सम्राट चौधरी ही नहीं बल्कि बीजेपी के इन 3 नेताओं ने भी मुस्लिम टोपी पहनने से किया इंकार

सम्राट चौधरी ने 15 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की थी। इसके बाद से ही वे राज्य के विभिन्न इलाकों के निरंतर दौरे पर हैं। उनके इस हालिया रुख ने न केवल राजनीतिक हलकों में, बल्कि डिजिटल मंचों पर भी एक नई वैचारिक चर्चा और बहस को तेज कर दिया है।
बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में हालिया घटनाक्रमों ने सरगर्मी बढ़ा दी है। मुख्यमंत्री के रूप में बागडोर संभालने वाले सम्राट चौधरी इन दिनों सुर्खियों में बने हुए हैं। उनकी इस चर्चा का आधार कोई नया गठबंधन अथवा विधायी निर्णय न होकर एक वायरल वीडियो है, जिसमें वे जालीदार 'मुस्लिम टोपी' धारण करने से मना करते नजर आ रहे हैं।
सम्राट चौधरी ने 15 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की थी। इसके बाद से ही वे राज्य के विभिन्न इलाकों के निरंतर दौरे पर हैं। उनके इस हालिया रुख ने न केवल राजनीतिक हलकों में, बल्कि डिजिटल मंचों पर भी एक नई वैचारिक चर्चा और बहस को तेज कर दिया है।AI Generated
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बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में हालिया घटनाक्रमों ने सरगर्मी बढ़ा दी है। मुख्यमंत्री के रूप में बागडोर संभालने वाले सम्राट चौधरी इन दिनों सुर्खियों में बने हुए हैं। उनकी इस चर्चा का आधार कोई नया गठबंधन अथवा विधायी निर्णय न होकर एक वायरल वीडियो है, जिसमें वे जालीदार 'मुस्लिम टोपी' धारण करने से मना करते नजर आ रहे हैं। 

सम्राट चौधरी ने 15 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की थी। इसके बाद से ही वे राज्य के विभिन्न इलाकों के निरंतर दौरे पर हैं। उनके इस हालिया रुख ने न केवल राजनीतिक हलकों में, बल्कि डिजिटल मंचों पर भी एक नई वैचारिक चर्चा और बहस को तेज कर दिया है।जब सम्राट चौधरी ने टोपी पहनने से किया इनकार:

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी एक जनसभा में भाग ले रहे थे, जिसमें अल्पसंख्यक समाज के लोगों की भी खासी उपस्थिति थी। इसी आयोजन के वक्त, एक मुस्लिम समर्थक ने आदर भाव प्रदर्शित करते हुए उन्हें जालीदार टोपी भेंट करने का प्रयास किया। सम्राट चौधरी ने अत्यंत शालीनता परंतु दृढ़ता के साथ हाथ जोड़ते हुए इसे पहनने से इनकार कर दिया। उन्होंने उस टोपी को स्वीकार कर अपने हाथ में तो थाम लिया, किंतु उसे अपने मस्तक पर धारण नहीं किया।

जैसे ही इस वाकये का वीडियो इंटरनेट पर प्रसारित हुआ, यह राजनीति में 'तुष्टिकरण' के मुकाबले 'हिंदुत्व' की वैचारिकी का एक ताजा उदाहरण बन गया। भाजपा के पक्षधरों ने जहाँ इसे "सांस्कृतिक निष्ठा" का परिचायक माना, वहीं विरोधी खेमे के नेताओं ने इसे प्रदेश की गौरवशाली गंगा-जमुनी तहजीब की परंपरा पर चोट बताया।

दिग्गज नेताओं का इनकार: जब मोदी, योगी और सुशील मोदी ने भी कहा 'ना'

बिहार के नए मुख्यमंत्री का यह आचरण कोई पहली घटना नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के कई शीर्ष नेताओं ने समय-समय पर इस प्रकार के प्रतीकों को अपनाने से इनकार किया है।

1. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी :

धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक उपयोग से स्वयं को दूर रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा 'सबका साथ, सबका विकास' के मंत्र पर बल दिया है। उनके इस रुख की सबसे अधिक चर्चा 2011 में हुई, जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में वे 'सद्भावना उपवास' कर रहे थे। उस समय एक स्थानीय मौलवी ने उन्हें टोपी पहनाने का प्रयास किया, जिसे मोदी ने अत्यंत शालीनता के साथ अस्वीकार कर दिया। उनका स्पष्ट तर्क था कि किसी भी आस्था के प्रति सम्मान और निष्ठा हृदय से होनी चाहिए, न कि केवल दिखावे के प्रतीकों के माध्यम से।

2. योगी आदित्यनाथ 

योगी आदित्यनाथ, जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, ने भी वर्ष 2018 में संत कबीर दास की मजार पर दर्शन के दौरान टोपी पहनने से इंकार कर दिया था। उस समय मजार के खादिम द्वारा उन्हें टोपी पहनाने की कोशिश की गई, लेकिन योगी ने मुस्कुराते हुए हाथ के संकेत से मना कर दिया। इस घटना के माध्यम से उन्होंने यह दृढ़ संदेश दिया कि एक सन्यासी होने के नाते वे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

3. सुशील कुमार मोदी

दिवंगत सुशील कुमार मोदी, जो बिहार के एक कद्दावर नेता थे, अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते थे। सार्वजनिक कार्यक्रमों और इफ्तार के आयोजनों में वे अक्सर मुस्लिम टोपी के स्थान पर शॉल या दुपट्टा धारण करना ही समझते थे। भारतीय जनता पार्टी के इन दिग्गजों का यह स्पष्ट मत रहा है कि केवल वेशभूषा के माध्यम से तुष्टिकरण की राजनीति करना जनता के बीच केवल भ्रम की स्थिति उत्पन्न करता है।

बिहार की राजनीति और सम्राट चौधरी का संदेश

बिहार के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी का यह हालिया कदम राज्य में 'ब्रांड बीजेपी' की स्थिति को और अधिक सुदृढ़ करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का यह मत है कि सम्राट चौधरी के माध्यम से यह संदेश दिया जा रहा है कि उनकी सरकार का मुख्य ध्येय विकास होगा। वे यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि अपनी मौलिक विचारधारा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता केवल प्रतीकात्मक राजनीति या फोटो-अवसरों के लिए नहीं किया जाएगा।

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