West Bengal : BJP की ‘वाशिंग मशीन’ सरकार ! 5 लाख घूस लेने वाले को नरेंद्र मोदी ने बनाया CM

भाजपा की ‘वाशिंग मशीन’ पर सवाल: कल तक भ्रष्टाचारी कहे जाने वाले सुवेंदु अधिकारी अब बंगाल के ‘ईमानदार’ मुख्यमंत्री, क्या बदला सिर्फ दल या नैरेटिव भी?
मोदी और सुवेंदु अधिकारी
सुवेंदु अधिकारी को भाजपा ने अब बंगाल का मुख्यमंत्री बनाया है। रोचक बात यह है कि सुवेंदु अधिकारी जब TMC में थे, तो भाजपा ने उनको सबसे भ्रष्ट नेताओं में से एक बताया था। आज वही चेहरा भाजपा की ओर से बंगाल का नेतृत्व कर रहा है, जो कल तक भ्रष्टाचारी था। सवाल तो यह भी उठने लगा है कि जो आदमी कल तक भ्रष्टाचारी था, वह अब सदाचारी कैसे बन गया? क्या भाजपा के पास कोई वाशिंग मशीन है, जिसमें भ्रष्टाचार के दाग को धुला जा सकता है?X
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West Bengal : पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 में भाजपा को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है। सूबे के मुखिया सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में नई सरकार का गठन किया गया है। सुवेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) भाजपा से पहले TMC में थे। रोचक बात यह है कि सुवेंदु अधिकारी जब TMC में थे, तो भाजपा ने उनको सबसे भ्रष्ट नेताओं में से एक बताया था। आज वही चेहरा भाजपा की ओर से बंगाल का नेतृत्व कर रहा है, जो कल तक भ्रष्टाचारी था।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, बंगाल के नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने अपना बहुत सारा समय TMC में बिताया है। एक वक्त था जब सुवेंदु अधिकारी ममता बनर्जी की राजनीति से बहुत प्रभावित थे। पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए भाजपा ने बहुत मशक्कत की, लेकिन 2026 से पहले सफलता हासिल नहीं हुई। तब भाजपा ने अपनी परंपरागत रणनीति पर काम किया। भाजपा जिस राज्य में सरकार नहीं बना पाती, उस राज्य के सत्ताधारी दल से ही कुछ लोगों को तोड़कर अपनी पार्टी में शामिल कर लेती है।

इसी क्रम में बंगाल में 'लोटस अभियान' चला और सुवेंदु अधिकारी को बंगाल चुनाव-2021 से पहले भाजपा ने अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। इससे पहले तक भाजपा (BJP) ने ही सुवेंदु अधिकारी को भ्रष्टाचारी बताया था। एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें सुवेंदु (Suvendu Adhikari) अधिकारी नोटों की गड्डियाँ गिनते नजर आ रहे हैं। यह वीडियो जब वायरल हुआ था, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी तंज कसने से पीछे नहीं छूटे थे। उन्होंने ममता सरकार पर यह आरोप लगाया था कि बंगाल में भ्रष्ट सरकार काम कर रही है। अब वही सुवेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) भाजपा में शामिल हो गए हैं और भाजपा की तरफ से उनको मुख्यमंत्री बनाया गया है।

BJP वाशिंग मशीन: भ्रष्टाचार का दाग आसानी से छुड़ाएँ!

सुवेंदु अधिकारी को भाजपा ने अब बंगाल का मुख्यमंत्री बनाया है। ऐसे में सवाल खड़े होने लगे हैं कि सुवेंदु अधिकारी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप बीजेपी की राहें आगे के लिए आसान करेंगे या कठिन। सवाल तो यह भी उठने लगा है कि जो आदमी कल तक भ्रष्टाचारी था, वह अब सदाचारी कैसे बन गया? क्या भाजपा के पास कोई वाशिंग मशीन है, जिसमें भ्रष्टाचार के दाग को धुला जा सकता है?

ये सिर्फ एक मामला नहीं है, बल्कि इसी तरीके से भाजपा ने बहुत सारे राज्यों में भ्रष्टाचारियों को सत्ता की कमान सौंप रखी है। असम के मुख्यमंत्री हिमन्त बिसवा सरमा जब तक काँग्रेस में थे, तब तक भाजपा के लोग उनको भ्रष्टाचारी कहते थे और जैसे ही वो भाजपा में शामिल हुए, भाजपा ने उन्हें असम के मुख्यमंत्री के लिए सबसे योग्य आदमी बता दिया। इसी तरीके से आम आदमी पार्टी के सांसदों में से जब नेता भाजपा में गए, तो भाजपा ने उन्हें भी अपने वाशिंग मशीन में धुलकर साफ कर दिया। कल के भ्रष्टाचारी आज भाजपा में ईमानदारी का प्रमाणपत्र ले रहे हैं।

भाजपा राज में जांच एजेंसियों का दुरुपयोग

भाजपा पर यह आरोप हमेशा से लगता आ रहा है कि संवैधानिक संस्थाओं को कब्जे में लेकर उनका दुरुपयोग किया जा रहा है। भारतीय राजनीति में 'भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई' का नारा अक्सर उस समय फीका पड़ जाता है जब विपक्षी नेता दल बदलते ही केंद्रीय एजेंसियों की रडार से बाहर हो जाते हैं। सुवेंदु अधिकारी का मामला इस कड़ी का केवल एक हिस्सा है। यदि हम महाराष्ट्र की राजनीति पर गौर करें, तो अजीत पवार का नाम इस मामले में सबसे प्रमुखता से उभरकर सामने आता है।

महाराष्ट्र के अजीत पवार, जिन पर भाजपा ने कभी '70 हजार करोड़ के सिंचाई घोटाले' का आरोप लगाया था और देवेंद्र फडणवीस ने तंज कसते हुए कहा था कि वे चक्की पीसेंगे, जैसे ही उन्होंने पाला बदला, उनके खिलाफ चल रहे कई मामलों में जाँच की गति या तो धीमी हो गई या उन्हें क्लीन चिट मिलने की खबरें सामने आने लगीं। इसी तरीके से अन्य विपक्षी नेताओं में अशोक मित्तल के घर छापा मारा गया और जैसे ही उन्होंने भाजपा के साथ हाथ मिलाया वैसे ही ED (प्रवर्तन निदेशालय) और CBI (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) की सख्त कार्रवाइयों से बड़ी राहत मिली।

ऐसे मामलों से लोकतांत्रिक संस्थाओं के निष्पक्षता पर गहरा सवाल उठता है। जब भ्रष्टाचार के आरोपी नेता विपक्षी खेमे में होते हैं, तो एजेंसियाँ सक्रिय नजर आती हैं, लेकिन 'कमल' का दामन थामते ही उनके खिलाफ फाइलें बंद होने लगती हैं या ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। भ्रष्टाचार खत्म करने के नाम पर जनता से वोट मांगा जाता है और अंत में भ्रष्टाचारियों के हाथ में सत्ता की कमान सौंप दी जाती है।

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