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हाल ही में नीट (NEET) परीक्षा पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफे की मांग लगातार तेज होती जा रही है। हालांकि, धर्मेन्द्र प्रधान ने अभी तक ऐसे किसी भी इस्तीफे की जानकारी नहीं दी है। पेपर लीक की यह समस्या आज की नहीं बल्कि काफी पुरानी है, लेकिन इस समय बड़ा सवाल यह उठता है कि कोई मंत्री कितनी ईमानदारी से अपनी गलती को स्वीकार करता है और उसके प्रति अपनी नैतिक जवाबदेही सुनिश्चित करता है। ऐसे संवेदनशील मामलों में आइए विस्तार से समझते हैं कि एनडीए (NDA) और यूपीए (UPA) कार्यकाल के मंत्रियों के बीच कितना अंतर था।
देश में साल 2004 से लेकर 2014 तक कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। इन 10 सालों के दौरान अलग-अलग मंत्रालयों के मंत्रियों पर समय-समय पर अलग-अलग तरीके से गंभीर आरोप लगाए गए। जब भी सरकार के फैसलों से नाराज होकर जनता और विपक्ष ने मंत्रियों से इस्तीफे मांगे, तो कई मंत्रियों ने अपनी जवाबदेही तय करते हुए अपना-अपना इस्तीफा दे दिया।
विशेषकर साल 2009 से 2014 के बीच दूसरी यूपीए सरकार के कार्यकाल में अधिक मात्रा में मंत्रियों से इस्तीफे मांगे गए। जब 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, एयरसेल-मैक्सिस केस, आईपीएल (IPL) विवाद, भ्रष्टाचार के अन्य गंभीर आरोप और कोयला घोटाला (कोलगेट) जैसे बड़े घोटालों के नाम देश के सामने आए, तो संबंधित मंत्रियों से इस्तीफे की मांग बेहद तेज हो गई थी। इसके बाद बहुत सारे मंत्रियों ने अपने पदों से इस्तीफा भी दे दिया।
उदाहरण के रूप में, तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा (14 नवंबर 2010), दयानिधि मारन (जुलाई 2011), विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर (अप्रैल 2010), सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्री वीरभद्र सिंह (2011), रेल मंत्री पवन कुमार बंसल और कानून मंत्री अश्विनी कुमार जैसे बड़े मंत्रियों ने विपरीत परिस्थितियां और समय आने पर अपने पदों से इस्तीफा दिया है।
इसके बाद साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के भीतर एनडीए सरकार बनी। दरअसल, साल 2014 के लोकसभा चुनाव में अकेले बीजेपी को 282 सीटें मिली थीं, जो बीजेपी के लिए एक ऐतिहासिक बहुमत था। सरकार बनने के कुछ समय बाद लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करते हुए तमाम मंत्रियों से विभिन्न मुद्दों पर जवाबदेही तय करने के लिए कहा गया, क्योंकि देश में बहुत सारी गड़बड़ियाँ सामने आने लगी थीं।
उदाहरण के तौर पर, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी (HCU) के शोधार्थी रोहित वेमुला की दुखद मौत पर तत्कालीन एमएचआरडी (MHRD) मंत्री स्मृति ईरानी से सीधा जवाब मांगा गया था और मंत्री की असफलता पर विपक्ष ने उनके इस्तीफे की पुरजोर मांग की थी, लेकिन स्मृति ईरानी ने अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया।
इसी तरह, 3 अक्टूबर 2021 को लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा (टेनी) की कार से कुचलकर 4 किसानों और 1 पत्रकार सहित कुल 8 लोगों की मौत हो गई थी। इस बड़ी घटना के बाद मंत्री से इस्तीफे की मांग काफी तेज हुई, तो सरकार खुद आरोपी मंत्री के बचाव में उतर आई और मंत्री ने अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया।
इसके अतिरिक्त, पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव जैसे मंत्रियों द्वारा अपने कर्तव्यों का निर्वहन ठीक से न करने के आरोप में विपक्ष द्वारा इस्तीफे की मांग की गई थी, लेकिन इन मंत्रियों ने इस्तीफा नहीं दिया।
सार रूप में देखा जाए तो दोनों कार्यकालों की कार्यशैली में एक बड़ा अंतर स्पष्ट नजर आता है। जहां यूपीए सरकार में मंत्रियों ने लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान और पालन करते हुए विपक्ष द्वारा इस्तीफा मांगे जाने पर पद छोड़ दिया था, वहीं दूसरी तरफ एनडीए सरकार में ऐसे बहुत कम ही मंत्री देखने को मिले हैं, जिन्होंने किसी बड़ी गड़बड़ी या अपनी असफलता को स्वीकार करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया हो।
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