

1964 में गठित CVC भ्रष्टाचार रोकने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनी।
प्रवीण वशिष्ठ की नियुक्ति में जल्दबाजी और प्रक्रिया पर सवाल उठे।
पूर्व CVC विट्टल ने भ्रष्टाचार विरोधी जन-जागरूकता को मजबूती दी।
भारत में आज़ादी के बाद से ही भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या रही है और इसी वजह से शासन व्यवस्था और जनता का भरोसा कमजोर भी होता है। इसपर लगाम लगाने के लिए फरवरी 1964 में भारत सरकार ने Central Vigilance Commission (CVC) की स्थापना की। Santhanam Committee की सिफारिश पर सरकार ने गठन किया था। इसका मकसद था समाज में पारदर्शिता, ईमानदारी और जवाबदेही को मजबूत किया जाए।
Vigilance Commissioner न केवल भ्रष्टाचार के मामलों की समीक्षा करता है, बल्कि सिस्टम में सुधार के लिए सरकार को सुझाव भी देता है, ताकि प्रशासन जनता के प्रति अधिक जिम्मेदार बन सके। हालांकि, आजकल Vigilance Commissioner की नियुक्ति शक के घेरे में आ गई है। एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने इस पद की नियुक्ति की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बिहार के 1991 बैच के वरिष्ठ IPS अधिकारी प्रवीण वशिष्ठ (Praveen Vashisht) ने रिटायरमेंट ले ली है और अब वो Vigilance Commissioner की भूमिका में नज़र आएँगे। बिहार सरकार के गृह विभाग ने उन्हें विशेष नियम में छूट देते हुए उनका इस्तीफा स्वीकार किया है।
Vigilance Commissioner एक संवैधानिक पद है, इसलिए उनका रिटायर होना जरूरी था। यही कारण है कि उन्होंने केंद्र सरकार और राज्य सरकार को VRS के लिए आवेदन दिया था। वशिष्ठ का IPS करियर शानदार रहा।
वो नई दिल्ली में गृह मंत्रालय (MHA) में विशेष सचिव के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। प्रवीण वशिष्ठ (Praveen Vashisht) अपनी ईमानदारी और सख्त रवैये के लिए जाने जाते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वो 31 मई 2026 को रिटायर हो रहे थे लेकिन सतर्कता आयुक्त बनाए जाने के बाद उन्होंने करीब 5 महीने पहले ही रिटायरमेंट ले लिया।
बता दें कि गृहविभाग की अधिसूचना के अनुसार इस्तीफा के लिए 3 महीने पहले नोटिस देना पड़ता है लेकिन प्रवीण वशिष्ठ को इसमें विशेष छूट दी गई। अब यही चीज केंद्र की मोदी सरकार की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रही है।
भारतीय लिबरल पार्टी के अध्यक्ष डॉ मुनीश रायज़ादा (Dr Munish Raizada) ने इसको लेकर केंद्र की मोदी सरकार की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किये हैं। उन्होंने अपने X अकाउंट (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी चिंता ज़ाहिर की है।
डॉ रायज़ादा ने लिखा, ''नए CVC की नियुक्ति में इतनी जल्दबाजी क्यों? भारत के चीफ विजिलेंस कमिश्नर के तौर पर श्री प्रवीण वशिष्ठ, IPS की नियुक्ति की खबर पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया। उनसे उनके पद से इस्तीफा दिलवाया गया, और उनका चुनाव बहुत जल्दबाजी में किया गया। CVC और CAG सरकारों को जवाबदेह बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसी महत्वपूर्ण नियुक्तियों को (नियुक्ति से पहले) पुष्टि के लिए संसदीय समितियों के पास भेजा जाना चाहिए। इससे हमारे लोकतंत्र में ज़्यादा पारदर्शिता आएगी।"
बता दें कि डॉ मुनीश रायज़ादा (Dr Munish Raizada) के मुताबिक CVC के नियुक्ति की एक प्रक्रिया है, जिसका पालन केंद्र की मोदी सरकार द्वारा नहीं किया गया है।
