारक है या फिर लाभदायक इसकी चर्चा अंत में की जाएगी, पहले कुछ राजनीतिक घरानों की चर्चा की जा रही है।
स्टालिन परिवार
दक्षिण भारत की राजनीति में परिवारवाद पूरी तरीके से हावी है। तमिलनाडु में डीएमके (DMK) के नेता एम के स्टालिन जो फिलहाल मुख्यमंत्री बने हुए हैं, उनके पिता करुणानिधि, भारतीय राजनीति में एक अलग धुरी थे। दक्षिण भारत के राजनीति की चर्चा जब भी होती है, करुणानिधि के राजनीतिक दांव पेंच की चर्चा जरूर याद किया जाता है।
करुणानिधि के पुत्र स्टालिन हैं, जो फिलहाल तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने हुए हैं। स्टालिन के पुत्र उदयनिधि स्टालिन हैं, जो तमिलनाडु की राजनीति में काफी सक्रिय हैं। एम के स्टालिन की बहन कनिमोझी हैं, जो राज्यसभा सांसद हैं।
पिछले साल 2025 में कनिमोझी का एक बयान काफी वायरल हुआ था जब उन्होंने कहा कि भारत का राष्ट्रीय भाषा यूनिटी इन डाइवर्सिटी (Unitiy in Diversity) है। यह बात उन्होंने तब कही थी जब स्पेन की मीडिया के तरफ से यह सवाल पूछा गया था कि भारत का राष्ट्रीय भाषा क्या है।
पवार का परिवार
महाराष्ट्र के शरद पवार ने अपनी राजनीतिक सफर को कांग्रेस के साथ शुरू किया था। शरद पवार पहली बार बारामती से महाराष्ट्र विधानसभा में पहुंचे। कुछ समय बाद साल 1978 में कांग्रेस से अलग हुए और मात्र 38 साल की उम्र में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 1986 में फिर से कांग्रेस में शामिल हुए।
साल 1999 में सोनिया गांधी से मतभेद होने पर कांग्रेस से अलग होकर, अपनी पार्टी राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी (NCP) का गठन किए। शरद पवार ने अपने परिवार मे भतीजे अजित पवार, बेटी सुप्रिया सुले को राजनीति में उतारा।
सुप्रिया सुले फिलहाल लोकसभा सांसद (बारामती) हैं, वहीं अजित पवार की मृत्यु, डिप्टी सीएम रहते हुए हवाई जहाज दुर्घटना में साल 2026 में हो गई। अजित पवार की पत्नी फिलहाल महाराष्ट्र में डिप्टी सीएम हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में लगभग 50 साल से पवार परिवार जमा हुआ है।
ठाकरे परिवार
महाराष्ट्र में शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे की एक समय तूती बोलती थी। कट्टर हिन्दुत्व और मराठी अस्मिता को लेकर बाला साहब ठाकरे ने महाराष्ट्र की राजनीति में पैर जमाने की पूरी कोशिश की।
उद्धव ठाकरे, बाला साहब ठाकरे के पुत्र हैं, जो उनके राजनीतिक विरासत को संभालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन एकनाथ शिंदे ने पार्टी को अपने हाथ में ले लिया। फिलहाल उद्धव परिवार के हाथ से शिवसेना निकल चुकी है।
वहीं उद्धव ठाकरे के पुत्र आदित्य ठाकरे हैं, जो ठाकरे परिवार की तीसरी पीढ़ी के रूप में महाराष्ट्र की राजनीति में अपने बाप-दादा की विरासत को संभालने का प्रयास कर रहे हैं। साथ में उद्धव ठाकरे के चचेरे भाई राज ठाकरे भी हैं, जो खुद को बाला साहब ठाकरे का वारिस बताते हैं। राज ठाकरे के बेटे अमित ठाकरे हैं, जिनके भविष्य को संवारने में राज ठाकरे लगे हुए हैं लेकिन चुनावी सफलता अभी तक हाथ नहीं आई है।
केसीआर परिवार
इसी प्रकार दक्षिण भारत में कुछ अन्य राजनीतिक घराने हैं, जैसे तेलंगाना में केसीआर का परिवार सक्रिय है। केसीआर के बेटे के.टी. रामाराव हैं, जो उनकी विरासत को संभालने का प्रयास कर रहे हैं हालांकि उनकी पार्टी BRS, साल 2024 के चुनाव में बुरी तरीके से हार गई।
रेड्डी परिवार
आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी हैं, उनके पिता आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी थे। वर्ष 2004 से 2009 तक अविभाजित आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की मृत्यु के पश्चात, उनके बेटे जगनमोहन रेड्डी ने उनकी राजनीतिक विरासत को संभाली, साथ में जगनमोहन की बहन वाईएस शर्मिला भी आंध्र प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हैं। रेड्डी परिवार का आंध्रप्रदेश की राजनीति में बोलबाला है।
समाजवादी पार्टी का परिवारवाद
उत्तर प्रदेश, भारत में लोकसभा के लिहाज से (80 लोकसभा सीट) सबसे बड़ा प्रदेश है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव परिवार का भी प्रदेश की राजनीति में काफी पकड़ मानी जाती है। मुलायम सिंह यादव के बाद उनके पुत्र अखिलेश यादव उनकी राजनीतिक विरासत को संभालते हुए साल 2012 में पहली बार मुख्यमंत्री बने। 2012-2017 के बीच अखिलेश यादव के परिवार ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में काफी हलचल मचा रखा था।
