आखिर कौन थीं दरभंगा राज की 'अंतिम महारानी'? जिनकी अरबों की संपत्ति पर अब सरकार की नजर!

बिहार के इतिहास में दरभंगा राज का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक समय था जब मिथिलांचल के इस राजघराने की तूती न केवल भारत में बल्कि सात समंदर पार ब्रिटेन तक बोलती थी। महाराजा कामेश्वर सिंह के वैभव और उनकी दानवीरता की कहानियां आज भी मिथिला की गलियों में सुनने को मिलती है।
राज्य के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने स्पष्ट किया है कि महारानी की मृत्यु (12 जनवरी, 2026) के बाद से उनकी संपत्ति का कोई वैध उत्तराधिकारी सामने नहीं आया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी जिससे यह निर्धारित हो सके कि उनकी चल और अचल संपत्तियों का उत्तराधिकारी कौन होगा। यही कारण है कि सरकार अब पूरी संपत्ति पर कब्ज़ा करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है।
बिहार के इतिहास में दरभंगा राज का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक समय था जब मिथिलांचल के इस राजघराने की तूती न केवल भारत में बल्कि सात समंदर पार ब्रिटेन तक बोलती थी। महाराजा कामेश्वर सिंह के वैभव और उनकी दानवीरता की कहानियां आज भी मिथिला की गलियों में सुनने को मिलती है।AI Generated
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राज्य के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने स्पष्ट किया है कि महारानी की मृत्यु (12 जनवरी, 2026) के बाद से उनकी संपत्ति का कोई वैध उत्तराधिकारी सामने नहीं आया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी जिससे यह निर्धारित हो सके कि उनकी चल और अचल संपत्तियों का उत्तराधिकारी कौन होगा। यही कारण है कि सरकार अब पूरी संपत्ति पर कब्ज़ा करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है।

बिहार (Bihar) के इतिहास में दरभंगा राज (Darbhanga kingdom) का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक समय था जब मिथिलांचल के इस राजघराने की तूती न केवल भारत में बल्कि सात समंदर पार ब्रिटेन तक बोलती थी। महाराजा कामेश्वर सिंह के वैभव और उनकी दानवीरता की कहानियां आज भी मिथिला की गलियों में सुनने को मिलती है। लेकिन, हाल ही में दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के बाद इस ऐतिहासिक साम्राज्य की अरबों-खरबों की संपत्ति को लेकर एक नया मोड़ आ गया है। अब चर्चा है कि उत्तराधिकार के अभाव और आपसी कानूनी विवादों के बीच सरकार इस विशाल संपत्ति को अपने नियंत्रण में लेने की तैयारी कर रही है।

महारानी के जाने के बाद सूना हुआ कल्याणी निवास

दरभंगा राज के अंतिम महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी महारानी कामसुंदरी देवी का पिछले दिनों निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही दरभंगा राज का वह अध्याय भी समाप्त हो गया जो सीधे तौर पर महाराज से जुड़ा था। महाराज कामेश्वर सिंह की अपनी कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण उन्होंने अपने भाई के पुत्रों को उत्तराधिकारी माना था। हालांकि, महारानी कामसुंदरी देवी अपने जीवन के अंतिम समय तक कल्याणी निवास में रहीं और संपत्ति की देखभाल करती रहीं। उनके जाने के बाद अब सवाल खड़ा हो गया है कि महलों, मंदिरों, बेशकीमती जमीनों और गहनों के इस विशाल भंडार का असली वारिस कौन है?

सरकार क्यों उठा रही है कदम?

हालिया रिपोर्टों के अनुसार, बिहार सरकार और स्थानीय प्रशासन दरभंगा राज की उन संपत्तियों का ब्यौरा जुटा रहा है जिनका कोई स्पष्ट वारिस नहीं दिख रहा है या जो लंबे समय से विवादित हैं। जानकारों का मानना है कि (Escheat) कानून के तहत, यदि किसी संपत्ति का कोई वैध उत्तराधिकारी नहीं बचता, तो वह अंततः राज्य सरकार के अधीन चली जाती है।

दरभंगा राज की संपत्ति केवल बिहार तक सीमित नहीं है। दिल्ली, कोलकाता, वाराणसी और यहां तक कि लंदन में भी इनकी संपत्तियां फैली हुई हैं। अकेले दरभंगा शहर का एक बड़ा हिस्सा राजघराने की जमीन पर बसा है। सरकार की योजना है कि इन संपत्तियों को अतिक्रमण से बचाया जाए और जनहित के कार्यों जैसे कि अस्पताल, विश्वविद्यालय या संग्रहालय के लिए इस्तेमाल किया जाए।

महाराजा कामेश्वर सिंह के समय दरभंगा राज की कुल नेटवर्थ का सही आकलन करना आज भी मुश्किल है। जानकारों के मुताबिक, यह संपत्ति आज के हिसाब से कई लाख करोड़ रुपये की हो सकती है। महाराज के पास दुनिया के सबसे महंगे हीरों में से एक 'विटल्सबैच हीरा' (Wittelsbach Diamond) था। इसके अलावा, सोने के सोफे, चांदी के बर्तन और बेमिसाल जवाहारात उनके वैभव का हिस्सा थे। जमीन की बात करें तो बिहार के कई जिलों में हजारों एकड़ जमीन, कई चीनी मिलें, अखबार (जैसे आर्यावर्त और इंडियन नेशन) और ऐतिहासिक इमारतें इस साम्राज्य का हिस्सा रही हैं। दरभंगा का मशहूर राज किला, जो कि लाल किले की तर्ज पर बना है, आज भी अपनी भव्यता की कहानी कहता है, हालांकि इसके रखरखाव के अभाव में अब इसकी दीवारों में दरार आ रही हैं।

पारिवारिक विवाद और कानूनी पेच

महाराजा कामेश्वर सिंह के निधन के बाद से ही संपत्ति को लेकर उनके भतीजों और परिवार के अन्य सदस्यों के बीच कानूनी लड़ाई शुरू हो गई थी। कुमार कपिलेश्वर सिंह और परिवार के अन्य वारिसों के बीच दशकों से मुकदमेबाजी चल रही है। महारानी कामसुंदरी देवी ने भी अपने जीवनकाल में कई बार संपत्ति की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। अब जबकि महारानी नहीं रहीं, तो कानूनी पेच और उलझ गए हैं। कई संपत्तियों पर भू-माफियाओं की नजर है, तो कई पर अवैध कब्जे हो चुके हैं। सरकार का हस्तक्षेप इसी अराजकता को रोकने की एक कोशिश माना जा रहा है। जिला प्रशासन ने कथित तौर पर उन संपत्तियों की सूची बनानी शुरू कर दी है जो राजघराने के ट्रस्ट या व्यक्तिगत नाम पर थीं।

विरासत बचाने की चुनौती

मिथिला के इतिहासकारों का मानना है कि दरभंगा राज की संपत्ति केवल एक परिवार की निजी जागीर नहीं है, बल्कि यह बिहार की सांस्कृतिक धरोहर है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) को बनाने में सबसे बड़ा दान देने वाले महाराजा कामेश्वर सिंह ही थे। दरभंगा का लहेरियासराय और राज परिसर अपनी वास्तुकला के लिए मशहूर है। यदि सरकार इन संपत्तियों को अपने हाथ में लेती है, तो सबसे बड़ी चुनौती इनके संरक्षण की होगी। लोगों की मांग है कि 'कल्याणी निवास' और राज किले को 'हेरिटेज साइट' घोषित किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने गौरवशाली इतिहास को देख सकें।

[VT]

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