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Padma Shri Ramchandra Manjhi: कई बार ऐसा होता है कि समाज में उन लोगों को मान्यता नहीं मिलती जो अक्सर नए रास्ते की खोज में निकल पड़ते हैं। ऐसी ही कहानी है बिहार के रामचन्द्र मांझी की, जिन्होंने अपने कलाकारी से सबका दिल भी जीता और रूढ़िवादी परंपराओं को चुनौती भी दी। भारत सरकार ने खुद उनके हिम्मत को सराहा है। लेकिन समाज ने मांझी के ऊपर बहुत तंज कसा है।
बता दें कि रामचन्द्र मांझी का जन्म साल 1925 में बिहार के सारण जिले के ताजपुर गाँव में एक निर्धन दलित परिवार में हुआ था। जिस समय उनका जन्म हुआ उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बिल्कुल ठीक नहीं थी। लगातार परिवार में दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष चल रहा था।
ये वही समय था जब भारत में ब्रिटिश हुकूमत का शासन था। आजादी के लिए संघर्ष चल रहा था, इसी दौरान मांझी का परिवार सामाजिक और आर्थिक शोषण का दंश झेल रहा था। पिता शिवनंदन मांझी (Sivanandan Manjhi) एक खेतिहर मजदूर थे। माँ लखपति देवी (Lakhpati Devi) घर का काम संभालती और बच्चों को देखती थी।
ये वही समय था जब बिहार जैसे राज्य में ब्रिटिश शासन के साथ जाति आधारित शोषण चरम पर था। कई बार ऐसा होता था कि तथाकथित बड़े जाति वालों के यहाँ मजदूरी करने पर मांझी के घर वालों को पैसे नहीं मिलते थे। नाच-गाना को बेहद गिरी निगाहों से देखा और समझा जाता था। रामचन्द्र मांझी (Padma Shri Ramchandra Manjhi) के परिवार में उनके चाचा दीनानाथ मांझी पहले से ही नाच मंडली से जुड़े थे। चाचा की मदद से उनके भीतर के कलाकार को बाहर निकालने का मौका मिला।
चाचा दीनानाथ मांझी के साथ रामचन्द्र मांझी (Padma Shri Ramchandra Manjhi) नाट्य मंडली में अक्सर जाया करते थे। नाट्य मंडली में कलाकारों को देखकर उनके भीतर का कलाकार भी जाग उठता था। एक बार की बात है, चाचा दीनानाथ मांझी ने भतीजे से कहा कि मंच पर गाना गाकर सुनाओ। चाचा का आदेश मिलते ही भतीजे रामचन्द्र मांझी ने मंच पर चढ़कर गाना गाया। यहीं से धीरे-धीरे कहानी आगे बढ़ने लगी। चाचा दीनानाथ मांझी ने यही सोचा कि बच्चे के माध्यम से कमाई का एक अच्छा जरिया बना लिया जाएगा।
रामचन्द्र जब 10 साल के थे तभी से भिखारी ठाकुर की नाट्य मंडली से जुड़ चुके थे। यह बात लगभग 1935 की है, जब भिखारी ठाकुर पूरे बिहार से लेकर बंगाल तक एक बड़ी हस्ती के तौर पर जाने जाते थे। इसी समय रामचंद्र को लेकर चाचा दीनानाथ भिखारी ठाकुर के पास पहुंचे।
भिखारी ठाकुर को पहले तो ये लगा कि बच्चा अभी नादान है और अभी उसकी उम्र नाट्य मंडली से जुड़ने की नहीं है। भिखारी ठाकुर ने बच्चे से गाना सुनाने को बोला। रामचन्द्र ने जैसे ही गाना गाया, भिखारी ठाकुर को लगा कि यह बच्चा आगे बहुत कुछ कर सकता है, इसके बाद उन्होंने तुरंत कहा कि ये बच्चा हमारे पास ही रहेगा। भिखारी ठाकुर से जुड़ने के बाद रामचन्द्र के जीवन में धीरे-धीरे बदलाव शुरू हुआ।
रामचन्द्र जब भिखारी ठाकुर से जुड़े तो कुछ ही समय में लौंडा डांस के लिए प्रसिद्ध होने लगे। धीरे-धीरे उनकी पहचान लौंडा डांसर के रूप में होने लगी। एक तरफ उनके नृत्य की चर्चा चारों तरफ होने लगी थी, परंतु दूसरी तरफ समाज उनको हीन भावना से ही देखता था। उनके नृत्य का मजाक बनाकर तंज कसा जाता था। रामचन्द्र मांझी जहां जाते उनके साथ इसी तरीके का बर्ताव होता था।
सामाजिक सम्मान न मिलने का एक कारण तो ये था कि उस समय नाच-गाना करने वालों के लिए समाज में कोई विशेष स्थान नहीं था। दूसरा बड़ा कारण ये भी था कि मांझी की जाति की वजह से उनको समाज में हीन भावना की दृष्टि से देखा जाता था। दलित समुदाय के प्रति उस समय तथाकथित ऊंची जातियों के मन में सम्मान के लिए कोई विशेष जगह नहीं थी, यही कारण था कि रामचन्द्र मांझी को समाज ने जल्दी सम्मान भरे नजरों से देखना स्वीकार नहीं किया।
समय बदलता गया और रामचन्द्र मांझी (Padma Shri Ramchandra Manjhi) ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने नाट्य मंचों के माध्यम से रूढ़िवादी परंपराओं को निशाना बनाया जिसमें समाज जकड़ा हुआ था। साल 2021 में भारत के राष्ट्रपति ने रामचन्द्र मांझी के साहस और योगदान को स्वीकार किया और पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। सम्मान मिलने पर मांझी ने कहा था, “यह सम्मान मेरा नहीं, मेरे गुरु भिखारी ठाकुर और उन लाखों लोगों का है जिन्होंने इस नाच को जिंदा रखा।”
ये बात उन्होंने इसलिए बोला था क्योंकि गुरु भिखारी ठाकुर के प्रति सम्मान और अगाध प्रेम उनके मन में अंतिम क्षण तक बना रहा। इसके अलावा रामचन्द्र मांझी (Padma Shri Ramchandra Manjhi) को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2017) भी मिल चुका है।
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