कल्पना चावला बर्थडे: तारों को निहारने वाली ‘मोंटू’ बनी अंतरिक्ष की कल्पना, कुर्बानी देकर दुनिया को दिखाया सपनों का आसमान

वर्ष 2003, तारीख 16 जनवरी, यह वो दिन था जब कल्पना चावला ने एसटीएस-107 मिशन पर अंतरिक्ष के लिए दूसरी बार उड़ान भरी। यह मिशन 16 दिनों का था।
भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला
भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला की उपलब्धियों का हर कोई कायल है। बच्चे कल्पना चावला जैसा बनकर अपना और देश का नाम रोशन करना चाहते हैं। हर साल 17 मार्च को कल्पना चावला की उपलब्धियों को लोग याद किए बिना नहीं रह पाते।AI Generated
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भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री (Indian Origin Astronaut) कल्पना चावला की उपलब्धियों का हर कोई कायल है। बच्चे कल्पना चावला जैसा बनकर अपना और देश का नाम रोशन करना चाहते हैं। हर साल 17 मार्च को कल्पना चावला की उपलब्धियों को लोग याद किए बिना नहीं रह पाते। 17 मार्च 1962 को हरियाणा के करनाल में बनारसी लाल और संजयोती के घर कल्पना चावला का जन्म हुआ था। किसी को क्या पता था ये बच्ची आगे चलकर देश का नाम अंतरराष्टीय पटल पर रोशन करने वाली है।

कल्पना (Kalpana Chawla) को घर वाले प्यार से 'मोंटू' कहकर बुलाते थे। जब कल्पना स्कूल जाने लगीं तो उन्होंने खुद को कल्पना नाम दे दिया। बचपन में कल्पना छत पर लेटकर घंटों तारों को निहारती रहतीं और सोचती थीं कि वे कितने दूर हैं, फिर भी हमारे कितने पास हैं। एक दिन कोई जेट विमान गुजरा तो उनकी आंखें चमक उठीं। उन्होंने अपनी मां से कहा कि मां मैं भी उड़ूंगी। बचपन में पढ़ाई को दौरान कल्पना किताबों में खो जाती थीं।

टैगोर बाल निकेतन की लाइब्रेरी (Tagore Bal Niketan Library) उसकी दूसरी दुनिया हुआ करती थी। वर्ष 1976 में कल्पना ने पढ़ाई पूरी की। स्कूल में हमेशा कल्पना टॉप 5 में रहती थीं। उनके पिता चाहते था कि वो डॉक्टर या अध्यापक बनें, लेकिन उनके मन में तो कुछ और चल रहा था।

कल्पना ने 1982 में पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग (Aeronautical Engineering) की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद कल्पना आर्लिंगटन के टेक्सास विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया फिर कोलोराडो विश्वविद्यालय से पीएचडी की। वर्ष 1991 में कल्पना ने अमेरिका की नागरिकता ले ली। अमेरिका में कल्पना के सामने हर कदम पर चुनौतियां ही चुनौतियां थीं। नई भाषा, नया देश और सबसे बड़ी चुनौती घर की याद थी। इसके बाद भी उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी।

कल्पना ने नासा (NASA) के एम्स रिसर्च सेंटर में काम किया, जहां कम्प्यूटेशनल फ्यूड डाइनामिक पर रिसर्च किया। उन्होंने एयरक्राफ्ट के आसपास हवा कैसे बहती है, इसको समझा। वर्ष 1993 में ओवरसेट मेथड्स आईएनसी. में वाइस प्रेसिडेंट बन गईं। यहां उन्होंने मल्टी-बॉडी सिमुलेशन पर काम किया। फिर कड़ी मेहनत और लगन से वर्ष 1994 में नासा ने उनको चुना तो करनाल सहित पूरा देश गर्व से झूम उठा। मार्च 1995 में उन्होंने जॉनसन स्पेस सेंटर से ट्रेनिंग शुरू की। उन्होंने दो साल की कठिन ट्रेनिंग पूरी की।

वर्ष 1997, तारीख थी 19 नवंबर की, जब कल्पना पहली बार अंतरिक्ष मिशन एसटीएस 87 के जरिए पहली बार अंतरिक्ष (Space) में पहुंचीं। यह पूरे देश के लिए ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि वह अंतरिक्ष में जाने वाली पहली भारतीय मूल की महिला (Indian Origin First Woman) बनीं। इस मिशन को अंजाम देने के लिए नासा के स्पेस शटल कोलंबिया का इस्तेमाल किया गया।

अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखकर उन्होंने कहा था कि यहां से सब सीमाएं मिट जाती हैं। सिर्फ एक नीला गोला दिखता है, हमारा घर। उनकी पहली उड़ान 16 दिनों की थी। यह मिशन 5 दिसंबर, 1997 को संपन्न हुआ था।

वर्ष 2003, तारीख 16 जनवरी, यह वो दिन था जब कल्पना चावला ने एसटीएस-107 मिशन पर अंतरिक्ष के लिए दूसरी बार उड़ान भरी। यह मिशन 16 दिनों का था। 1 फरवरी 2003 को पृथ्वी पर वापस लौटते वक्त 'कोलंबिया' यान भीषण हादसे का शिकार हो गया था। पृथ्वी पर लैंडिंग से महज 16 मिनट की दूरी पर कुछ ऐसा हुआ, जिसने सबको हिलाकर रख दिया। कोलंबिया यान जब पृथ्वी से 16 मिनट की दूरी पर था, स्पेसक्राफ्ट (Spacecraft) में कुछ तकनीकी दिक्कत आ गई। यान के बाएं पंखे में छेद होने की वजह से बाहर की गैस अंतरिक्ष यान के अंदर तेजी से भरने लगी। यान में गैस भरने से सेंसर ने काम करना बंद कर दिया और स्पेसक्राफ्ट बड़े हादसे का शिकार हो गया। कल्पना उस मिशन से कभी लौटी ही नहीं। इस हादसे में कल्पना चावला समेत सभी सात अंतरिक्ष यात्रियों की मौत हो गई।

[VT]

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