

पश्चिम बंगाल में मिली हार के बाद ममता बनर्जी की पार्टी नई मुसीबतों से गुजर रही है। ममता बनर्जी की पार्टी TMC के 20 सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। शताब्दी रॉय जैसी महिला नेताओं ने ममता बनर्जी का आभार जताते हुए उनका साथ छोड़ दिया। इस समय ममता बनर्जी अकेली रह गई हैं। लेकिन यह पहला मामला नहीं है, जब ममता बनर्जी अकेली पड़ गई हैं, ममता बनर्जी के जीवन में चार ऐसे मौके आ चुके हैं जब वो राजनीति में अकेली रह गई हैं।
ममता बनर्जी ने अपनी राजनीति की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से की थी। ममता के राजनीति करने का तरीका राजीव गांधी को काफी पसंद था, यही कारण रहा कि राजीव गांधी ने ममता बनर्जी पर भरोसा जताना शुरू कर दिया था। लेकिन राजीव गांधी की असमय मृत्यु ने ममता को अकेला कर दिया। इसके बाद ममता की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला। शीर्ष नेतृत्व से असहमति होने पर ममता ने 'एकला चलो' सिद्धांत के तहत काम करना शुरू कर दिया।
इसके बाद साल 1997 में ममता बनर्जी को कांग्रेस पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। ममता बनर्जी ने किसी दूसरे दल में जाने के बजाय खुद की पार्टी बनाने का फैसला किया। साल 1998 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की और राजनीति के समर में TMC को अपनी सवारी बना लिया। 1 जनवरी 1998 को पार्टी बनाने के बाद ममता का रास्ता आसान नहीं था। इस समय वह बिल्कुल अकेली पड़ गई थीं।
साल 2004 में लोकसभा का चुनाव था। इस चुनाव में ममता बनर्जी बिल्कुल अकेली थीं। कुल लोकसभा सीटों में से ममता बनर्जी को महज 1 सीट पर ही सफलता मिली थी। यह सीट खुद ममता बनर्जी ने जीती थी। कहानी सिर्फ यहीं तक नहीं थी, बल्कि इस चुनाव ने ममता बनर्जी की राजनीति को और भी कठिन बना दिया। हालांकि, लोकसभा में अकेली होने के बावजूद ममता बनर्जी ने यूपीए सरकार को समर्थन दिया था।
साल 2006 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हो रहे थे। इस चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी TMC को करारी हार का सामना करना पड़ा। TMC ने इस चुनाव में कुल 30 सीटों पर ही जीत हासिल की। इस चुनाव के बाद राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा होने लगी थी कि ममता बनर्जी की राजनीति समाप्त हो चुकी है। इस समय भी ममता बनर्जी बिल्कुल अकेली पड़ गई थीं। लेकिन ममता बनर्जी ने हार नहीं मानी। अपने राजनीतिक सफर को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने नई रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया।
साल 2012 में ममता बनर्जी यूपीए सरकार से अलग हो गईं। खुदरा कारोबार में एफडीआई (FDI) और डीजल की बढ़ती कीमतों के विरोध में ममता बनर्जी ने समर्थन वापस लेने का ऐलान किया। ममता बनर्जी को उस समय लगा था कि अन्य पार्टियां भी उनका साथ देंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ममता बनर्जी के समर्थन वापस लेते ही मुलायम सिंह ने अपना समर्थन यूपीए सरकार को दे दिया। इससे सरकार गिरने से बच गई। इस समय भी ममता बनर्जी बिल्कुल अलग-थलग पड़ गई थीं।
वर्तमान में पार्टी के भीतर लगी इस बड़ी सेंध और सांसदों के पाला बदलने को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी के लिए यह दौर अत्यंत परीक्षापूर्ण है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पार्टी के भीतर असंतोष की यह लहर हार के बाद अधिक तीव्र हुई है। चुनावी रणनीतिकारों का कहना है कि पूर्व के तीन बड़े संकटों (1998, 2004, और 2012) की तरह इस बार भी ममता बनर्जी को अपनी सांगठनिक संरचना में भारी फेरबदल करना होगा। पश्चिम बंगाल के इस नए सियासी घटनाक्रम ने न केवल राज्य सरकार के स्थायित्व पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि विपक्षी खेमे को भी पूरी तरह से सक्रिय कर दिया है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अपने 'एकला चलो' के पुराने ट्रैक रिकॉर्ड को दोहराते हुए ममता बनर्जी सांसदों की बगावत से कैसे पार पाती हैं।
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