66 मौतों की गुनहगार दवा को सरकार ने दी 'क्लीन चिट'? नाम बदलकर भारत में जहर परोसने की तैयारी

हालिया जानकारी और द न्यूज मिनट के खुलासे के अनुसार, मेडेन फार्मास्यूटिकल्स ने साल 2025 में गुपचुप तरीके से अपना नाम बदलकर क्योरक्लिप फार्मास्यूटिकल्स कर लिया है।
हालिया जानकारी और द न्यूज मिनट के खुलासे के अनुसार, मेडेन फार्मास्यूटिकल्स ने साल 2025 में गुपचुप तरीके से अपना नाम बदलकर क्योरक्लिप फार्मास्यूटिकल्स कर लिया है।
कहते हैं कि यादें धुंधली पड़ जाती हैं, लेकिन घाव कभी नहीं भरते। साल 2022 में अफ्रीकी देश गाम्बिया से आई उन खबरों ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था, जहां भारत में बनी कफ सिरप पीने से 66 मासूम बच्चों की किडनी फेल होने के कारण मौत हो गई थी। AI Generated
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कहते हैं कि यादें धुंधली पड़ जाती हैं, लेकिन घाव कभी नहीं भरते। साल 2022 में अफ्रीकी देश गाम्बिया से आई उन खबरों ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था, जहां भारत में बनी कफ सिरप पीने से 66 मासूम बच्चों की किडनी फेल होने के कारण मौत हो गई थी। उस त्रासदी के केंद्र में थी हरियाणा की मेडेन फार्मास्यूटिकल्स (Maiden Pharmaceuticals)। आज दो साल बाद, यह कंपनी एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन किसी सुधार के लिए नहीं, बल्कि अपनी पहचान बदलकर चुपचाप बाजार में दोबारा पैर जमाने की कोशिश के लिए।

नाम तो  बदला, पर क्या नीयत बदली?

हालिया जानकारी और द न्यूज मिनट के खुलासे के अनुसार, मेडेन फार्मास्यूटिकल्स (Maiden Pharmaceuticals) ने साल 2025 में गुपचुप तरीके से अपना नाम बदलकर क्योरक्लिप फार्मास्यूटिकल्स (Cureclip Pharmaceuticals) कर लिया है। दिल्ली के नेताजी सुभाष प्लेस स्थित कंपनी का रजिस्टर्ड ऑफिस आज भी वहीं है, लेकिन बाहर से मेडेन फार्मा का नामोनिशान मिटा दिया गया है। वहां अब किकास कॉस्मेटिक्स का बोर्ड लगा है और स्टाफ इस बारे में बात करने से घबराते है। हैरानी की बात यह है कि सोनीपत स्थित जिस फैक्ट्री में वो जहरीली दवाएं बनी थीं, वहां भी अब 'क्योरक्लिप' का बोर्ड टांग दिया गया है। हालांकि, हरियाणा एफडीए (FDA) कमिश्नर का कहना है कि मेडेन का लाइसेंस रद्द हो चुका है और क्योरक्लिप नाम की किसी नई कंपनी को फिलहाल राज्य में कोई नया पंजीकरण नहीं दिया गया है।

अक्टूबर 2022 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने मेडेन फार्मा के कफ और कोल्ड सिरप (Cough and Cold Syrup) के खिलाफ वैश्विक अलर्ट जारी किया था। स्विट्जरलैंड, घाना और फ्रांस की लैबोरेटरीज में जांच के दौरान इन दवाओं में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (diethylene glycol) (DEG) और एथिलीन ग्लाइकॉल (ethylene glycol) (EG) जैसे घातक रसायनों की भारी मात्रा पाई गई थी। ये वही रसायन हैं जो ब्रेक ऑयल या एंटी-फ्रीज के रूप में इस्तेमाल होते हैं और इंसानी किडनी को चंद घंटों में हानिकारक नुक्सान पहुंचा सकते हैं।

