

जब लोग अंधेरी रात के आसमान में चमकते तारों को देखते हैं तो ये सवाल जरूर उठता है कि आखिर ये तारामंडल क्या है और वैज्ञानिक इन्हें कैसे इस्तेमाल करते हैं? वैज्ञानिक बताते हैं कि तारों के ये पैटर्न वास्तव में क्या है और इसका महत्व क्या है?
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के स्पेस प्लेस पोर्टल पर तारामंडल के बारे में विस्तार से जानकारी देता है। तारामंडल तारों के समूह होते हैं, जो पृथ्वी से देखने पर किसी खास आकार या चित्र जैसे दिखाई देते हैं। ये तारे आपस में जुड़े नहीं होते, बल्कि बहुत अलग-अलग दूरी पर स्थित होते हैं। फिर भी, जब हम इन्हें जोड़कर देखते हैं तो वे जानवरों, चीजों या इंसानों की आकृति बनाते नजर आते हैं।
पुराने समय से ही मानव संस्कृतियों ने इन पैटर्न को नाम दिए। आज दुनिया भर में 88 तारामंडलों को आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त है। इनके नाम अलग-अलग संस्कृतियों में अलग-अलग रहे हैं, लेकिन आधुनिक खगोल विज्ञान में इन्हें तय किया गया है। रात में दिखने वाले तारामंडल आपकी पृथ्वी पर स्थिति और साल के समय पर निर्भर करते हैं। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाती है। इसलिए हर मौसम में रात का आसमान बदलता रहता है।
तारे हर रात थोड़ा पश्चिम की ओर खिसकते दिखाई देते हैं। उत्तरी गोलार्ध और दक्षिणी गोलार्ध में भी अलग-अलग तारामंडल दिखते हैं। उदाहरण के लिए, अगर आप उत्तरी गोलार्ध में सितंबर महीने की रात आसमान देखें तो आपको ‘मीन’ तारामंडल दिख सकता है, लेकिन ‘कन्या’ नहीं दिखेगा क्योंकि वह उस समय सूर्य की दूसरी तरफ होता है।
तारामंडल देखने में आसान लगते हैं, लेकिन ये वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड की गहराई समझने में मदद करते हैं। कुछ तारे करीब लगते हैं और कुछ बहुत दूर। जब हम कल्पना से इनके बीच लाइनें जोड़ते हैं तो सुंदर आकृतियां बन जाती हैं।
अब सवाल है कि वैज्ञानिक तारामंडलों का इस्तेमाल कैसे करते हैं? तारामंडल सिर्फ सुंदर नजारे नहीं हैं, बल्कि वैज्ञानिकों और स्पेस एजेंसिज के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण की तरह हैं क्योंकि तारामंडल लंबे समय तक लगभग एक ही जगह पर रहते हैं, इन्हें आसमान में निशान या लैंडमार्क की तरह इस्तेमाल किया जाता है। नासा और खगोलविद तारों, नीहारिकाओं और अन्य खगोलीय वस्तुओं के नाम उन्हीं तारामंडलों के आधार पर रखते हैं जिनमें वे स्थित होते हैं। उल्का शावर्स के नाम भी संबंधित तारामंडल से लिए जाते हैं।
उदाहरण के लिए, हर साल अक्टूबर में होने वाली ‘ओरियोनिड्स’ उल्का शावर्स ‘ओरियन’ तारामंडल की दिशा से आती दिखाई देती है। नेविगेशन में तारामंडलों की भूमिका बहुत पुरानी है। सदियों से नाविक समुद्र में दिशा पता करने के लिए तारों का इस्तेमाल करते रहे हैं, जिसे ‘सेलेस्टियल नेविगेशन’ कहते हैं। आज भी नासा के अंतरिक्ष यात्री इसकी ट्रेनिंग लेते हैं। अगर आधुनिक जीपीएस या अन्य सिस्टम काम न करें तो तारामंडल बैकअप के रूप में काम आ सकते हैं।
यही नहीं रोबोटिक अंतरिक्ष यान भी तारों के नक्शे का इस्तेमाल करते हैं। ये यान अपने कंप्यूटर में तारों का पूरा नक्शा रखते हैं और कैमरे से खींची तस्वीरों की तुलना करके अपना रास्ता तय करते हैं। इस तरह पुरानी तकनीक आज भी आधुनिक अंतरिक्ष अन्वेषण में उपयोगी साबित हो रही है। (MK)
(यह रिपोर्ट IANS न्यूज़ एजेंसी से स्वचालित रूप से ली गई है। न्यूज़ग्राम इस कंटेंट की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता।)