Auto Brewery Syndrome: शरीर में ही बनने लगता है अल्कोहल

Auto Brewery Syndrome: यह एक ऐसी अनोखी बीमारी है जिसमें इंसान बिना पीए ही नशे में रहता है। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि शरीर खुद ही अल्कोहल बनाने लग जाता है।
इस तस्वीर में एक लड़का जमीन पर बैठा है, जो बहुत ज्यादा पेरशन लग रहा है
Auto Brewery Syndrome: शरीर में ही बनने लगता है अल्कोहल (Wikimedia Commons)
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Auto Brewery Syndrome: इंसानों को अल्‍कोहल (Alcohol) पीते तो सुना था, पर तब क्या हो जब इंसान के शरीर में ही अल्‍कोहल बनने लग जाए। लाज़मी है कि ऐसी परिस्थिति में वो इंसान सही से न चल सकेगा और न ही उसके शरीर कि इंद्रियाँ सुचारु रूप से काम ही कर सकेंगी। जी हाँ, आपने सही सुना, ये एक बीमारी है जिसमें इंसानी शरीर के अंदर अल्‍कोहल बनना शुरू हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में जब शरीर खुद अल्‍कोहल बनाने लगता है (Human Body Starts Making Alcohol Itself), तब वो हर वक्त नशे में मदहोश रहता है। इस बीमारी को ऑटो ब्रीवेरी सिंड्रोम (Auto Brewery Syndrome) के नाम से जाना जाता है।

यह एक ऐसी अनोखी बीमारी है जिसमें इंसान बिना पीए ही नशे में रहता है। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि शरीर खुद ही अल्कोहल बनाने लग जाता है। इसका परिणाम ये होता है कि इंसान धीरे-धीरे मानसिक तथा शारीरिक रूप से कमजोर होता चला जाता है। उसका अपने ऊपर से संतुलन खत्म होने लगता है। विशेषज्ञों कि मानें तो ऐसा चिंता और अवसाद के कारण होता है।

NCBI ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि इस बीमारी में मरीज के शरीर में कार्बोहाइड्रेट एल्कोहल (इथेनॉल) का उत्सर्जन बढ़ जाता है। ऐसे में मरीज जब भी कार्बोहाइड्रेट अधिक मात्रा में लेता है, तब उसके शरीर के अंदर इथेनॉल का स्तर बढ़ जाता है। फिर ये इथेनॉल आंतों में जमा होने लगता है और इसके कारण अंततः अत्‍यधिक मात्रा में यीस्‍ट (yeast) जमा हो जाता है। और फिर जो भी खाना मरीज खाता है वो यीस्ट के साथ मिलकर अल्‍कोहल बनने लगता है।

यहाँ कुछ यीस्ट के नाम दिए गए हैं जो ऑटो ब्रीवेरी सिंड्रोम के प्रमुख कारण हैं:

टोरुलोप्सिस ग्लबराटा (Torulopsis glabrata)

कैंडिडा क्रूसि (Candida krusei)

कैंडिडा केफिरो (Candida kefyr)

कैनडीडा अल्बिकन्स (Candida albicans)

कैंडिडा ग्लबराटा (Candida glabrata)

Saccharomyces cerevisiae (शराब बनाने वाला ईस्ट)

रिसर्च रिपोर्ट इस बात कि पुष्टि करती है कि यदि ये प्रक्रिया लंबे समय तक ऐसे ही होती है, तो कार्बोहाइड्रेट से उत्सर्जित अल्कोहल धीर-धीरे मरीज के पूरे शरीर में खून के जरिए फैल जाता है और मरीज हमेशा सुस्‍त, हैंगओवर सा महसूस करता है। उसे हर समय नींद आती रहती है।

ऑटो ब्रीवेरी सिंड्रोम (Auto Brewery Syndrome) के लक्षण:

सबसे पहले तो इस बीमारी से ग्रसित मरीज हर व्यक्त नशे कि हालत में मिलेगा। नींद बहुत ज्यादा आने लगती है। सुस्त सा पड़ा-पड़ा उसे चक्कर और सिर दर्द कि शिकायत बढ़ जाती है। शरीर के स्किन का रंग लाल पड़ जाता है। हिडाइड्रेशन, थकान, मोमोरी लॉस, भ्रम की स्थि‍ति पैदा होने लगती है। हर व्यक्त मुंह सूखा-सूखा रहने लगता है। कई बार मरीजों में उलटी या डकार भी ज्यादा आने लगती है।

ऑटो ब्रीवेरी सिंड्रोम के अन्य साइड इफेक्‍ट्स में क्रोनिक फेटीग सिंड्रोम, इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम और डिप्रेशन जैसी शिकायतें बढ़ जाती हैं।

ऑटो ब्रीवेरी सिंड्रोम (Auto Brewery Syndrome) का इलाज:

ऑटो ब्रीवेरी सिंड्रोम से ग्रसित मरीजों के लिए कार्बोहाइड्रेट लेना जहर के समान है, इसलिए मरीज को इसे लेना जल्द से जल्द बंद करना चाहिए। आंत में फंगस को कंट्रोल करने के लिए एंटीफंगल दवाएं दी जाती हैं। इस बीमारी से जूझ रहे लोगों को हिदायत दी जाती है कि वो चीनी कम खाएं। मरीजों को ब्रेड और पास्ता, सफेद चावल, रिफाइंड आटा, आलू के चिप्स, कोल्ड-ड्रिंक्स, फलों का जूस लेना सख्‍त मना किया जाता है।

(यह लेख केवल जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से प्रेषित किया गया है। अधिक जानकारी के लिए किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श लें।)

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