एक तरफ जहां भाजपा सहित अन्य विपक्षी पार्टियों द्वारा समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव सहित उनके परिवार पर यह आरोप लगाया जाता है कि उनके परिवार के राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से सरकार में भ्रष्टाचार हुआ, तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव का कहना है कि उन्होंने प्रदेश के विकास के लिए पुलिस व्यवस्था को मजबूत बनाते हुए डायल 100 की व्यवस्था शुरू की। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे बनाया। लखनऊ में लोहिया पार्क और गोमती रिवर फ्रंट, इत्यादि काम गिनाते हैं।
अखिलेश यादव की बेटी अदिति यादव को पिछले लोकसभा चुनाव 2024 में प्रचार करते हुए देखा गया था। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा होती है कि अदिति को भी परिवार की विरासत संभालने के लिए भविष्य में उतारा जा सकता है।
अखिलेश यादव के भाई धर्मेन्द्र यादव, आजमगढ़ से सांसद है। वहीं उनके चाचा शिवपाल यादव के पुत्र आदित्य यादव बदायूं से सांसद हैं। राज्यसभा सांसद प्रोफेसर रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव, फिरोजाबाद से सांसद हैं। अखिलेश यादव की धर्मपत्नी डिंपल यादव, मैनपुरी से लोकसभा सांसद हैं। वहीं पूरे मैनपुरी-इटावा के क्षेत्र में यादव परिवार का काफी दबदबा है।
भाजपा का परिवारवाद
भाजपा के राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को प्रदेश की राजनीति में उतार दिया गया है, जो कि फिलहाल भाजपा से विधायक हैं।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह ने भाजपा के टिकट पर साल 2014 में एटा से लोकसभा का चुनाव जीता। राजवीर सिंह के बेटे संदीप सिंह उत्तर प्रदेश विधानसभा में अतरौली से साल 2017 से अब तक विधायक बने हुए हैं। भाजपा के कल्याण सिंह की तीसरी पीढ़ी उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगातार बनी हुई है।
अन्य पार्टियों की बात की जाए तो क्षेत्रीय स्तर पर ओमप्रकाश राजभर के दो बेटे उनकी विरासत को संभाल रहे हैं। एक बेटा, अरविन्द राजभर को विधानसभा चुनाव 2022 में वाराणसी के शिवपुर और लोकसभा चुनाव 2024 में मऊ के घोसी लोकसभा से प्रत्याशी बनाया गया, लेकिन सफलता हाथ नहीं आ सकी।
यह भी पढ़ें:केरल में जन्मे जोशी पोटाकल बनेंगे जर्मनी के बिशप, चर्च सुधार की मांग के बीच बड़ा फैसला
बिहार की राजनीति में परिवारवाद का बोलबाला है। लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी के अलावा अन्य पार्टियां हैं, जो परिवरवाद को बढ़ावा दे रही हैं। स्व. रामविलस पासवान के भाई पारसनाथ फिलहाल उनकी पार्टी को संभाल रहे हैं।
रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान भाजपा के साथ गठबंधन में हैं और केंद्रीय मंत्री हैं। इसके अलावा चिराग पासवान के जीजा भी बिहार की राजनीति में सक्रिय हैं।
वर्तमान में राज्यसभा का टिकट कंफर्म होने के बाद उपेन्द्र कुशवाहा ने भाजपा के अमित शाह को धन्यवाद दिया है। उनके बेटे साल 2025 में तब चर्चा में आए थे, जब उनको नीतीश कुमार के साथ बिहार में मंत्री पद की शपथ अचानक दिलाई गई। जब उनसे पूछा गया कि यह कैसे हुआ, तो उनका जवाब था कि यह बात उनको पता नहीं था और उनको मंत्री बनाया दिया गया। शायद पिता उपेन्द्र कुशवाहा की वजह से बेटे को अचानक मंत्री बना दिया गया।
अब नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को भी बिहार की राजनीति में उतारने की बात की जा रही है।
राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों में, कांग्रेस पार्टी का परिवारवाद जग जाहिर है। वहीं भाजपा में भी परिवारवाद ने अच्छी खासी जगह बना ली है।
परिवारवाद भारतीय राजनीति (Indian Politics) की सच्चाई है। जब लोकतंत्र की बात की जाती है तो ऐसा माना जाता है कि इस व्यवस्था में विकल्पों की भरमार होती है। लेकिन लोकतंत्र में जब परिवारवाद हावी होने लगता है, तो फिर जनता के पास चुनने के विकल्पों का अभाव होने लगता है।
जनता के मुद्दों के बजाय राजनीतिक घरानों के मुद्दों पर चुनाव होने लगते हैं जिससे लोकतान्त्रिक राजनीतिक मूल्यों का पतन होने लगता है और भारतीय गणराज्य की परिभाषा ही पलट जाती है।
वैसे गणराज्य का तात्पर्य तो यह होता है कि सुप्रीम नेता (President of India) जनता द्वारा चुना जाता है, लेकिन जब राजनीति में परिवरवाद हावी हो जाता है, तो फिर जनता के पास विकल्पों का अभाव हो जाता है और मजबूरन चंद घरानों के बीच से एक को चुनना पड़ता है।
जब ऐसे प्रतिनिधि सदन में पहुंचते हैं, तो सदन समस्या समाधान केंद्र न होकर सांसदों, विधायकों के फैशन प्रदर्शनी का केंद्र बन जाता है, जैसा कि आज के समय में देखने को मिलता है।
ये परिवारवाद का असर है कि भारतीय राजनीति से लोकतान्त्रिक मूल्यों (Democratic Values) का पतन हो रहा है और संस्थाएं जकड़ गई हैं। ऐसे में भारत को एक क्रांति की जरूरत पड़ती है, जो ऐसे समस्याओं में जकड़ी भारत की व्यवस्था को निकाल सके।