CVC यानी Central Vigilance Commissioner की नियुक्ति पर गौर करें, तो इसकी एक प्रक्रिया होती है। केंद्र सरकार एक चयन समिति बनाती है और इसमें प्रधानमंत्री अध्यक्ष होते हैं, जबकि गृह मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता इसके सदस्य होते हैं। योग्य और अनुभवी अधिकारियों के नामों पर ये समिति विचार-विमर्श करती है।
कई चर्चाओं के बाद समिति एक नाम की सिफारिश करती है। इसके बाद भारत के राष्ट्रपति Central Vigilance Commissioner की नियुक्ति करते हैं। CVC का कार्यकाल चार साल या 65 वर्ष की आयु तक होता है।
बता दें कि CVC की जो नियुक्ति प्रक्रिया है, इसपर पहले भी विवाद हो चुका है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने इसपर कड़ा विरोध जताया था। उनके मुताबिक नियुक्ति प्रक्रिया सरकार के पक्ष में झुकी है और इससे CVC की स्वतंत्रता मजबूत नहीं होती है।
वहीं, अमेरिका की बात करें तो Office of Government Ethics (OGE) जैसी व्यवस्थाएं हैं। Inspector General (IG) की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, लेकिन नियुक्ति के लिए US Senate की मंजूरी (confirmation) जरूरी होती है।
इन्हें किसी एक विभाग जैसे रक्षा, स्वास्थ्य, वित्त विभाग के लिए नियुक्त किया जाता है। US Senate अमेरिका की संसद (कांग्रेस) का अपर हाउस होता है, जो कानून बनाने, राष्ट्रपति की नियुक्तियों को मंजूरी देने और सरकार पर नजर रखने का काम करता है।
पूर्व CVC यानी Central Vigilance Commissioner एन. विट्टल (N Vittal) एक प्रेरणा की तरह हैं। वो भारत के प्रसिद्ध सिविल सेवक थे। वो भारतीय प्रशासन सेवा के अधिकारी थे और भ्रष्टाचार की लड़ाई लड़े जाने के लिए जाने जाते थे। 1960 के IAS बैच के अधिकारी विट्टल को भारत सरकार ने 3 सितंबर 1998 को CVC नियुक्त किया था। उनका चार साल का कार्यकाल था, जो 2 सितंबर 2002 को खत्म हुआ। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाए।
एन. विट्टल (N Vittal) के भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन-जागरूकता की चर्चा काफी होती है। 31 अक्टूबर 2000 को 'सतर्कता जागरूकता सप्ताह' मनाने की परंपरा उन्होंने ही शुरू की थी और खास बात यह है कि इस दिन सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्मदिन भी है। पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को हुआ था। पटेल ईमानदारी और प्रशासनिक अखंडता का प्रतीक माने जाते हैं और यही कारण है कि विट्टल ने यह दिन चुना।
इसके साथ ही उन्होंने CVC की वेबसाइट पर उन अधिकारियों के नाम भी सार्वजानिक किये, जो भ्रष्टाचारी हैं। विट्टल का आदेश था कि हर सरकारी कार्यालय में एक बोर्ड लगे, जिसपर यह लिखा होना चाहिए कि रिश्वत ना दें और अगर कोई अधिकारी ऐसा करता है, तो उसकी शिकायत हो सकती है।' इसका मकसद जनता को जागरूक करना था।
विट्टल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ "e-vigilance" और "Preventive Vigilance" बनाने पर जोर दिया। नागरिकों के लिए 'सिटीजन कार्ड भी जारी किया, ताकि लोगों को पता चले कि शिकायत कहाँ और कैसे करना है।
बता दें कि 31 जनवरी 1938 को एन. विट्टल का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम नागराजन विट्टल था। कहा जाता है कि स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण 85 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। 3 अगस्त 2023 को उन्होंने चेन्नई में अंतिम साँस ली। पीएम मोदी समेत कई नेताओं के उनके निधन पर दुःख व्यक्त किया था।