भारत की चंडीगढ़ लैब ने इन दवाओं को 'सुरक्षित' बताकर क्लीन चिट दे दी। इसी रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार ने कंपनी का बचाव किया, जबकि गाम्बिया की संसदीय समिति और डॉक्टरों ने चीख-चीख कर कहा कि मौतों का कारण यही दूषित सिरप थे। आज भी गाम्बिया के 19 परिवार कोर्ट में इंसाफ और मुआवजे की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन कंपनी कोर्ट के समन का जवाब तक नहीं दे रही है।

भ्रष्टाचार और प्रभाव का खेल:

मेडेन फार्मा का विवादों से पुराना नाता रहा है। 2013 में वियतनाम ने इसे ब्लैकलिस्ट किया था। बिहार, गुजरात और केरल में भी इसकी दवाएं घटिया पाई गई थीं। 2023 में वकील यशपाल ने गंभीर आरोप लगाया था कि कंपनी ने सैंपल बदलवाने के लिए हरियाणा के ड्रग कंट्रोलर को 5 करोड़ रुपये की रिश्वत दी थी। कंपनी के डायरेक्टर नरेश कुमार गोयल के परिवार के सदस्य कई अन्य फार्मा कंपनियों से भी जुड़े हैं, जिससे यह साफ होता है कि नाम बदलना महज एक कानूनी ढाल तैयार करने की कोशिश है।

भारत में प्रतिबंधित दवाओं का मायाजाल:

मेडेन फार्मा का मामला तो सामने आ गया, लेकिन भारत में ऐसी दर्जनों दवाएं हैं जिन्हें सरकार ने असुरक्षित मानकर प्रतिबंधित (medicines banned in India) कर दिया है, फिर भी वे मेडिकल स्टोरों पर 'कॉम्बिनेशन' या नए नामों के साथ धड़ल्ले से बिक रही हैं।

भारत सरकार ने हाल के वर्षों में 300 से अधिक फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (fixed dose combinations) (FDC) दवाओं पर रोक लगाई है। इनमें से कुछ प्रमुख दवाएं जो आज भी आसानी से मिल जाती हैं, उनमें शामिल हैं:

निमेसुलाइड + पैरासिटामोल (Nimesulide + Paracetamol): दर्द निवारक के रूप में मशहूर यह दवा बच्चों के लिए बेहद खतरनाक है और कई देशों में बैन है, पर भारत में लोग इसे सुमो (Sumo) जैसी ब्रांडिंग के साथ मांगते हैं।

फिनाइलप्रोपेनोलामाइन (PPA): कई कफ सिरप और कोल्ड की दवाओं में पाया जाने वाला यह साल्ट स्ट्रोक का खतरा बढ़ाता है।

विक्टोरिन (Analgin): यह एक शक्तिशाली पेनकिलर है जिसे बोन मैरो को नुकसान पहुंचाने के कारण प्रतिबंधित किया गया है, पर ग्रामीण इलाकों में आज भी यह लाल गोली के नाम से बिकती है।

सिट्रीजिन + फिनाइलफ्राइन (Cetirizine + Phenylephrine): जुकाम के लिए इस्तेमाल होने वाला यह कॉम्बिनेशन भी सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरा है।

क्विनाडोक्लोर (Quiniodochlor): दस्त रोकने वाली इस दवा से आंखों की रोशनी जाने का खतरा रहता है।

एक कंपनी जिसकी वजह से 66 घर उजड़ गए, वह महज नाम बदलकर दोबारा व्यापार करने की हिम्मत कैसे जुटा लेती है? क्या गाम्बिया के उन मासूम बच्चों की जान की कीमत इतनी सस्ती है कि एक नई साइनबोर्ड और एक मैनेज की गई लैब रिपोर्ट सब कुछ भुला देगी? जब तक भारत का ड्रग रेगुलेटरी सिस्टम सख्त नहीं होगा और कंपनियों की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक क्योरक्लिप जैसी कंपनियां नाम बदल-बदल कर आती रहेंगी। जनता को भी जागरूक होना होगा दवा खरीदने से पहले रसायन और कंपनी जरूर जांचें, क्योंकि कभी-कभी एक चम्मच सिरप जिंदगी भर का दर्द दे सकता है।

[VT]

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