

मनोज मुकुंद नरवणे ने इस पूरे मामले पर अपनी स्थिति साफ कर दी है। उन्होंने आईएएनएस के साथ बातचीत में कहा कि एक लेखक के रूप में उन्होंने अपनी किताब की फाइनल कॉपी खुद नहीं देखी है। ऐसे में जो कॉपी सार्वजनिक रूप से सामने आई, उसकी प्रमाणिकता पर वे कुछ नहीं कह सकते।
मनोज मुकुंद नरवणे ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "वह कौन सी किताब थी, कहां से आई, इसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि प्रकाशक की ओर से पहले ही साफ किया जा चुका है कि इस किताब की कोई आधिकारिक कॉपी बाजार या सार्वजनिक सर्कुलेशन में मौजूद नहीं है।"
विवाद की जड़ में किताब की एक लाइन 'जो उचित समझो वो करो' भी रही, जिस पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई थी। इस पर नरवणे ने कहा कि किताब में कहीं भी प्रधानमंत्री का नाम नहीं लिया गया है।
उन्होंने कहा कि फौज को ऑपरेशन के दौरान पूरी छूट दी जाती है। इसका मतलब यह होता है कि सरकार को सेना पर पूरा भरोसा है। इस बात को उसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। लेकिन अगर कोई हर चीज को गलत तरीके से देखना चाहता है, जैसे कि (ग्लास आधा खाली है या आधा भरा), तो फिर मैं क्या ही बोलूं। (MK)
(यह रिपोर्ट IANS न्यूज़ एजेंसी से स्वचालित रूप से ली गई है। न्यूज़ग्राम इस कंटेंट की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता।)