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हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के एक बयान से बवाल मच गया था, जिसमें उन्होंने देश के बेरोजगार युवाओं को कॉकरोच बोला था। कोर्ट की निष्पक्षता पर बहुत समय से लगातार सवाल किए जाते रहे हैं। इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने जजों की निष्पक्षता को लेकर अपना विचार सार्वजनिक किया है। उनके इस बात से कोर्ट की निष्पक्षता फिर से सवालों के घेरे में आ गई है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने बताया है कि अमूमन सभी केसों में वो निष्पक्ष रहने का प्रयास करते थे और निष्पक्ष फैसला भी देते थे, लेकिन एक बार ऐसा अवसर आया जब काटजू स्वयं को पक्षपाती होने से नहीं रोक पाए। यह कहानी उस समय की है जब मार्कंडेय काटजू इलाहाबाद हाई कोर्ट में थे। उन्होंने बताया कि साल 1995 में एक केस की सुनवाई हो रही थी। उनके सामने एक सीनियर वकील केस की पैरवी करने के लिए आए। जज काटजू ने वकील से उनका नाम पूछा। वकील ने अपना नाम एम.एच. बेग बताया।
दिलचस्प बात यह है कि बहस शुरू होने से पहले जज काटजू ने वकील से पूछा, "मिस्टर बेग, क्या आप कश्मीर के एडवोकेट जनरल थे?" सामने से जवाब आया, "हाँ, माई लॉर्ड।" इसके बाद केस के मामले में बहस शुरू हुई। थोड़ी देर बाद जब बहस समाप्त हुई, तो मार्कंडेय काटजू ने अपना फैसला सीनियर वकील एम.एच. बेग के पक्ष में सुना दिया।
पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने अपने X (ट्विटर) अकाउंट पर यह बात साझा करते हुए बताया है कि वकील बेग के बारे में उनके दोस्त अल्ताफ अहमद ने पहले ही बता दिया था। काटजू आगे लिखते हैं कि मेरा कश्मीरी भाई मेरे सामने खड़ा था, मैं उसके पक्ष में फैसला कैसे न सुनाता? उन्होंने आगे लिखा कि कश्मीरी लोगों से उनका भावनात्मक जुड़ाव है और उनके मामले में पक्षपात करने में उन्हें किसी भी प्रकार का परहेज नहीं है। उन्होंने कहा, "मैं भी एक इंसान हूँ, मुझमें भी इंसानी कमज़ोरियाँ हैं, और मैं अपने पुरखों की धरती के लोगों के पक्ष में पक्षपाती हूँ।”
उनके इस पोस्ट से न्यायिक निष्पक्षता पर बहस फिर से होने लगी है। जानकारों का कहना है कि इस तरीके से भावनाओं में आकर किसी के पक्ष में फैसला नहीं सुनाया जा सकता। कोर्ट में फैसला हमेशा तथ्य और तर्क के आधार पर ही सुनाया जाता है।
मार्कंडेय काटजू का जन्म 20 सितंबर 1946 को लखनऊ में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके दादा डॉ. कैलाश नाथ काटजू एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनका कांग्रेस में बहुत अच्छा प्रभाव था। डॉ. कैलाश नाथ काटजू बाद में मध्य प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री बने। उनका पहला कार्यकाल 31 जनवरी 1957 से 14 मार्च 1957 तक और दूसरा कार्यकाल 14 मार्च 1957 से 11 मार्च 1962 तक था।
मार्कंडेय काटजू के पिता एस.एन. काटजू भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। इसी पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हुए मार्कंडेय काटजू ने अपनी कानून की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय (University of Allahabad) से पूरी की और अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत इलाहाबाद उच्च न्यायालय से की। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में जज (2006-11) भी रह चुके हैं।
मार्कंडेय काटजू ने अपने जीवन में बहुत सारे ऐसे बयान दिए हैं, जो आज के समय में बहुत विवादित माने जाते हैं। उन्होंने कई बार यह बात कही है कि भारतीय लोकतंत्र में उनका भरोसा नहीं है। जजों के बारे में टिप्पणी करते हुए उन्होंने यहाँ तक कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के बहुत सारे जज भ्रष्ट हैं, इसलिए न्याय होने में देरी होती है।
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